मोदी-मोदी के जाप में सवाल अनसुने मत कीजिए अमित शाह जी.

राजनैतिक विमर्श में सवाल – जवाब की एक स्वस्थ परंपरा की किस निर्दयता के साथ हत्या की जा चुकी उसकी बानगी हाल ही में देखने को मिली. पुलवामा हमले के सात दिनों बाद कांग्रेस ने वाया रणदीप सुरजेवाला पीएम मोदी समेत कई बीजेपी नेताओं पर हमला बोला तो बीजेपी ने भी जवाब देने के बजाय […]

राजनैतिक विमर्श में सवाल – जवाब की एक स्वस्थ परंपरा की किस निर्दयता के साथ हत्या की जा चुकी उसकी बानगी हाल ही में देखने को मिली. पुलवामा हमले के सात दिनों बाद कांग्रेस ने वाया रणदीप सुरजेवाला पीएम मोदी समेत कई बीजेपी नेताओं पर हमला बोला तो बीजेपी ने भी जवाब देने के बजाय सवाल उछालने की सुविधा का लाभ ही उठाया. कांग्रेस ने सवाल पूछने के लिए दिल्ली चुनी और अमित शाह ने उल्टा सवाल दागने के लिए दो हज़ार किलोमीटर दूर राजामुंदरी में पार्टी अभियान के मंच को चुना.

 

अमित शाह ने कांग्रेस के सवालों के सामने पीएम के अट्ठारह घंटे काम करने के उस पुराने जुमले को घिसा जिसकी पुष्टि कोई कभी कर ही नहीं सकता. संतोष बस इसी बात का है कि पीएम के चौबीस में से चौबीस घंटे काम करने के आंकड़े को बीजेपी अब थोड़ा व्यवहारिक बनाते हुए अट्ठारह तक आई है. बावजूद इसके शायद बीजेपी समर्थकों के अलावा कोई समझ नहीं पाएगा कि आतंकी हमले को लेकर किए गए कांग्रेसी सवालों का ये कैसा जवाब है!

इसके आगे अमित शाह ने कांग्रेस के सवाल पूछने के हक पर ही सवाल खड़े कर दिए. वो देश को खबर दे रहे थे कि कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा आतंकी के मरने पर फफक-फफक कर रोती हैं. वो बता रहे थे कि जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगने पर कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष फ्रीडम ऑफ स्पीच की दुहाई देते हैं. वो दावा कर रहे थे कि मोदी को हटाने के लिए कांग्रेस आतंकवाद का सहारा लेती है. इस तरह कांग्रेस के खिलाफ आरोपों का पिटारा खोलकर अमित शाह ने सरकार से पूछे गए सवालों का हिसाब बराबर करने की भरसक कोशिश की. मुझे एक बात समझ नहीं आती.. अगर अमित शाह का चस्पां किया हर आरोप सच्चा है भी तो भी क्या कांग्रेस को सवाल पूछने का अधिकार इतने भर से नहीं मिल जाता कि वो देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी है और उसे सवाल उठाने का हक उस संविधान से मिलता है जो मोदी को जवाब देने के उत्तरदायित्व से भी बांधता है?

यूं भी अगर कांग्रेस सवाल नहीं करती तो क्या यही सवाल किसी आम भारतीय के नहीं हो सकते? क्या उसके मन में सवाल नहीं खड़े होते होंगे कि सर्जिकल स्ट्राइक की कामयाबी का सेहरा बांधनेवाले पीएम, गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बार-बार सुरक्षाबलों पर हमला होने की ज़िम्मेदारी क्यों नहीं लेते?

, मोदी-मोदी के जाप में सवाल अनसुने मत कीजिए अमित शाह जी.

क्या इस देश के किसी नागरिक के मन में सवाल नहीं खड़ा हुआ होगा कि हमले में इस्तेमाल होनेवाला विस्फोटक भरा वाहन इतने संवेदनशील क्षेत्र में धड़ल्ले से कैसे घूमता रहा?

क्या हमले से पहले जैश के वीडियो को गंभीरता से नहीं लेने पर किसी के मन में सरकार से सवाल करने का ख्याल नहीं उपजा होगा?

क्या सीआरपीएफ को हवाई मार्ग से लाने-ले जाने की पुरानी मांग पर कान ना धरने पर किसी को सरकार के प्रति गुस्सा नहीं पैदा हुआ होगा?

नोटबंदी में ढाई महीने तक लंबी लाइन में वक्त और जान गंवाने वाले इस देश में कोई नहीं होगा जो पीएम के इस दावे पर आज सवाल ना करना चाहे कि उस खौफनाक नोटबंदी में अगर आतंकियों के खात्मे का एलान हो चुका था तो फिर अब जो चल रहा है उसे आतंक नहीं तो क्या कहा जाए?

 

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जी ने रौ में बहते हुए पंडित नेहरू को भी घेर लिया. वो कहा जो नेहरू के आलोचकों ने बिना सोचे- समझे बरसों तक घिसा. उन्होंने कश्मीर समस्या को पंडित नेहरू की देन बताया लेकिन बात फिर वही है. अगर कश्मीर नेहरू की दी हुई समस्या है तो बीजेपी ने दो बार सत्ता में आकर उसका कितना निदान किया? 2014 के बाद तो कश्मीर के हालात और बिगड़े हैं. पहली बार दक्षिण कश्मीर से लड़कों की बड़ी खेप आतंक के रास्ते चल निकली. पत्थरबाज़ी ने ज़ोर पकड़ा. जिस हुर्रियत से अटल बिहारी वाजपेयी वार्ता करते थे उसे दरकिनार कर घाटी बंद करने का आधार पकड़ा दिया गया, और वो भी तब जब खुद बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में एक बेमेल गठबंधन के साथ सत्ता भोगी. नेहरू को कोस कर बीजेपी अपना काम कब तक चलाएगी? सरकार में आकर भी वो अपना रोल समझ ही नहीं पा रही. अपनी किसी विफलता पर जवाब देने के बजाय वो विपक्षी तेवर अख्तियार कर कांग्रेस की पुरानी करतूतों का पिटारा खोल कर विमर्श को ही मोड़ देती है.

 

अब आखिर में बात एक नए चलन की जिसकी उत्प्रेरक खुद बीजेपी है लेकिन आजकल खुद फंसती नज़र आने लगी है. आतंकी हमले की शाम दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी प्रयागराज में सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ लेते पकड़े गए. 

बीजेपी के बड़बोले सांसद साक्षी महाराज उन्नाव में पुलवामा के शहीद अजीत कुमार की शव यात्रा में दांत चियारते कैमरे में कैद हुए.

जैश के आतंकियों से लड़ते हुए शहादत पाए मेरठ के अजय कुमार के अंतिम संस्कार के दौरान  केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह हंसते दिखे तो परिजनों ने ऐसी खबर ली कि माफी मांगने पर ही जान छूटी.

कांग्रेस ने तो पीएम मोदी के चौदह फरवरी वाले दिन की दिनचर्या पर भी सवाल किए हैं. पीएम आधे दिन एक चैनल के लिए फोटोशूट कराते रहे. इस पर सफाई आ गई लेकिन नीतीश के साथ मुस्कुराते, देशभर में रैली करते, सऊदी प्रिंस के साथ प्रोटोकॉल तोड़कर मुलाकात में ठहाके लगाते और फिर देश को ग़म में छोड़ इनाम लेने सियोल के लिए उड़ गए पीएम की तस्वीरों पर उठे सवालों का जवाब देने कोई बीजेपी प्रवक्ता या नेता आगे नहीं आया.

 

इस आखिरी लाइन के साथ मैं ये लेख खत्म कर रहा हूं कि चुनाव में चंद दिन बचे हैं. बीजेपी अब बतौर सत्ताधारी पार्टी जवाब देने का मोड भी ऑन करे. हर सवाल को कांग्रेसी, वामपंथी या विपक्षियों का दुष्प्रचार कहने का व्यवहार त्यागे. इस देश में एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो इस ढोंग को खूब समझता है. वो अच्छी तरह जानता है कि मोदी-मोदी के शोर में हर सवाल को दबाना ना  सिर्फ धूर्तता है बल्कि लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही की व्यवस्था के साथ बेशर्म धोखा भी है.