भारत में जीडीपी के डेटा पर क्यों मचा है बवाल, आगे क्या रंग दिखाएगी भारतीय अर्थव्यवस्था?

GDP के आंकड़े आने के बाद कई अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों, economy पर लिखने वाले पत्रकारों और विपक्षी राजनीतिज्ञों को केंद्र सरकार को निशाने पर लेने का मौका मिल गया.

  • Vishnu Shankar
  • Publish Date - 8:17 pm, Wed, 2 September 20

आज बात करेंगे भारत में GDP के डेटा को लेकर हो रहे बवाल की और देखेंगे कि आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था (indian economy) क्या रंग दिखाएगी.  आप को याद होगा अगस्त का महीना जाते जाते बुरी खबर दे गया.  भारत की GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद दर पिछली तिमाही की तुलना में ज़ोर से गिरी. आंकड़ों के हिसाब से 23.9 प्रतिशत. GDP नंबर दर्शाते है कि पूरे साल भर या एक तिमाही में देश की फैक्ट्रियों, सर्विसेज और खेतों में कितना उत्पादन हुआ और पिछले साल या तिमाही की तुलना में यह घटा या बढ़ा.

GDP के आंकड़े आने के बाद कई अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों, economy पर लिखने वाले पत्रकारों और विपक्षी राजनीतिज्ञों को केंद्र सरकार को निशाने पर लेने का मौका मिल गया. मायूसी का आलम ये था कि लगा अब आगे के लिए कोई उम्मीद ही नहीं बची है.
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि 31 अगस्त को आये आंकड़े अर्थव्यवस्था में आयी भारी मंदी का प्रभाव दिखा रहे थे. और ये सच थे.

लेकिन सच्चाई यह भी है कि Covid की मार के बाद सभी लोग ऐसे ही आंकड़ों की आशंका से ग्रस्त थे. यानी यह कोई सरप्राइज या हैरत की बात नहीं थी कि महामारी के प्रकोप से, 130 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में जब हर प्रकार का उत्पादन, आवाजाही और क्रय विक्रय बंद होगा तो विकास दर तो गिरेगी ही.

यह भी याद रखना होगा कि Covid की मार के पहले, पिछले आर्थिक वर्ष 2019-20 की अंतिम तिमाही, जनवरी से मार्च 2020 में भी अर्थव्यवस्था थकी हुई लग रही थी.  उस समय GDP केवल 3.1 प्रतिशत बढ़ी थी, जब कि 2018-19 की अंतिम तिमाही में यह 5.7 प्रतिशत रही थी.

यहाँ आपको यह बताते चलें कि भारत का वित्तीय वर्ष साल के अप्रैल महीने से अगले साल के मार्च महीने तक चलता है. वित्तीय वर्ष में चार तिमाही होती हैं और GDP के नंबर साल के के अंत में तो आते ही हैं, हर तिमाही में भी आते हैं,  लेकिन, ये एक तिमाही पीछे चलते हैं.

उदाहरण के लिए, अभी हम वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में हैं, जो सितम्बर, यानी इसी महीने के अंत में ख़त्म होगी.  लेकिन 31 अगस्त को जो GDP के आंकड़े आये, वह पिछली तिमाही यानी वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के थे.

Lockdown 1 चौबीस मार्च को लागू हुआ था और UNLOCK 1 एक जून से शुरू हुआ.  केंद्र सरकार और राज्य सरकारें UNLOCK की प्रक्रिया शुरू होने के बाद धीरे धीरे आर्थिक गतिविधियों की इजाज़त देने लगीं, और इससे अर्थव्यवस्था में कुछ movement दिखने लगी. जून का महीना कुछ आशा ले कर आया था. लेकिन जुलाई और अगस्त में जैसे जैसे Covid पैर पसारता गया कई राज्य सरकारें अपने अपने विवेक के हिसाब से lockdown लगाती हटाती रहीं. इससे अर्थव्यवस्था की गति में व्यवधान आया, क्योंकि बंद पड़ी किसी भी चीज़ को आप स्टार्ट-स्टॉप से चलाएंगे तो स्पष्ट है उसे गति पकड़ने में समय तो लगेगा ही.

ग़ौरतलब तथ्य यह है कि अब, साल की दूसरी तिमाही में, भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे धीरे ही सही, बेहतर हो रही है.
इस तथ्य को साबित करने के लिए आंकड़े उपलब्ध हैं.

* ऑटो सेक्टर ने अप्रैल महीने में ज़ीरो सेल रजिस्टर की थी, लेकिन जुलाई से आशा की किरण दिखने लगी है.
महिंद्रा एंड महिंद्रा ने इस महीने ट्रैक्टर्स की अब तक की सबसे ज़्यादा बिक्री रजिस्टर की.
पैसेंजर गाड़ियों में मारुती सुजुकी और हुंडई ने 1st टाइम बायर्स और एक से ज़्यादा कारें रखने वालों में अच्छी डिमांड रिपोर्ट की.

* GST कलेक्शन में भी धीरे धीरे सुधार हो रहा है. अगस्त 2020 का कलेक्शन पिछले साल अगस्त महीने के कलेक्शन से सिर्फ 12 प्रतिशत काम रहा.

* मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में PMI यानी purchasing managers index जून में बढ़ा और जुलाई में नीचे आया.
इसकी वजह कई राज्य सरकारों द्वारा lockdown लगाना, उठाना या उनकी तारीखों में चेंज करना था.
जून में यह 47.2 था, लेकिन जुलाई में 46 पर आ गया.
purchasing managers index मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की यूनिट्स की आर्डर बुक्स की हालत दर्शाता है.
यानी अगर आर्डर बुक फुल है तो यह आंकड़ा 50 से ऊपर होगा, नहीं तो नीचे, जिसका मतलब होता है कि इकोनॉमी सिकुड़ रही है.

* E-Way Bills अर्थव्यवस्था में सामान की आवाजाही का एक भरोसेमंद सूचक है.
इस साल जुलाई महीने के E-Way Bills से हुआ कलेक्शन, पिछले साल जुलाई के कलेक्शंस से सिर्फ 7.3 प्रतिशत कम था.
जून और जुलाई 2020 की बात करें तो राज्यों के भीतर E-Way Bills कलेक्शन जुलाई में 9.1 प्रतिशत बढ़ा. अंतर्राज्यीय कलेक्शन 15.3 प्रतिशत से ऊपर गया.

*भारत में पेट्रोल की खपत भी बढ़ रही है. जुलाई 2020 में यह पिछली जुलाई के मुकाबले पेट्रोल की मांग सिर्फ 8 प्रतिशत कम रही.
लेकिन डीज़ल की मांग अभी भी ठंडी है.
इसकी वजह औद्योगिक राज्यों में लोकल लेवल पर lockdown और बारिश और बाढ़ की मार के चलते खेती, ट्रांसपोर्ट और रियल्टी सेक्टर में डिमांड की कमी रही.

*सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2020 में ग्रामीण सेक्टर में मनरेगा के तहत 15 करोड़ 70 लाख लोगों को काम मिला, जो पिछले साल अगस्त महीने से सिर्फ 40 लाख ज़्यादा है.

इसका मतलब है कि आप्रवासी मज़दूर अब काम के लिए शहरों और औद्योगिक केंद्रों की ओर लौट रहे हैं. इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि राज्य सरकारों के पास पैसे की कमी के चलते और भारी वर्षा की के कारण गांवों में कम रोज़गार मिला.

इसी से जुडी एक और अच्छी खबर यह है की मनरेगा की तर्ज़ पर केंद्र सरकार शहरों में भी एक रोज़गार कार्यक्रम शुरू करने जा रही है जिसका बजट 35 हज़ार करोड़ का होगा. इस कार्यक्रम की शुरुआत छोटे शहरों से की जाएगी क्योंकि बड़े शहरों में अधिकतर प्रोसेशनल्स की ज़्यादा मांग रहती है.

कृषि क्षेत्र में आपको मालूम ही है, इस साल की पहली तिमाही में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. तो धीरे धीरे ही सही भारतीय अर्थ व्यवस्था वापस पटरी पर लौट रही है. अक्टूबर से लेकर दिसंबर का समय भारत में बिज़नेस के लिए सबसे अच्छा माना जाता है.  इस साल अब तक अधिकतर लोगों ने ज़रुरत के अलावा कोई खर्च नहीं किया है. त्यौहार का समय नज़दीक है. बिज़नेस क्लास को इस बार दशहरा, दीवाली से बड़ी उम्मीदें हैं. अगर Covid महामारी की दवाई मिल गयी तो भारतीय इकॉनमी निश्चित ही रफ़्तार पकड़ सकती है.