पारिवारिक कलह से परेशान 15 साल के बेटे ने मांगी इच्छा मृत्यु, जानिए भारत में क्या है रूल?

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2018 में ही इच्छामृत्यु का अधिकार दिया है लेकिन कुछ शर्तों के साथ.

पटना: बिहार के भागलपुर जिले के रहने वाले एक किशोर ने पारिवारिक कलह से तंग आकर इच्छा मृत्यु का अनुरोध किया था. इस पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने जिला प्रशासन से मामले की जांच करने को कहा है.

भागलपुर जिले के कहलगांव थाना अंतर्गत महिषामुंडा गांव निवासी मनोज कुमार मित्रा के बेटे कृष कुमार मित्रा (15) ने पारिवारिक कलह से तंग आकर करीब दो महीने पहले राष्ट्रपति को पत्र भेजकर इच्छा मृत्यु का अनुरोध किया था.

राष्ट्रपति को भेजे पत्र की प्रतिलिपि कृष ने प्रधानमंत्री, बिहार के मुख्यमंत्री समेत आला अधिकारियों को भेजी है. सरकारी सूत्रों ने मंगलवार को बताया कि प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर जिला प्रशासन मामले की जांच कर रहा है.

कृष ने आरोप लगाया है कि मां की प्रताड़ना और उनके द्वारा मुकदमेबाजी किए जाने तथा असमाजिक तत्वों द्वारा बार-बार धमकी दिए जाने से वह परेशान है. ऐसे में अब उसे जीवित रहने की इच्छा नहीं रह गई है.

कृष के पिता मनोज, जो कि कैंसर पीड़ित हैं, ग्रामीण विकास विकास विभाग देवघर में जिला प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं जबकि उनकी मां सुजाता इंडियन ओवरसीज बैंक पटना में सहायक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं. कृष अपने पिता के साथ रहता है और एक स्कूल में 9वीं कक्षा का छात्र है.

मनोज और उनकी पत्नी के बीच लंबे अरसे से विवाद चल रहा है, जिसके चलते दोनों अलग रह रहे हैं. कृष के दादा संजय कुमार मित्रा कहलगांव एनटीपीसी में वर्कमैन के पद से रिटायर हो चुके हैं. दादा समेत उसके चाचा तथा अन्य परिवारवालों ने भी सुजाता के बर्ताव को पूरी तरह अनुचित ठहराया है.

भारत में किसे है इच्छामृत्यु का अधिकार?

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2018 में ही इच्छामृत्यु का अधिकार दिया है लेकिन कुछ शर्तों के साथ.

कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को ये फ़ैसला लेने का पूरा अधिकार है कि अगर उसके ठीक होने की उम्मीद नहीं है तो उसे लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की मदद से ज़िंदा ना रखा जाए. उस व्यक्ति के फ़ैसले का डॉक्टर और उनके परिवार को सम्मान करना होगा.

किसी की भी पैसिव यूथेनेसिया और इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) क़ानूनी रूप से मान्य होगी. यानी कोई भी व्यक्ति लिविंग विल छोड़कर जा सकता है कि अगर वो अचेतअवस्था में चला जाए और स्थिति ऐसी हो कि अब सिर्फ कृत्रिम लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की मदद से ही उसे ज़िंदा रखा जा सकता है, उस हालात में उसकी वसीयत का सम्मान किया जाए.

अगर कोई व्यक्ति अचेत है और विल नहीं लिखी है और उसे सिर्फ़ लाइफ सपोर्ट सिस्टम से ही ज़िंदा रखा जा सकता है. तो उसका इलाज करने वाले डॉक्टर और उसके परिजन मिलकर फ़ैसला ले सकते हैं.