Bihar: बिखरी हुई कांग्रेस और निष्क्रिय पड़ी आरजेडी, जल्द खुल सकती है महागठबंधन की गांठ

बिहार में महागठबंधन का तिलिस्म टूटने वाला है. लोकसभा चुनाव की मार आरजेडी-कांग्रेस पर ऐसी पड़ी कि दोनों अब तक कमर सीधी कर नहीं सकी हैं. संकेत मिल रहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में दोनों अलग रास्ते लेंगी.

कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन टूट के कगार पर है. मंगलवार को कांग्रेस की तरफ से इस ओर संकेत भी कर दिया गया. अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मीडिया पैनलिस्ट और वरिष्ठ विधायक प्रेमचंद्र मिश्रा ने कहा कि बिहार में लोकसभा चुनाव को देखते हुए गठबंधन बनाया गया था. अब जब चुनाव खत्म हो चुके हैं तो ज़रूरी नहीं कि 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव भी पहले वाला गठबंधन ही लड़े.

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उन्होंने जेडीयू का नाम लिए बगैर कहा कि अगर स्थिति बदलती है तो कांग्रेस समान विचार की दूसरी पार्टियों के साथ भी हाथ मिला सकती है. आपको याद दिला दें कि 2015 में कांग्रेस, जेडीयू और आरजेडी ने मिलकर महागठबंधन बनाया था और बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को ज़ोरदार मात दी थी. उससे पहले 2014 में एनडीए छोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने बिहार में लोकसभा चुनाव अलग लड़ा था लेकिन महज़ 2 सीटों पर सिमटने के बाद वो समझ गए कि उन्हें किसी गठबंधन के साथ जाना ही होगा. तब बिहार में बीजेपी का सामना जिस महागठबंधन से हुआ था उसमें नीतीश नहीं थे. राज्य विधानसभा चुनाव से पहले ही नीतीश महागठबंधन के साथी हुए पर जल्द ही उनकी वापसी एनडीए में हो गई.

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Amit Shah and Nitish Kumar

वैसे बिहार के महागठबंधन में पहली दरार तब ज़ाहिर हो गई थी जब जीतनराम मांझी ने कहा था कि राज्य में वो अकेले ही विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. इसकी वजह उन्होंने महागठबंधन में तालमेल ना होना बताया था. उनका सबसे ज़्यादा गुस्सा आरजेडी के खिलाफ था.

असल में आरजेडी बिहार विधानसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल है लेकिन लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने के बाद से तेजस्वी यादव निष्क्रिय पड़े हैं. लालू पहले ही जेल और फिर अस्पताल में हैं. तेज प्रताप यादव बागी बन चुके हैं और फिलहाल तो तलाक के मामले में उलझे हुए हैं. लगता भी नहीं कि अभी पार्टी संगठन को फिर से सुधारने को लेकर गंभीर है. वैसे मांझी की धमकी को भी आरजेडी ने गंभीरता से नहीं लिया था. तब लालू के खास भाई वीरेंद्र ने दो टूक कहा था कि जो चाहे वो गठबंधन छोड़कर जा सकता है. ये किसी से छिपा नहीं कि मांझी ने नीतीश कुमार के साथ भी पटरी बैठाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं.

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दूसरी तरफ कांग्रेस है जो लोकसभा चुनाव में मात खाने के बाद होश में भी नहीं आ सकी कि अनुच्छेद 370 पर बंटे बोल बोलने लगी. राहुल गांधी कुर्सी छोड़कर जा चुके हैं और सोनिया को फिर से अध्यक्ष पद संभालना पड़ा है. अभी मालूम नहीं कि बिहार में सहयोगी दलों के साथ तालमेल कौन बैठाएगा. संगठन भी खस्ताहाल ही है. ऐसे में बिखरी बिखरी कांग्रेस और निष्क्रिय पड़ी आरजेडी का साथ टूटता भी है तो आश्चर्य कैसा..