नीतीश कुमार बीजेपी के साथ लेकिन धारा 370, समान नागरिक संहिता और अयोध्या से दूरी बरकरार

नीतीश कुमार वोटिंग के आखिरी दौर में मोदी को एक बार फिर पीएम बनाने की बात तो कर रहे हैं लेकिन ढाई दशकों के बाद भी उनके सुर धारा 370, अयोध्या और समान नागरिक संहिता पर पुराने हैं.

लोकसभा चुनाव 2019 का आखिरी चरण समाप्ति की ओर है. माना जा रहा है कि किसी एक दल की सरकार के उलट इस बार भी गठबंधन ही सरकार चलाएंगे. लाख मतभेदों के बावजूद कांग्रेस ने कई-कई दलों को साथ लिया है ताकि मोदी को सत्ता मे वापसी से रोका जा सके, जबकि बीजेपी ने भी सहयोगियों को छिटकने से रोकने के लिए हर कोशिश अंजाम दी है. एनडीए के अहम सहयोगियों में से एक जेडीयू भी है. अपने मूल सिद्धांतों के मामले में वो बीजेपी से उलट सोच रखती है लेकिन फिर भी केंद्र और राज्य में बीजेपी के साथ जुगलबंदी कर रही है.

मतदान के दौरान बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने फिर ऐसे ही बयान दिए जिससे साफ हुआ कि भले ही वो बीजेपी के साथ खड़े हों मगर दोनों दलों के मुद्दों की ज़मीन अलग-अलग ही है. पत्रकारों ने जब पटना में वोट देने जाते नीतीश कुमार से धारा 370 के बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने ना केवल धारा 370 बल्कि समान नागरिक संहिता और अयोध्या पर पुराने स्टैंड को दोहराते हुए कहा कि –  मेरी पार्टी धारा 370 और 35-A को हटाने के पक्ष में नहीं है. इसे लेकर हमारा रुख 1996 से ही साफ है कि हम समान नागरिक संहिता का समर्थन नहीं करेंगे और अयोध्या मसले का समाधान कोर्ट के ज़रिए होना चाहिए.

दरअसल नीतीश कुमार विभिन्न दलों की बुनियादी समझ से पैदा हुए एनडीए के हिस्से हैं. ढाई दशक पहले बीजेपी ने अपने मूल मुद्दों को दरकिनार करके एनडीए का कुनबा तैयार किया था. इस कुनबे की शर्तों के तहत बीजेपी ने कश्मीर को खास दर्जा देनेवाली धारा 370 को हटाने, समान नागरिक संहिता लागू करने और अयोध्या में मंदिर निर्माण के आक्रामक अभियान की मांग को छोड़ा था. बीजेपी ने अपने मुद्दे छोड़े तो कई दल जो उसे अब तक अछूत मान रहे थे साथ चले आए. नीतीश और उनकी पार्टी भी बीजेपी के पाले में ऐसी ही समझ के साये तले आए थे. समय गुज़रने के साथ बीजेपी देश में मज़बूत हुई और उसने धीरे-धीरे अपने मूल मुद्दों को फिर ज़िंदा करना शुरू कर दिया.

अटल बिहारी वाजपेयी और जॉर्ड फर्नांडीज़ ने जिस एनडीए को जोड़ा था उसने देश में तीन बार सत्ता का स्वाद चखा. कांग्रेस ने बीच में झटके दिए तो एनडीए के घटक दलों को समझ आया कि मतभेदों के बावजूद सभी को सभी की ज़रूरत है. जेडीयू ने बहुत थोड़े वक्त के लिए एनडीए का साथ छोड़ा था मगर बहुत तेज़ी से वापसी की. उसकी तरह कई दल एनडीए में जाते-आते रहे हैं पर बीजेपी इस लंबे चौड़े परिवार की मुखिया थी और बनी हुई है. दूसरी तरफ एनडीए के दूसरे दल अभी भी बीजेपी के छोटे भाई ही बने हुए हैं. ऐसे में जब भी बीजेपी खेमे की तरफ से 3 मूल मुद्दों को पूरा करने की मांग उठती है तब सहयोगी भी अपने पुराने रुख को साफ करने के लिए मजबूर होते हैं. नीतीश कुमार वही कर रहे थे. 1996 का अपनी पार्टी का पुराना रुख याद दिला रहे थे. हालांकि ध्यान रहे कि वो खुद आज जिस पार्टी के सिरमौर हैं खुद उसका निर्माण 2003 में हुआ था जिसके शिल्पकार शरद यादव, लोकशक्ति पार्टी और समता पार्टी थे.