इश्क और शबनम जैसे शब्दों से नफरत करते हैं इस गांव के लोग

अमरोहा अमरोहा जिला मुख्यालय से महज 20 किलोमीटर दूर बावनखेड़ी गांव के लोग 14 जनवरी, 2008 की तारीख अपने कैलेंडर से ही मिटा देना चाहते हैं. कम्बख्त ये वही काली रात थी, जब शबनम नाम की एक युवती ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर इस वीभत्स कांड को अंजाम दिया था. तब उसकी उम्र […]

अमरोहा

अमरोहा जिला मुख्यालय से महज 20 किलोमीटर दूर बावनखेड़ी गांव के लोग 14 जनवरी, 2008 की तारीख अपने कैलेंडर से ही मिटा देना चाहते हैं. कम्बख्त ये वही काली रात थी, जब शबनम नाम की एक युवती ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर इस वीभत्स कांड को अंजाम दिया था. तब उसकी उम्र करीब 25 साल थी. शबनम ने अंग्रेजी और भूगोल में डबल एमए किया था और एक स्कूल में टीचर के तौर पर काम भी कर रही थी, लेकिन उसे एक ऐसे शख्स से प्यार हो गया, जो मजदूरी करता था और छठी फेल था.

परिवारवालों का नहीं भा रहा था रिश्ता
शबनम का परिवार सैफी मुस्लिम था और उनके पास अच्छी खासी जमीन-जायदाद थी, जबकि सलीम एक पठान था और दिहाड़ी मजदूरी करता था. दोनों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बिल्कुल उलट थी और इसलिए उसका परिवार इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. तब शबनम ने सलीम के साथ मिलकर वह खौफनाक साजिश रची जिसके बारे में सोचकर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है.

7 लोगों को एक साथ उतार दिया था मौत के घाट
शबनम ने सलीम के साथ मिलकर अपने पूरे परिवार को मौत के घाट उतारने का प्लान बनाया. उस वक्त शायद वो प्यार में इतनी अंधी हो गई कि पैदा करने वाले मां-बाप की हत्या करते हुए भी उसको शर्म नहीं आयी. शबनम ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पूरे परिवार का सफाया कर दिया. तब वह 7 हफ्ते की गर्भवती भी थी. शुरुआत में उसने यह दलील देकर खुद को बचाने की कोशिश की कि लुटेरों ने उसके परिवार पर हमला कर दिया था और बाथरूम में होने की वजह से वह बच निकलने में कामयाब रही. लेकिन परिवार में चूंकि वही एकमात्र जिंदा बची थी, इसलिए पुलिस का शक उस पर गया और कॉल डिटेल खंगाली गई तो सच आखिर सामने आ गया.

इंसाफ के नाम पर मिली मौत की सजा
शबनम और सलीम को दो साल बाद ही अमरोहा की सत्र अदालत ने मौत की सजा सुनाई. निचली अदालत के फैसले पर बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ने भी मौत की सजा मुकर्रर रखी. शबनम पिछले करीब 10 साल से 8 माह के बच्चे सहित 7 लोगों की हत्या के मामले में जेल में बंद है. शबनम और सलीम का बेटा अब करीब 10 साल का हो चुका है, जिसका लालन-पालन बुलंदशहर के पत्रकार उस्मान सैफी और उनकी पत्नी वंदना करती हैं.

बचपन के दोस्त ने गोद लिया उनका बेटा
उस्मान, शबनम के कॉलेज में ही पढ़ते थे और उनसे दो साल जूनियर थे. उन्हें जब घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने बच्चे की जिम्मेदारी लेने का फैसला किया. उस्मान कहना है कि शबनम और वह अक्सर एक साथ बस में जाते थे और एक बार फीस भरने के लिए जब उनके पास पैसे नहीं थे तो शबनम ने उनकी मदद की थी.

भूले नहीं खौफनाक वारदात
शबनम की उम्र अब 35 साल हो गई है और घटना को भी 10 साल से अधिक समय बीत चुका हैं, लेकिन लोग आज भी उस खौफनाक वारदात को भूले नहीं हैं. शबनम के ही घर के पड़ोस में रहने वाले लोग बताते हैं कि उस घटना के बाद बावनखेड़ी गांव के किसी भी घर में शबनम नाम की लड़की ने जन्म नहीं लिया. लोग आज भी अपनी बेटियों को वह नाम देने से डरते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार
बहरहाल, शबनम और सलीम को सभी न्यायालयों से फांसी की सजा सुनाई गई है. अब इनको फांसी दी जाएगी या नहीं, इस पर इसी महीने सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने वाला है. दरअसल, उन्होंने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दी थी, लेकिन नृशंस अपराध को देखते हुए राष्ट्र्पति ने उनकी दया याचिका खारिज कर दी. अब एक बार फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिस पर इसी महीने सुनवाई होनी है.