दुल्हन लाने की तैयारी कर रहे विजय ने थाने में दम तोड़ा, हर साल 2 हजार हो रहे थर्ड डिग्री के शिकार

आंकड़े बताते हैं कि देश में रोजाना औसतन पांच मौतें हिरासत में होती हैं.
deaths in police custody increase, दुल्हन लाने की तैयारी कर रहे विजय ने थाने में दम तोड़ा, हर साल 2 हजार हो रहे थर्ड डिग्री के शिकार

Police custody में एक और मौत का मामला सामने आया है. इस बार मुंबई के वडाला सिटी पुलिस थाने में विजय सिंह नाम का 26 वर्षीय युवक पुलिसिया ज्यादती का शिकार हुआ है. इस मामले में पांच पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया है.

अगले महीने विजय सिंह की शादी होने वाली थी. घरवालों का आरोप है कि छोटे से झगड़े की वजह से पुलिस उसे पकड़कर ले गई और इतनी पिटाई की कि उसकी मौत हो गई. घर वालों ने कहा कि पिटाई के बाद विजय को अस्पताल पहुंचाने में भी भारी लापरवाही की गई.

ये सिर्फ एक मामला नहीं है. पुलिस कस्टडी में होने वाली मौतें रोज़ का काम हो गई हैं. एक मौत होती है, हेडलाइन बनती है, कुछ समय में लोग सब भूल जाते हैं. आंकड़े बढ़ते रहते हैं और ये डराते हैं. इसी महीने की शुरुआत में सतना के नागौद थाने में सिलाई की दुकान चलाने वाले युवक की कस्टडी में मौत हो गई थी. इस मामले में 8 पुलिसकर्मी सस्पेंड हुए थे.

क्या कहते हैं आंकड़े

इसी साल 16 जुलाई को गृह मंत्रालय ने संसद में जवाब दिया था कि 2015-16 से 2018-19 तक यानी 4 सालों में 7,295  लोगों की मौत पुलिस कस्टडी में हुई. सबसे ज्यादा 1,933 मौतें 2018-19 में हुईं. ये आंकड़ा 2012-13 के बाद सबसे ज्यादा है. इनमें से 1,797  लोग न्यायिक हिरासत में और 136 पुलिस हवालात में मारे गए.

आंकड़े बताते हैं कि देश में रोजाना औसतन पांच मौतें हिरासत में होती हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2018 में पुलिस हिरासत और जेल में मौतों के 1,680 मामले दर्ज किए. सबसे ज्यादा 365 मामले उत्तर प्रदेश से, 127 पश्चिम बंगाल, 118-118 पंजाब और महाराष्ट्र में, 107 मध्य प्रदेश और 102 बिहार से दर्ज किए गए.

क्या है कानून

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हिरासत में मौतों पर चिंता जताई. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने 8 जुलाई 2019 को केंद्रीय गृह मंत्रालय, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया कि हर जिले में मानवाधिकार कोर्ट स्थापित किया जाए. यह आदेश मानवाधिकार रक्षा कानून 1993 की धारा 30 और 31 के तहत दिया गया ताकि पुलिस कस्टडी में होने वाली हत्याओं को कानून के दायरे में लाया जा सके.

 

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