ब्लॉग: शुक्र है आईपीएल आया…कुछ तो ओरिजनल लाया

एनसीबी, ईडी, सीबीआई अपनी जगह सही, लेकिन इन सबसे आगे वही कहानी सही, जो मैंने कही. यही तो हो रहा था, यही तो हो रहा है. ये सब होगा तो आगे भी, लेकिन साथ में कुछ और होगा. अपना IPL होगा, कुछ तो ओरिजनल होगा.

इधर भारतीय सेना के हाथ खुले उधर दुश्मनों के मुंह खुल गए, चौधरी बनने वाले चीन के इरादों पर फिरा पानी

चीन जानता है कि एशिया से निकल कर दुनिया का बेताज बादशाह बनने में केवल एक ही रुकावट है और वो है उभरता भारत. अगर भारत को दबा लिया, तो जापान से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक सभी छोटे बड़े तमाम देश उसे सलाम करेंगे.

‘नाम बदलने’ जैसे तीर छोड़ने बंद कर दीजिए, सरकारें आएंगी-जाएंगी पर ये देश रहना चाहिए

ताजमहल (Taj Mahal) के ईस्‍ट गेट पर बन रहे मुगल म्‍यूजियम (Mughal Museum) का नाम बदल दिया गया है. जी हां, अब इसे छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से ही जाना पहचाना जाएगा.

हिन्दी सिर्फ़ भाषा नहीं, हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा, क्यों नहीं मिल सकता राष्ट्रभाषा का दर्जा?

14 सितंबर को हर साल हम ‘हिंदी दिवस’ मनाते है. आखिर यह हिंदी दिवस मनाने की जरूरत क्यों है? दिवस तो उसके होते हैं, जो साल में एक बार आता हो. पर हिंदी तो सतत प्रवाहिनी है. दिन-रात, सुबह-शाम हमारे होंठों पर होती है.

व्‍यंग्‍य: 12 अक्‍टूबर 2050! कयामत की वो रात और सोशल मीडिया युग के अंत की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी

न कोई महामारी, न कोई महायुद्ध, न ही कोई प्रलय आई है... फिर भी धरती पर कोहराम मचा हुआ है. इस कयामत ने सबसे ज्‍यादा तबाही मचाई है भारत में...

आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जिनके खून में था हास्य-व्यंग्य

भारतेन्दु का रचना संसार जितना विराट है उतना ही क्रान्तिकारी और बहुआयामी. उन्होंने अपने जीवन में वह सब कुछ कर डाला जिसे करने की सामर्थ्य व्यक्ति क्या संस्थाओं में भी आज नहीं दीखती.

सरहद पर शहीद हो रहे सपूत जवान, यहां कैमरे को रिया का चैट पसंद है… और रसोड़े में कौन है

इस घटना के ठीक चौबीस घंटे बाद एक नहीं, दो नहीं बल्कि 20 'सुशांत' ने सुसाइड किया. सीने पर गोली खाई. हंसते-हंसते कुर्बान हो गए. किसके लिए. देश के लिए.

डूबती जान को तलाशते कैमरे… बाढ़ के रियलिटी शो और बाढ़ के रीयल हालात में कितना फर्क जानिए

चंद आंकड़ों पर गौर करते हैं. 2019 में देश के 17 राज्यों ने बाढ़ की तबाही झेली. 1600 से ज्यादा लोग मारे गए. 2018 की बाढ़ से देश (Flood in India) को 95,736 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ.

सुशांत सिंह केस: एजेंडे अन्य हैं…तभी मुद्दे नगण्य, लंगड़ी खबरों से न्याय की उम्मीद!

आज CBI के साथ खड़ा होना मुफीद है. ये नए एजेंडे की कामयाबी की तरकीब है. दाभोलकर, आरुषि, व्यापमं आदि-आदि को भूल जाने में ही भलाई है. फिलहाल तो बस सुशांत (Sushant Singh) को न्याय दिलाने की लड़ाई है.

प्रभु…! यह कोरोनासुर तुम्हारे क़ाबू में नहीं आ रहा है? अस्पताल से लौटने पर आया ये बदलाव

यकायक मैंने अपने सिर पर एक हाथ महसूस किया. यह मेरी तीमारदारी में लगी सिस्टर मर्लिन थी. "सर हम आपके लिए 'प्रे' कर रहा है. आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे. कोट्टायम के चर्च में भी हमने आपके लिए प्रेयर कराई है."

Covid-19 से मुठभेड़ कर लौट आया, पढ़ें- क्या है ये ‘टग ऑफ वॉर‘

कहानी लम्बी डरावनी और रोमांचक है. बस यूं समझिए की मित्रों की दुआएं, आत्मबल और परिजनों की पुण्याई से ही मैं इसे हरा सका. पूरी ताक़त से जूझा, लड़ा और वापस आ गया. परेशान हुआ पर पराजित नहीं.

कानून पिता की संपत्ति में हक तो दिला देगा, पर बेटी को “पराया धन” बताने वाला दोमुंहा समाज कब सुधरेगा?

अच्छा होता कि कभी ये फैसला लेने की जरूरत ही न आन पड़ती. अच्छा ये भी होता कि जैसे लड़कों को बिना जताए, मांगे सब खुद ही मिल रहा है वैसे ही लड़कियों को भी किसी कानून का मुंह ना ताकना पड़ता.

राजस्थान की सियासत: ना निकम्मा, ना गद्दार…ये 3 तो मजबूरी के यार !

पायलट (Pilot) की वापसी से फौरी तौर पर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) की सरकार सुरक्षित हो गई है. राजनीति के जादूगर होने की उनकी छवि और मजबूत हुई है.

Krishna Janmashtami 2020: आखिर किस विचारधारा के हैं श्रीकृष्ण? आखिर कौन हैं श्रीकृष्ण?

Janmashtami 2020: मेरे लिए कृष्ण एक महानायक हैं. वो हर विचारधारा में समाहित हैं. कृष्ण जीवन के उदाहरणों को देखेंगे तो पाएंगे कि उनसे बड़ा समाजवादी, उनसे बड़ा ज्ञानी और कोई नहीं हुआ.

सुशांत केस: रिया चक्रवर्ती-महाराष्ट्र सरकार की ‘संदिग्ध सुर साधना’, कैच करने लायक है बहुत कुछ

ऐसा लगता है कि पूरी पटकथा कहीं और लिखी जा रही है, शायद बहुत उच्च स्तर पर लिखी जा रही है. सामने दिखने वाले किरदार बस उसे जुबां दे रहे हैं, तभी सुर इतने मिल रहे हैं, लेकिन सुशांत केस में ये ‘सुर साधना’ चीजों को बेहद संदिग्ध बना रही...

Sushant Singh Suicide Case: जिसकी सत्ता, उसका ‘क्वारंटीन’… फिर तो CBI ही बचा रास्ता

जून के पहले ही पखवाड़े में तीन घटनाएं घटती हैं. 8 जून को रिया सुशांत का घर छोड़कर चली जाती है. 9 जून को दिशा सालियान कथित तौर पर खुदकुशी कर लेती है. फिर 14 जून को सुशांत कथित तौर पर सुसाइड कर लेते हैं.

500 वर्षों का जन आंदोलन सफल, अयोध्या में राम के रूप में हो रहा भव्य राष्ट्र मंदिर का निर्माण

देश के करोड़ों लोगों को संस्कारों का व्यवहार एवं संस्कृति का स्वरूप जिन महापुरुषों में साक्षात दिखाई देता है उनमें भगवान राम सर्वोपरि है. भगवान राम विश्व भर में फैले करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र बिंदु हैं. भगवान राम का मंदिर उस आस्था का मंदिर है. आंदोलन के नेतृत्वकर्ता...

लखनऊ की चलती फिरती ‘इन्साइक्लोपीडिया’ थे टंडनजी, प्लेन हाइजैकर को ऐसे किया था काबू

हज़रतगंज के कॉफी हाउस के कहकहे हों या फिर चौक में राजा की ठण्डई की दुकान के अट्टहास, टण्डन जी की उपस्थिति चौतरफ़ा थी. उनके पास साहित्य, संगीत और नबाबी खानपान के अनगिनत क़िस्सों के पिटारे थे.

केंद्र सरकार की कोशिशों से किसानों के लिए अवसर में बदला कोरोनावायरस का आपदा काल

मोदी सरकार ने कोरोना काल में कृषि क्षेत्र की उन्नति और किसानों के समृद्धि के लिए तीन अध्यादेश लाकर ऐतिहासिक फैसले लिए हैं, जिनकी मांग कई दशक से हो रही थी, इन फैसलों से किसान और कारोबारी दोनों को फायदा मिला है.

कबीर, कुमार गंधर्व के नजदीक प्रभाषजी किसी और वजह से नहीं, बल्कि अपनी अक्खड़ता-फक्कड़ता के कारण थे

प्रभाष जोशी (Prabhash Joshi) होने का मतलब उसे ही समझाया जा सकता है, जो गांधी, विनोबा, जयप्रकाश, कबीर, कुमार गंधर्व, सी.के. नायडू और सचिन तेंदुलकर होने का मतलब जानता हो.

पाखंड के विरोधी परम वैष्णव प्रभाषजी ने पत्रकारिता में दिखाया था ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’

नामवर सिंह के शब्दों में—‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ क्या है इसका अहसास प्रभाषजी का गद्य पढ़ने से होता है. उनका गद्य हाथ कते, हाथ बुने, हाथ सिले खादी के परिधानों की तरह और तुलसी के शब्दों में ‘विशद गुनमय फल’ वाला है.

अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

अयोध्या मामले से दो बातें साफ होती हैं. प्रभाषजी लिखने की आजादी के किस हद तक पक्षधर रहे. क्या कोई संपादक संपादकीय लेखों और खबरों में अलग-अलग लाइन की छूट दे सकता है? दूसरी बात यह कि भगवा बिग्रेड से प्रभाषजी आ​‍खिर क्यों नाराज हो गए. यह अब तक लोगों...

मध्य प्रदेश बीजेपी में अंदरूनी राजनीति चरम पर: ‘चोर से बोला चोरी कर, साहूकार से बोला जागते रहना’

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा (Rameshwar Sharma) को विधानसभा का प्रोटेम स्पीकर बनाया गया है. वहीं पहले मंत्रीमंडल और अब प्रोटेम स्पीकर, इस सब को लेकर पार्टी का एक धड़ा खासा नाराज़ हो रहा है.

मध्य प्रदेश कैबिनेट एक्सपेंशन- ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’…

शिवराज सरकार के नए कैबिनेट में सिंधिया खेमे का खासा दबदबा है. लिहाज़ा इसे सिंधिया कैबिनेट कहना भी गलत नहीं होगा क्योंकि इन 28 में सिंधिया खेमे के 9 और कांग्रेस के 3 अन्य बागी मिलाकर कुल 12 लोगों को जगह मिली है.

आखिर कैसे पहुंचें कैलास मानसरोवर? पढ़िए- यात्रा से पहले उठने वाले हर एक जरूरी सवाल का जवाब

कैलास तक जाने के लिए तीन रास्ते हैं. एक रास्ता भारत के उत्तराखंड से होकर गुजरता है. इस रास्ते में मुश्किलें ज्यादा हैं, क्योंकि यह रास्ता अधिकतर पैदल और ट्रैकिंग का है. भारत सरकार इसी रास्ते लोगों को भेजती है. दूसरा रास्ता थोड़ा आसान है. इसमें नेपाल की राजधानी काठमांडू...

फोर्स और हैप्पी लैंडिंग के बीच अटकी रहीं सांसें, कैलास मानसरोवर से लौटकर नहीं मानता बावरा मन

ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है. जो इस काया के साथ देखते हैं, सिद्ध होते हैं. न हम सिद्ध थे, न मरे. फिर भी अहसास किया. अगर इस अहसास का आपको सहभागी बना पाया तो यह मेरा पुण्य, नहीं बना पाया तो मेरी असफलता. लौटने के बाद भी...

काश न आता वो बर्फानी तूफान तो Kailash इलाका Kashmir की हिंदू रियासत में होता, पढ़िए जोरावर कथा

पहले विदेश मंत्रालय (MEA) विज्ञापन छपवाकर आवेदन मंगाता है, फिर लॉटरी से नाम निकाले जाते हैं; क्योंकि सरकार वहां हर साल केवल 500 लोगों को ही भेजती है. हर यात्री को यात्रा के लिए कुछ वित्तीय मदद (Financial Help) भी सरकार देती है.

तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

तिब्बत पहले भारत और चीन के बीच एक प्राकृतिक दीवार था, बफर जोन. अब तिब्बत का अस्तित्व मिट जाने के बाद चीन हमारे सिर पर खड़ा मिलता है. उत्तराखंड के चमोली से लेकर अरुणाचल के तवांग तक उसकी सड़कें भारतीय सीमा को छूती हैं. इस सरहद पर हर रोज हम...

तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

चीनी हमले से पहले राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा. भारत से उसका नाता बौद्ध धर्म के तिब्बत में प्रवेश के साथ शुरू हुआ. सन् 1249 से 1368 तक यहां मंगोलों का शासन था. 1649 से 1910 तक तिब्बत मंचू आधिपत्य में रहा. उसके बाद सन्...

18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी झील है गौरी कुंड, बर्फ हटाकर करते हैं स्नान

डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लगा कि हाथ बढ़ा कैलास को छू लूं. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार.