बारिश और ओला ने बढ़ाई लीची किसानों की मुसीबत, अच्छी पैदावार के बाद भी हो सकता है नुकसान

लीची (Litchi) के फल आने में दो हफ़्तों का समय है. लीची अनुसंधान केंद्र निदेशक कहते हैं कि मार्केटिंग, पैकिंग और ट्रासंपोर्टेशन की तैयारी जारी है. साथ ही सरकार को पत्र भेजकर लीची की बिक्री से संबंधित संसाधन की व्यवस्था कराने की मांग की गई है.
Litchi cultivation in Bihar, बारिश और ओला ने बढ़ाई लीची किसानों की मुसीबत, अच्छी पैदावार के बाद भी हो सकता है नुकसान

देश-विदेश में पहचान बना चुकी बिहार की लीची (Litchi) के उत्पादक किसान इस साल चिंता में हैं. मुजफ्फरपुर जिले सहित उत्तर बिहार (North Bihar) के लीची उत्पादकों को इस साल बेहतर पैदावार होने की संभावना है, लेकिन अब तक बाहर से खरीददार व्यापारियों के नहीं पहुंच पाने के कारण वे मायूस हैं.

अच्छी पैदावार होने के बावजूद भी किसानों को नुकसान होने की आशंका है. हालांकि, सरकार और लीची अनुसंधान केंद्र किसानों को हर तरह से मदद देने का आश्वासन दे रही है. लीची के किसानों का कहना है कि भरपूर पैदावार के बीच भी इस साल नुकसान हो सकता है. इस बीच, हाल के दिनों में हुई बारिश और ओलावृष्टि ने भी उनकी इस आशंका को और बढ़ा दिया है.

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लीची के प्रमुख किसान और बिहार लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह (Bacha Prasad Singh) ने कहा कि “लीची खरीदने के लिए अभी तक कोई ठेकेदार या खरीददार इस साल आगे नहीं आए हैं. आमतौर पर वे मार्च के आखिरी सप्ताह में आते हैं या कटाई शुरू होने से पहले अप्रैल के पहले सप्ताह तक यहां पहुंच जाते हैं.”

खरीददार यहां आकर बगीचे में लगे लीची के फलों को देखकर अनुमान के अनुसार ही उनकी खरीद कर लेते हैं. सिंह कहते हैं कि सरकारी अधिकारी हमें बाजार मिलने और लीची को लाने-ले जाने (ट्रासंपोर्टेशन) का विश्वास भी दिला रहे हैं, लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि इसमें वे कितना सफल हो पाते हैं.

मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) के औराई निवासी लीची किसान दिनेश प्रसाद कहते हैं कि यह क्षेत्र शाही लीची के लिए प्रसिद्ध है, जो अन्य किसी भी प्रजाति के लीची से ज्यादा मीठी और रसीली होती है. इस वर्ष पेड़ों पर फूल और फल देखकर अच्छी फसल के संकेत मिल रहे हैं. वे कहते हैं कि पिछले दो साल से लीची की वजह से एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) होने की अफवाह से लीची व्यापारियों की संख्या कम हुई थी, लेकिन वैज्ञानिकों के इसे नकार दिए जाने के बाद बाजार के फिर उठने की संभावना है.

तिरहुत (Tirhut) क्षेत्र के कृषि विभाग के संयुक्त निदेषक सुरेंद्र नाथ (Surendra Nath) कहते हैं, ”राज्य में कुल लीची का 70 प्रतिशत उत्पादन इस क्षेत्र में होता है. लीची उत्पादन के लिए मुजफ्फरपुर देश में सबसे आगे है. बिहार में कुल 32 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती होती है. अकेले मुजफ्फरपुर में 11 हजार हेक्टेयर में लीची के बाग हैं. राज्य में पिछले साल 1,000 करोड़ रुपये का लीची का व्यवसाय हुआ था. इनमें मुजफ्फरपुर की भागीदारी 400 करोड़ रुपये थी. इस बार 500 करोड़ रुपये से ज्यादा के कारोबार होने की उम्मीद है.”

मुजफ्फरपुर के अलावा बिहार में वैशाली, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, कटिहार और समस्तीपुर में भी लीची के बगीचे हैं. सुरेंद्र नाथ कहते हैं कि ठेकेदार भूमि मालिकों को अग्रिम भुगतान (Advance Payment) करने के बाद, दो से तीन साल के लिए पट्टे पर जमीन लेते हैं और फिर अलग-अलग बाजारों में फल बेंचने के बाद बाकी का भुगतान करते हैं.

इधर, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विशालनाथ (Vishalnath) ने कहा कि यहां लीची की बिक्री दो स्टेज में होती है. पहली स्थिति में व्यापारी किसानों को कुछ पैसा पहले दे देते हैं, जबकि दूसरी स्थिति में किसान फल तैयार होने पर बेंचते हैं. कई व्यापारी तीन-तीन साल के लिए बाग खरीद लेते हैं.

इस साल भी व्यापारी और किसान एक-दूसरे के संपर्क में हैं. लीची के फल आने में दो हफ़्तों का समय है. हालांकि, निदेशक कहते हैं कि केंद्र लीची की मार्केटिंग, पैकिंग और ट्रासंपोर्टेशन की तैयारी कर रहा है. सरकार को पत्र भेजकर लीची की बिक्री से संबंधित संसाधन की व्यवस्था कराने की मांग की गई है.

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