‘चौकीदार’ की पुरानी कहानी.. दिन में पुलिस से दोस्ती रात को चोरों से यारी !

चौकीदार शब्द आज भले ही राजनीतिक अखाड़े में हथियार बन गया हो लेकिन उसकी अहमियत, इतिहास और उससे जुड़ी धारणा बता रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की चुनावी खींचतान में ‘चौकीदार’ शब्द पुराने से एक बार फिर नया हो गया. अब चौकीदार शब्द के नए मायने और पुराना इतिहास खंगाले जा रहे हैं. देश के विमर्श और खबरों में चौकीदार-चौकीदार का शोर है.

दरअसल चौकीदार का पद औपचारिक तौर पर ब्रिटिश काल में बना. ज़्यादा जानकारी द प्रिंट पोर्टल के एक लेख में प्रकाशित की गई. लेख के मुताबिक चौकीदारों को बंगाल प्रशासन में साल 1813 में लाया गया. उस साल एक प्रावधान बना कि पंचायत आम लोगों से कर वसूलेगी जिससे चौकीदार की तन्ख्वाह निकलेगी. चौकीदारों को गांव के क्षेत्र की सुरक्षा का ज़िम्मा सौंपा गया.

लेख में कटक के एक जज का ज़िक्र है जिन्होंने 1838 में चौकीदारों की व्याख्या की थी. उन्होंने कहा था- दिन में वो ज़मींदारों से कर इकट्ठा करने में मदद करते थे और रात में वो संदिग्ध लोगों के एजेंट के तौर पर काम करते थे और उन्हें बताते थे कि कहां से संपत्ति पाई जा सकती है.

ज़ाहिर है, उस वक्त का शासन-प्रशासन चौकीदारों को अच्छी नज़रों से नहीं देखता था, हालांकि उसकी अपनी उपयोगिता थी. ये मान लिया गया था कि चूंकि चौकीदारों को सभी घरों और उसमें रहनेवालों का पता होता था इसलिए वो चोरी की ताक में रहनेवालों के लिए बेहद अहम थे.

बंगाल के पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर सर फ्रेडरिक जेम्स हैलिजे की 1856 मे की गई एक टिप्पणी भी दर्ज है जिसमें उन्होंने कहा था कि, ‘चौकीदारों का नाता चोर उच्चकों से है. गांव में कोई लूटपाट की घटना होती है तो जिस पर पहला शक जाता है वो होता है चौकीदार.’ ये धारणा आखिर क्यों बनी इसके बारे में ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता लेकिन एक  वक्त आया जब चौकीदारों को वो इज़्ज़त मिली जिसके वो हकदार थे.

साल 1870 में एक कानून बना जिसके तहत तय हुआ कि ज़िला मजिस्ट्रेट चौकीदार नियुक्त करेगा. ये भी निश्चित हुआ कि वही उसकी तन्ख्वाह भी तय करे और इस तन्ख्वाह की वसूली पंचायत के नियमों के हिसाब से होगी.