राम मंदिर भूमिपूजन: अयोध्या में जन्मभूमि का ताला खुलवाने का तिलिस्म, पढ़ें- चौंकाने वाले दावों का कड़वा सच

वोट बैंक की तत्कालिक राजनीति ने राजीव गांधी से अयोध्या में ताला खुलवा दिया. वे इसके दूरगामी नतीजों से बेखबर थे. इस नाकाम रणनीति से कांग्रेस न इधर की रही न उधर की. मुसलमान ताला खुलने से कांग्रेस से नाराज हुआ. और हिंदू मंदिर बनवाने के लिए भाजपा के पास...

लखनऊ की चलती फिरती ‘इन्साइक्लोपीडिया’ थे टंडनजी, प्लेन हाइजैकर को ऐसे किया था काबू

हज़रतगंज के कॉफी हाउस के कहकहे हों या फिर चौक में राजा की ठण्डई की दुकान के अट्टहास, टण्डन जी की उपस्थिति चौतरफ़ा थी. उनके पास साहित्य, संगीत और नबाबी खानपान के अनगिनत क़िस्सों के पिटारे थे.

कबीर, कुमार गंधर्व के नजदीक प्रभाषजी किसी और वजह से नहीं, बल्कि अपनी अक्खड़ता-फक्कड़ता के कारण थे

प्रभाष जोशी (Prabhash Joshi) होने का मतलब उसे ही समझाया जा सकता है, जो गांधी, विनोबा, जयप्रकाश, कबीर, कुमार गंधर्व, सी.के. नायडू और सचिन तेंदुलकर होने का मतलब जानता हो.

पाखंड के विरोधी परम वैष्णव प्रभाषजी ने पत्रकारिता में दिखाया था ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’

नामवर सिंह के शब्दों में—‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ क्या है इसका अहसास प्रभाषजी का गद्य पढ़ने से होता है. उनका गद्य हाथ कते, हाथ बुने, हाथ सिले खादी के परिधानों की तरह और तुलसी के शब्दों में ‘विशद गुनमय फल’ वाला है.

अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

अयोध्या मामले से दो बातें साफ होती हैं. प्रभाषजी लिखने की आजादी के किस हद तक पक्षधर रहे. क्या कोई संपादक संपादकीय लेखों और खबरों में अलग-अलग लाइन की छूट दे सकता है? दूसरी बात यह कि भगवा बिग्रेड से प्रभाषजी आ​‍खिर क्यों नाराज हो गए. यह अब तक लोगों...

आखिर कैसे पहुंचें कैलास मानसरोवर? पढ़िए- यात्रा से पहले उठने वाले हर एक जरूरी सवाल का जवाब

कैलास तक जाने के लिए तीन रास्ते हैं. एक रास्ता भारत के उत्तराखंड से होकर गुजरता है. इस रास्ते में मुश्किलें ज्यादा हैं, क्योंकि यह रास्ता अधिकतर पैदल और ट्रैकिंग का है. भारत सरकार इसी रास्ते लोगों को भेजती है. दूसरा रास्ता थोड़ा आसान है. इसमें नेपाल की राजधानी काठमांडू...

फोर्स और हैप्पी लैंडिंग के बीच अटकी रहीं सांसें, कैलास मानसरोवर से लौटकर नहीं मानता बावरा मन

ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है. जो इस काया के साथ देखते हैं, सिद्ध होते हैं. न हम सिद्ध थे, न मरे. फिर भी अहसास किया. अगर इस अहसास का आपको सहभागी बना पाया तो यह मेरा पुण्य, नहीं बना पाया तो मेरी असफलता. लौटने के बाद भी...

काश न आता वो बर्फानी तूफान तो Kailash इलाका Kashmir की हिंदू रियासत में होता, पढ़िए जोरावर कथा

पहले विदेश मंत्रालय (MEA) विज्ञापन छपवाकर आवेदन मंगाता है, फिर लॉटरी से नाम निकाले जाते हैं; क्योंकि सरकार वहां हर साल केवल 500 लोगों को ही भेजती है. हर यात्री को यात्रा के लिए कुछ वित्तीय मदद (Financial Help) भी सरकार देती है.

तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

तिब्बत पहले भारत और चीन के बीच एक प्राकृतिक दीवार था, बफर जोन. अब तिब्बत का अस्तित्व मिट जाने के बाद चीन हमारे सिर पर खड़ा मिलता है. उत्तराखंड के चमोली से लेकर अरुणाचल के तवांग तक उसकी सड़कें भारतीय सीमा को छूती हैं. इस सरहद पर हर रोज हम...

तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

चीनी हमले से पहले राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा. भारत से उसका नाता बौद्ध धर्म के तिब्बत में प्रवेश के साथ शुरू हुआ. सन् 1249 से 1368 तक यहां मंगोलों का शासन था. 1649 से 1910 तक तिब्बत मंचू आधिपत्य में रहा. उसके बाद सन्...

18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी झील है गौरी कुंड, बर्फ हटाकर करते हैं स्नान

डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लगा कि हाथ बढ़ा कैलास को छू लूं. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार.

45 किलोमीटर में फैला 22 हजार फीट ऊंचा कैलास, यहां हर गोंपाओं पर दिखता है चीनी आतंक का असर

किसी जमाने में बौद्ध गोंपा व मठ संस्कृत तथा पालि ग्रंथों से भरे पड़े थे. सन् 1920 से 1930 के बीच महापंडित राहुल सांकृत्यायन याक पर लाद ढेर सारे ग्रंथ भारत लाए थे. दलाई लामा भी अपने साथ कुछ लाए. लेकिन काफी महत्वपूर्ण हस्तलिखित ग्रंथों को चीनियों ने जला दिया....

एक बार के स्नान से तर जाती हैं सात पीढ़ियां, पढ़िए आखिर क्या है मानसरोवर के प्रवाह का तिब्बती कनेक्शन?

समुद्र-तट से 15,000 फीट ऊंचाई पर स्थित इस मानसरोवर झील की गहराई 300 फीट है. तिब्बती इसे ‘त्सो मावांग’ कहते हैं. मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे पुरानी झील. झील की परिधि 87 किलोमीटर है. कुल 350 किलोमीटर का क्षेत्रफल है इसका. इस झील के पास से चार नदियां भी...

रात 9 बजे तक रहता है मानसरोवर में उजाला, ये अमृत है तो 15 हजार फीट की ऊंचाई पर राक्षसताल विष

मैं मानसरोवर की ओर बढ़ा. कोई पचास कदम चलने के बाद सरोवर के किनारे था. नीला पारदर्शी जल, हमारी सभ्यता का पवित्रतम जल. उसे सिर पर रखा. आचमन किया. सामने चमक रहे कैलास को प्रणाम किया और मंत्रमुग्ध-सा खड़ा देखता रहा. इस सन्नाटे का भी एक संगीत था.

मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है तकलाकोट, सख्त-बेरहम और बदजुबान थे चीनी पुलिसवाले

तिब्बत पर पांव रखते ही अहसास हुआ, अरे, ये तो हमारे सारनाथ जैसा है. स्थानीय लोगों का व्यवहार बड़ा आत्मीय था. यहां भाषा फेल थी, न हिंदी, न अंग्रेजी, बातें आंखों और इशारों से हो रही थीं. भाषा के नाम पर गांव के बच्चे, बाजारवाले सभी नारे लगाते हैं—‘ॐ नम:...

26 की जगह 5 दिनों में करने की ठानी कैलास मानसरोवर यात्रा, जाने से पहले करिए ये जरूरी तैयारियां

कैलास मानसरोवर की सरकारी यात्रा 26 दिनों की होती है. नेपाल के रास्ते कुछ टूर ऑपरेटर पंद्रह रोज में ‘लैंडक्रूजर’ गाड़ियों से यात्रा कराते हैं. पर हमने महज पांच रोज में यात्रा करने की ठानी नेपाल की एक टूरिस्ट एजेंसी की मदद से. सात सीटोंवाले एक चार्टेड हेलीकॉप्टर के जरिए.

मिथ नहीं है महादेव शिव की तीसरी आंख, पढ़ें- क्या कहते हैं पौराणिक शास्त्र और आधुनिक विज्ञान

यह तीसरी आंख सिर्फ ‘मिथ’ नहीं है. आधुनिक शरीर-शास्त्र भी मानता है कि हमारी आंखों की दोनों भृकुटियों के बीच एक ग्रंथि है और वह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा है. रहस्यपूर्ण भी. इसे पीनियल ग्रंथि कहते हैं. जो हमेशा सक्रिय नहीं रहती, पर इसमें संवेदना ग्रहण करने की अद्भुत...

सिर्फ शिव हैं जो मरते नहीं, आइए चलें कैलास जहां घोर नास्तिक भी जाकर होता है नतमस्तक

सृष्टि की शुरुआत से शिव अकेले ऐसे देवता हैं, जिनकी निरंतरता बनी हुई है. वे या तो कैलास पर रहते हैं या फिर श्मशान में, और काशी—यह तो महाश्मशान है. शिव उसके अधिपति हैं. इसी तार के जरिए काशी और कैलास का मेल बनता है. दोनों के मूल में शिव...

काशी की प्राणवायु हैं धूप, अगरबत्ती, गांजे, ठहरे पानी की गंध के साथ चिताओं से उठती चिरांध

हर समाज अपने आनंद के कुछ जरिए बनाता है. मणिकर्णिका का समाज मुर्दा फूंक कर आनंद लेता है. शिव काशी के अधिपति देवता हैं. वे महाश्मशान में रहते हैं. यहीं खेलते हैं, यहीं रमते हैं. तभी वसंत में पंडित छन्नूलाल मिश्र इसी घाट पर गाते हैं- ‘खेलें मसाने में होरी...

साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

वह मान नहीं रहा था. मैं ग़ुस्से मे चिल्लाया.अगर मेरा अंतिम संस्कार बनारस में नहींं हुआ, तो मैं नही मरूंगा. वो सकते में आ गया. किसी को बुलाने जाने लगा और मैं उठ कर भागा. भागते भागते सोचने लगा कि कहां मरा जाय....

बेजोड़ द्रौपदी… यूं ही नहीं नतमस्तक है इनके आगे स्त्रीत्व की गरिमा का इतिहास

द्रौपदी संपूर्ण नारी थी. घर की चहारदीवारी में उसने घरेलू महिला की तरह नारी के आदर्श प्रस्तुत किए. वह कार्यकुशल थी और लोकव्यवहार के साथ घर-गृहस्थी में भी पारंगत. पांचों पति उसकी मुट्ठी में थे. अपने कार्य-व्यवहार के कारण वह पांचों पांडवों के लिए सम्मानित थी.

एक अकेली द्रौपदी…! क्यों इनकी बुद्धिमत्ता-पांडित्य के आगे लाचार नजर आते हैं महाभारत के सारे पात्र?

द्रौपदी का चरित्र अनोखा है. पूरी दुनिया के इतिहास में उस जैसी दूसरी कोई स्त्री नहीं हुई. लेकिन इतिहास ने उसके साथ न्याय नहीं किया. दरअसल, भारत की पुरुषप्रधान सामाजिक व्यवस्था उसके साथ तालमेल नहीं बिठा सकी.

बैर कराते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला… जानें- Lockdown में क्यों दारू नहीं दवा है सुरा?

शराब (Liqour) पर कोई राय कायम करने से पहले उसके इतिहास और परंपरा (History and tredition) को जानना चाहिए. सुरा और सोम का शास्त्रों में विशद वर्णन है. देवासुर संग्राम में सागर मंथन से निकले चौदह रत्नों मे एक वारुणी सुरा भी है. इसका प्रचलित नाम मदिरा है.

सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

कई मित्र सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हो जाते हैं. कई ऐसे भी हैं जो अंग्रेजी को सोम और देशी को सुरा कहकर संबोधित करते हैं. अगर इसके पीछे उनका आशय शराब के वर्ग विभाजन से है तो वे कुछ हद तक सही भी हैं. पर मदिरा की परंपरा...

Corona काल में समझिए ‘बदनाम’ तौलिए से क्यों अलग और बेहतर है ‘राष्ट्रीय पोशाक’ गमछा?

भला हो नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) जी का जिन्होंने गमछे को राष्ट्रीय वस्त्र का दर्जा दिला दिया. करोना (Coronavirus) से बचाव के लिए उसे मुंह पर बांधने की सलाह देकर. प्रधानमंत्री का कहना था कि मंत्री से लेकर संतरी तक सब उसे मुंह पर लपेटे घूम रहे हैं. वरना तौलिए...

बांका रसीला आम… जिस साल नहीं खाया, उस साल को ही उम्र से कम कर देना चाहिए

लॉकडाउन की मर्यादाओं का पालन करते हुए जितना भी हो सके आम का रस लीजिए. आम के इतिहास को समझिए. उसकी परंपरा से वाकिफ होइए. उसकी किस्मों को समझिए. जिंदगी में मिठास भरिए और जिंदगी में कितना भी खास होने के बावजूद 'आम' होने के जमीनी अहसास को बनाए रखिए.

करामाती और विशिष्ट गुणों वाले लड्डुओं के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र, पढ़िए डिटेल में

सोंठ, शतावर, गोरखमुंडी,गोंद मकरध्वज, कस्तूरी, अंबर गोठ, कामराज ,विजया को मिलाकर बनने वाले लड्डू करामाती होते हैं. आयुर्वेद और यूनानी में इन सारे तत्वों को बाजीकरण और पौरूष बढ़ाने वाली कारगर औषधियों के रूप में जाना जाता है.

Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

होली प्रेम की वह रसधारा है, ऐसा उत्सव है, जो हमारे भीतर के कलुष को धोता है. होली में राग, रंग, हँसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती है. इस त्योहार से सामाजिक विषमताएँ टूटती हैं, वर्जनाओं से मुक्ति का अहसास होता है, जहाँ न कोई बड़ा है, न छोटा;...

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से अयोध्या में बना था भीड़ का माहौल!

ढांचा गंवाने के बाद हाईकोर्ट भी सक्रिय हुआ. जिस फैसले का सबको इंतजार था, वह 11 दिसंबर, 1992 को हाईकोर्ट ने सुनाया. अगर यह फैसला 5 रोज पहले आ जाता तो ढांचा बचाया जा सकता था.

‘हम देखेंगे’: हिंदू या मुसलमान के खिलाफ नहीं, फैज की कलम ने तो इंकलाब के रंग भरे

फ़ैज़ और उनकी मशहूर नज़्म के साथ आज हो रहा है, अगर यही सोच चार सौ साल पहले कबीर के वक्त होती तो कबीर को भी थाने में बन्द कर दिया जाता, क्योंकि वे भी 'जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ' का ऐलान कर रहे थे.