हरिशंकर तिवारी, जिसके नक्शे कदम पर चलकर राजनीति में आए मुख्तार जैसे बाहुबली!

Share this on WhatsAppउत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की राजनीति में अब तक कई बाहुबली नेता हुए हैं. इन बाहुबलियों ने अक्सर अपनी खौफनाक वारदातों के चलते राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा. आज मुख्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, रमाकांत यादव, उमाकांत यादव, धनंजय सिंह, विजय मिश्र और राजा भैया जैसे कई नाम लोगों की जुबान पर हैं. […]

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की राजनीति में अब तक कई बाहुबली नेता हुए हैं. इन बाहुबलियों ने अक्सर अपनी खौफनाक वारदातों के चलते राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा. आज मुख्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, रमाकांत यादव, उमाकांत यादव, धनंजय सिंह, विजय मिश्र और राजा भैया जैसे कई नाम लोगों की जुबान पर हैं. लेकिन हरिशंकर तिवारी एक ऐसा नाम है जिसे पूर्वांचल का पहला बाहुबली नेता कहा जाता है. कहते हैं कि हरिशंकर तिवारी के नक्शे कदम पर चलकर ही मुख्तार, ब्रजेश जैसे आपराधिक प्रवृत्ति के लोग राजनीति में आए. चलिए इन 7 प्वाइंट्स में जानते हैं हरिशंकर तिवारी की पूरी कहानी.

1. साल 1985 में हरिशंकर तिवारी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की चिल्लूपार विधानसभा सीट से विधायक बने. हरिशंकर का चुनाव जीतना कई मायनों में अनूठा था. एक तो यह कि वह निर्दलीय उम्मीदवार थे. दूसरी बात यह कि वे जेल की सलाखों के भीतर रहते हुए चुनाव जीते थे. इस जीत को कुछ लोगों ने भारतीय राजनीति में अपराध का सीधा प्रवेश कहा.

2. नब्बे के दशक में गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही के गुटों में वर्चस्व की लड़ाई चलती थी. साल 1997 में लखनऊ में दिनदहाड़े वीरेंद्र शाही की हत्या कर दी गई. इससे इस वर्चस्व की लड़ाई पर लगाम तो लग गई, लेकिन इसके बाद पूर्वांचल की राजनीति में कई बाहुबलियों ने दस्तक देनी भी शुरू कर दी.

3. हरिशंकर तिवारी का गोरखपुर में इतना दबदबा था कि वे लगातार 22 वर्षों तक विधायक चुने गए. साथ ही 1997 से लेकर 2007 तक लगातार अलग-अलग सरकारों में मंत्री भी रहे. यानी कि हरिशंकर तिवारी कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, मायावती और मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल का हिस्सा बने.

4. हरिशंकर तिवारी की पूरे गोरखपुर मंडल में चलती थी. उनकी इजाजत के बिना समस्त मंडल में किसी को कोई ठेका नहीं मिलता था. वसूली करना, सरकारी काम में बाधा डालना, पुलिस को थप्पड़ मार देना, गाड़ी चेक न कराना, अवैध हथियारों से फायरिंग करना जैसे कृत्य उसके लिए आम बात मानी जाती थी.

5. हरिशंकर तिवारी के खिलाफ दो दर्जन से अधिक मुकदमें दर्ज किए गए थे. लेकिन उनके खिलाफ लगे सभी मुकदमे कोर्ट द्वारा खारिज कर दिए गए. लोग मानते हैं कि तिवारी ने या तो अपने खिलाफ मौजूद सबूतों को नष्ट करवा दिया या फिर गवाहों को डरा- धमकाकर चुप करा दिया.

6. 2007 के विधानसभा चुनाव में हरिशंकर तिवारी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा. राजेश त्रिपाठी नाम के बसपा उम्मीदवार ने उन्हें मात दी. अप्रत्याशित इसलिए कि राजेश त्रिपाठी उस वक्त एक गुमनाम सा शख्स था. ऐसे में तिवारी की जीत हर बार की तरह पक्की मानी जा रही थी.

7. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी हरिशंकर तिवारी को हार का मुंह देखना पड़ा. इस चुनाव में भी राजेश त्रिपाठी की ही जीत हुई. तिवारी इस बार तीसरे नंबर पर आ गए. तिवारी ने इसके बाद फिर कोई चुनाव नहीं लड़ा. हालांकि उन्होंने अपने दो बेटों और एक भांजे को राजनीति में स्थापित कर दिया.