पीड़िता का ‘सेक्स की आदी’ होना रेप केस में जमानत का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट पहले भी बलात्कार के मामलों में जमानत पर यही रुख अपनाता रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने यौन हिंसा के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए शुक्रवार को कहा कि हाईकोर्ट के पास यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को ‘सेक्स की आदी’ होने का मेडिकल सबूत आरोपी को जमानत देने का आधार नहीं हो सकता.

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर दी थी जमानत

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें रिजवान नाम के आरोपी को बलात्कार के मामले में जमानत दी थी. जमानत आदेश में मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कहा गया था कि लड़की को यौन संबंध बनाने की आदत थी और आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. ये संभवत: मर्जी से बनाया रिश्ता हो सकता है.

चीफ जस्टिस के नेतृत्व में पीठ ने 3 अप्रैल 2018 को दी गई जमानत रद्द कर दी और चार हफ्तों के अंदर आरोपी रिजवान को सरेंडर करने के लिए कहा.

बता दें कि ‘सेक्स की आदत’ को जमानत का आधार बताकर जमानत देने के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी ये रुख अपना चुका है. 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें एक पुलिसकर्मी को बहाली का आदेश दिया गया था जिसके खिलाफ सेक्स वर्कर ने शिकायत की थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था ‘केवल इसलिए कि वह आसानी से उपलब्ध महिला है, उसके सबूतों को पानी में नहीं फेंका जा सकता है.’

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