लूटघर : न घर मिला, न दुकान, प्रशासन भी नहीं कर रहा खरीदारों की मदद

उत्तराखंड (Uttrakhand) में लोग बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर बिल्डरों (Builders) से मिल रहे धोखे से परेशान हैं. सालों के इंतजार के बाद भी उन्हें न मकान मिला न दुकान.
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साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड (Uttrakhand) बना तो राज्य में नए उद्योगों की भरमार लग गई. उधम सिंह नगर जैसे जिलों में इंडस्ट्रियल एरिया बने. सैकड़ों नामी गिरामी कंपनियों ने अपने प्रोजेक्ट लगाए. साथ ही हाउसिंग सोसाइटी (Housing Society) और शॉपिंग मॉल (Shopping Mall) बनने लगे और बाजार में बिल्डर भी उतर आए.

पिछले कुछ सालों में तस्वीरें बदल गई हैं. आशियानों का सपना दिखाने वाले बिल्डरों की हकीकत सामने आ गई है. उत्तराखंड के रुद्रपुर में सुपरटेक के रिवरक्रेस्ट प्रोजेक्ट पर खरीदार यही आरोप लगा रहे हैं. आरोप है कि राज्य सरकार से लीज पर ली गई जमीन पर बिल्डिंग बननी तो शुरू हुई लेकिन बिल्डर ने सरकार का बकाया नहीं चुकाया तो वसूली नोटिस के साथ ही प्रोजेक्ट सील कर दिया गया.

धीरज शर्मा और अमित अग्रवाल जैसे होम बायर्स को बिल्डर ने 18 महीने में घर देने का वादा किया लेकिन डेडलाइन खत्म हुए महीनों बीत चुके हैं. वो कहते हैं कि इंतजार बढ़ता जा रहा है और अब तो प्रोजेक्ट के भविष्य पर ही सवालिया निशान लग गया है.

नहीं मिली दुकानें

उत्तराखंड के रुद्रपुर में सुपरटेक के मेट्रोपोलिस मॉल पर भी यही आरोप है. ये शॉपिंग मॉल 2015 से चालू है. 2018 में संजय कुमार और बलविंदर सिंह ने कारोबार के मकसद से मॉल के ग्राउंड फ्लोर पर तीन दुकानें खरीदी. उनका आरोप है कि आज तक ना तो उन्हें दुकान की NOC मिली और ना ही रजिस्ट्री हुई. उल्टा बिल्डर ने तीनों दुकान रिलायंस डिजिटल को किराए पर दे दी और अब लाखों किराया भी वसूल रहा है. संजय और बलविंदर ने पुलिस से भी शिकायत की लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

सतीश छाबड़ा ने बताया कि 2011 में जब सुपरटेक के मेट्रोपोलिस मॉल में उन्होंने दुकान खरीदी तो बिल्डर ने साथ में उन्हें एक स्कीम भी दी थी. स्कीम थी कि 9 साल तक बिल्डर उन्हें दुकान का किराया भी देगा लेकिन चार साल के बाद ही बिल्डर ने अपनी असलियत दिखा दी. उन्होंने बताया कि सेकंड फ्लोर पर दुकान नंबर- 9 के लिए सतीश ने 47 लाख रुपए दिये थे. बिल्डर ने किराये का वादा तो तोड़ा ही साथ में दुकान की रजिस्ट्री भी नहीं होने दी. सतीश बिल्डर से लेकर प्रशासन तक हर जगह गुहार लगा चुके हैं.

सवाल ये है बिल्डर की जालसाजी में फंसा बायर करे तो क्या करे? जाए तो कहां जाए? ना तो बिल्डर सुनने को तैयार है, ना ही स्थानीय प्रशासन उनकी मदद करने को राजी है? सवाल ये भी है क्या बिल्डर की धोखाधड़ी में पुलिस और प्रशासन भी उसके साथ है? क्या पुलिस और प्रशासन के आंख मूदे रहने से ही छोटे शहरों में बिल्डर का हौसला बढ़ता जा रहा है?

 

नोट: अगर आप भी किसी बिल्डर की जालसाजी का शिकार हुए हैं या फिर आप भी सालों से अपने सपनों के घर को पाने का इंतजार कर रहे है या  आपके पास किसी तरह का कोई सुझाव है तो आप हमें lootghar@tv9.com पर  ईमेल कर सकते हैं.

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