क्या आरक्षण के सहारे खड़ी हो पाएगी कांग्रेस? संघ प्रमुख भागवत ने बहस की दी थी सलाह

जो कांग्रेस 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से पूरी तरह से रसातल में मिल गयी है उनके लिए यह मुद्दा भुना पाना आसान होगा?

नई दिल्ली: आरक्षण का भूत एक बार फिर से राजनीतिक गलियारों में घूमने लगा है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को एक कार्यक्रम में कहा कि ‘आरक्षण का पक्ष लेने वालों को उन लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए बोलना चाहिए जो इसके खिलाफ हैं और इसी तरह से इसका विरोध करने वालों को इसका समर्थन करने वालों के हितों को ध्यान में रखते हुए बोलना चाहिए.’

भागवत ने कहा कि वे पहले भी इस मुद्दे पर अपनी राय रख चुके हैं पर उस समय इस मुद्दे पर बड़ा बवाल मचा था.

आपको याद होगा साल 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी मोहन भागवत ने आरक्षण में समीक्षा की बात कही थी. जिसके बाद आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) प्रमुख लालू यादव ने आरक्षण के मुद्दे को चुनाव का मुख्य मुद्दा बना दिया था. इतना ही नहीं विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा तो भागवत के इस बयान को पिछड़ों में हुए ध्रुवीकरण की मुख्य वजह बताई गई.

तीन राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने वाला है. झारखंड और महाराष्ट्र आदिवासी-पिछड़ा बाहुल्य इलाक़ा है ऐसे में भागवत के इस बयान ने एक बार फिर से विपक्ष को बैठे बिठाए मुद्दा दे दिया है.

बता दें कि हरियाणा में जाट और महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के लिए कई बार आंदोलन हो चुका है, जिसके बाद फडनवीस सरकार को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा करनी पड़ी थी. ऐसे में आरक्षण के मुद्दे पर बोलना बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी तो नहीं कर सकता.

आरएसएस ने मोहन भागवत के बयान का किया बचाव

हालांकि आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने कहा कि सरसंघचालक मोहन भागवत के दिल्ली में एक कार्यक्रम में दिए गए भाषण के एक भाग पर अनावश्यक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है.

उन्होंने ट्विटर पर बयान जारी करते हुए कहा कि समाज में सदभावना पूर्वक परस्पर बातचीत के आधार पर सब प्रश्नों के समाधान का महत्व बताते हुए आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर विचार व्यक्त करने का आह्वान किया था.

अरुण कुमार ने कहा कि जहां तक संघ का आरक्षण के विषय पर मत है, वह अनेक बार स्पष्ट किया जा चुका है कि अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और आर्थिक आधार पर पिछड़ों के आरक्षण का संघ पूर्ण समर्थन करता है.

वहीं, बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन ने भी भागवत का पक्ष लेते हुए कहा कि सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि आरक्षण को लेकर संवाद होना चाहिए इसमें क्या गलत कहा है? संवाद पर किसी को क्या आपत्ति है? उन्होंने आगे कहा कि पीएम मोदी पहले ही कह चुके हैं आरक्षण था, आरक्षण है और आरक्षण रहेगा.

उन्होंने कहा कि पहले भी मोहन भागवत के बयान को गलत समझा गया था अब भी गलत समझा जा रहा है. मोदी सरकार ने आरक्षण को खत्म करने के बजाय सामान्य जातियों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया है वो भी एससी/एसटी या ओबीसी के कोटे के आरक्षण को कम किए बिना जिसका स्वागत एससी/एसटी और ओबीसी वर्गों ने भी किया था.

ज़ाहिर है मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले अगड़ी जातियों की नाराजगी दूर करने के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़ों को देने की घोषणा की थी.

आरक्षण मुद्दे पर विपक्ष हमलावर

बीएसपी (बहुजन समाज पार्टी) प्रमुख मायावती ने मौक़े को तुरंत भुनाते हुए कहा कि भागवत के बयान से आरएसएस की आरक्षण विरोधी मानसिकता सामने आ गई है. आरएसएस पर निशाना साधते हुए मायावती ने ट्वीट में लिखा, ‘आरएसएस का एससी/एसटी/ओबीसी आरक्षण के सम्बंध में यह कहना कि इसपर खुले दिल से बहस होनी चाहिए, संदेह की घातक स्थिति पैदा करता है, जिसकी कोई जरूरत नहीं है. आरक्षण मानवतावादी संवैधानिक व्यवस्था है जिससे छेड़छाड़ अनुचित व अन्याय है. संघ अपनी आरक्षण-विरोधी मानसिकता त्याग दे तो बेहतर है.’

वहीं आरजेडी प्रवक्ता और सांसद मनोज झा भागवत के बयान पर कहा कि वह आग से खेलने की कोशिश कर रहे हैं. मनोज झा ने कहा कि अगर ऐसा होता है तो लोग सड़कों पर उतरेंगे और सौहार्दपूर्ण माहौल की चर्चा ही खत्म हो जाएगी. उन्होंने कहा कि नैतिकता में और संसदीय बहुमत में काफी फर्क होता है. आरक्षण की मंजिल अभी काफी दूर है और उसे हासिल करने में भी अभी समय लगेगा.

झा ने कहा कि चर्चा के लिए देश में सौहार्दपूर्ण माहौल इन लोगों ने छोड़ा कहां है? आरक्षण के जरिए अभी सभी पिछड़े और आदिवासियों को उनका हक नहीं मिला है. जो थोड़ा बहुत लोगों को आरक्षण के जरिए मदद मिली है तो उसके समीक्षा की बात हो रही है. इन लोगों के इरादे और इशारे पर परेशानी है.

संविधान बदलने की अगली नीति का हो गया खुलासा: कांग्रेस

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भागवत के बयान को ट्वीट करते हुए लिखा कि ग़रीबों के आरक्षण को खत्म करने और संविधान बदलने की अगली नीति का खुलासा हो गया है. उन्होंने कहा, ‘ग़रीबों के अधिकारों पर हमला, संविधान सम्मत अधिकारों को कुचलना, दलितों-पिछड़ों के अधिकार को ले लेना, यही बीजेपी का एजेंडा है.’

कांग्रेस ने भी जाति आधारित आरक्षण का किया है विरोध

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने लोकसभा चुनाव 2014 से पहले भी जाति आधारित आरक्षण का विरोध किया था और तत्कालीन पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए कोटा लागू करने का अनुरोध करते हुए सभी जाति के लोगों को इसके दायरे में लाने की बात कही थी.

लेकिन जब मामाल बढ़ गया तो राहुल गांधी ने इसी निजी बयान बताते हुए पल्ला झाड़ लिया.

सवाल उठता है कि जो कांग्रेस 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से पूरी तरह से रसातल में मिल गयी है. उनके लिए यह मुद्दा भुना पाना आसान नहीं होगा. क्योंकि कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाजी पर लगाम लगाना पहली प्राथमिकता होगी.

हरियाणा में कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं पुराने नेता 

370 मुद्दे पर हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कांग्रेस से इतर अपनी राह चुनने का फ़ैसला किया है. उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि कांग्रेस अपने मुद्दों से भटक गया है. यह पुरानी वाली पार्टी नहीं रही.

हुड्डा ने कहा, मैं 72 साल का हो गया हूं और रिटायर होना चाहता था, लेकिन हरियाणा की हालत देखकर संघर्ष का फैसला किया. उन्‍हाेंने कहा कि देशहित से ऊपर कुछ नहीं. जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने का हमारे (कांग्रेस) कु्छ नेताओं ने विरोध किया, यह सही नहीं था. मैंने देशहि‍त के इस निर्णय का समर्थन किया. मेरे परिवार की चार पीढ़ियों कांग्रेस से जुड़ी रही है. हमने कांग्रेस के लिए जी जान से मेहतन की, लेकिन अब कांग्रेस पहले वाली नहीं रही.

उन्होंने कहा, ‘370 पर कांग्रेस कुछ भटक गई, लेकिन देशभक्ति और स्वाभिमान का मैं किसी से समझौता नहीं करूंगा, इसीलिए मैंने 370 हटाने का समर्थन किया. उसूलों के लिए टकराना भी जरूरी है, ज़िंदा हो तो ज़िंदा दिखना जरूरी है.’

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला जो हरियाणा के ज़िंद विधानसभा उपचुनाव में बुरी तरह हारे उनके लिए प्रदेश की ज़िम्मेदारी संभालना आसान नहीं होगा. तो फिर कांग्रेस के लिए हुड्डा परिवार से इतर प्रदेश में राजनीति करना आसान नहीं होगा.

झारखंड और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की हालत ख़राब है. वहां पर पार्टी के लिए कोई चेहरा तक नहीं मिल रहा. इसके अलावा पार्टी के अंदर की गुटबाजी भी चरम पर है. कांग्रेस पहले भी मुद्दे को भुनाने में असफल रही है. हाल में आर्टिकल 370 मुद्दे को ही देखें तो महाराष्ट्र में कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा, मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत कई कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी लाइन से अलग जाकर केंद्र की बीजेपी सरकार का समर्थन किया है.

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