Navratri 2020 : आज कीजिए मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, भगवान शिव के लिए की थी कठोर तपस्या

ऐसी मान्यता है कि जो माता ब्रह्मचारिणी (Brahmacharini) की पूजा-अर्चना करता है, उसकी इंद्रियां उसके नियंत्रण में रहती हैं. मां की तपस्या या ध्यान लगाने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.

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मां ब्रह्मचारणी की पूजा में पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन का प्रयोग किया जाता है.

नवरात्रि पर्व (Navratri Festival 2020) के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी (Brahmacharini) की पूजा-अर्चना की जाती है. ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली. यानी इसे तप का आचरण करने वाली भी कहा जाता है. इस दिन भक्त दुर्गा मां के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी के चरणों में ध्यान लगाते हैं. कहा जाता है कि मां ब्रह्मचारिणी की अराधना करने से भक्तों की तप शक्ति बढ़ती है.

ऐसी मान्यता है कि जो माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना करता है, उसकी इंद्रियां उसके नियंत्रण में रहती हैं. मां की तपस्या या ध्यान लगाने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है. साथ ही हर प्रकार का भय भी दूर होता है.

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कैसे करें मां ब्रह्मचारणी की पूजा

  • मां ब्रह्मचारणी की पूजा में पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन का प्रयोग किया जाता है.
  • पूजन आरंभ करने से पूर्व मां ब्रह्मचारिणी को दूध, दही, शर्करा, घृत और शहदु से स्नान कराया जाता है.
  • इसके बाद मां ब्रह्मचारणी को प्रसाद अर्पित करें.
  • इस क्रिया का पूरा करने के बाद आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट करनी चाहिए.
  • इसके बाद ही स्थापित कलश, नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता और ग्राम देवता की पूजा करनी चाहिए.

कौन हैं मां ब्रह्मचारिणी

माना जाता है कि मां ब्रह्मचारिणी ने पर्वतराज हिमालय और मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया था. भगवान शंकर को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ने कठिन तपस्या की थी. माता ब्रह्मचारिणी ने एक हजार साल तक फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया. हर मुश्किलों का सामना करते हुए उन्होंने शिव शंकर को पाने के लिए आराधना की.

वह केवल सूखे बिल्व पत्र खाकर अपना पेट भरती थीं. पर जब शिव शंकर उनकी तपस्या से प्रसन्न नहीं हुए तो उन्होंने बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिया और निर्जल और निराहार रहकर कठोर तपस्या करने लगीं. उनकी तपस्या को देखकर सभी देवी-देवता प्रसन्न हुए. वहीं ब्रह्मचारिणी की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें वरदान मांगने के लिए कहा और मनोवांछित वरदान पाने के बाद उनकी शादी भगवान शंकर से हुई.

 

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