राहुल के बाद कौन बनेगा कांग्रेस अध्यक्ष? इन दो नेताओं के नाम पर लग सकती है मुहर

राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर रहने को तैयार नहीं हैं और इसीलिए अब उनके उत्तराधिकारी की खोज जारी है. कांग्रेस के लिए चुनौती है कि अगला अध्यक्ष ना सिर्फ योग्य और अनुभवी हो बल्कि गांधी परिवार का भरोसमंद भी हो.

राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर बैठे रहने को राजी नहीं हैं. भले ही पार्टी के अधिकांश नेता उनकी मान-मनौव्वल में जुटे हों लेकिन लगता नहीं कि अब वो अपना फैसला बदलेंगे. ऐसे में किसी गैर-गांधी का कुर्सी पर बैठना तय है. प्रियंका गांधी ज़िम्मा इसलिए नहीं संभालेंगी क्योंकि राहुल गांधी पद त्याग करके जो संदेश देना चाहते हैं वो उनकी बहन के पदासीन होने के बाद बेमायने हो जाएगा. दूसरी तरफ मालूम पड़ रहा है कि सोनिया गांधी ने भी अब मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है. वो हर फैसले में राहुल के साथ हैं.

जल्द ही कांग्रेस पार्टी निर्णय करनेवाली अपनी सबसे बड़ी संस्था सीडब्लूसी की बैठक बुला सकती है जिसमें नए अध्यक्ष के नाम पर मुहर लगनी है. दो दशकों के बाद किसी गैर गांधी का नाम इस अहम पद के लिए तय करना कड़ी मशक्कत का काम है. कई नामों पर मंथन चल भी रहा है. इनमें से जो दो नाम अध्यक्ष की रेस में आगे हैं वो इस तरह हैं-

मल्लिकार्जुन खड़गे
 खड़गे कांग्रेस का दलित चेहरा हैं. इस बार वो कर्नाटक के गुलबर्गा लोकसभा सीट से चुनाव हार गए जबकि इससे पहले यही सीट 17 में से 15 बार कांग्रेस के उम्मीदवार को लोकसभा पहुंचाती रही थी जिसमें दो बार उनको मौका मिला. खड़गे 2014 की मोदी लहर में अपनी सीट बचा पाने में भले ही कामयाब रहे हों लेकिन 2019 में वो ज़िंदगी का पहला चुनाव हार गए. इससे पहले उन्होंने ग्यारह बार जो भी चुनाव लड़ा उसी में जीत हासिल की.

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खड़गे ने रेलमंत्री और श्रम एवं रोजगार मंत्री के तौर पर काम किया हुआ है. कर्नाटक विधानसभा में उनके पास नेता विपक्ष का पद भी रहा. इसके अलावा राज्य में कई सरकारों का अंग रहकर वो मंत्रीपद संभालते रहे. अपने सूबे में खड़गे ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी भी संभाली है. खड़गे के राजनीतिक करियर का शिखर रहा जब 2014 में वो लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता बने. उनके बेटे प्रियांक खड़गे भी राजनीति में सक्रिय हैं और सूबाई सियासत में उनकी विरासत संभाल रहे हैं.

सुशील कुमार शिंदे
 कांग्रेस अध्यक्ष पद को संभालने के लिए जिन भरोसेमंद और योग्य नेताओं की तलाश चल रही है उनमें एक महाराष्ट्र के सुशील कुमार शिंदे भी हैं. शिंदे भी इस बार सोलापुर से लोकसभा चुनाव लड़े थे और बड़े अंतर से बीजेपी के प्रत्याशी से हार गए थे. इससे पहले 2014 में भी उन्होंने हार का मुंह देखा था, लेकिन इसी सोलापुर ने उन्हें तीन बार संसद भी पहुंचाया है. गौरतलब है कि चुनाव के दौरान शिंदे गांधी परिवार के किसी ना किसी सदस्य को अपने चुनाव प्रचार में बुलाते रह गए पर कोई नहीं पहुंचा. बावजूद इसके किसी को शक नहीं कि वो सोनिया के करीबी नेताओं में से एक हैं जो पहले से वक्त लिए बिना उनसे मिल सकते हैं. 1999 में जब सोनिया अपना चुनाव रायबरेली से लड़ रही थीं तब शिंदे उनके इलेक्शन एजेंट थे. सुशील कुमार शिंदे ने पार्टी नेतृत्व के हर फैसले को हमेशा माना जिसकी वजह से उन पर आंख मूंद कर भरोसा किया जाता रहा. वो मनमोहन सरकार में गृहमंत्री और ऊर्जा मंत्री रहे. उनके गृहमंत्री रहने के दौरान ही अफज़ल गुरू और अजमल कसाब को फांसी मिली थी. प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद वो लोकसभा में कांग्रेस के नेता भी थे. इसके पहले शिंदे महाराष्ट्र में जनवरी 2003 से अक्टूबर 2004 तक मुख्यमंत्री रह चुके थे. बतौर विधायक उन्होंने लंबे वक्त तक काम किया लेकिन नब्बे के दशक में राज्यसभा पहुंचे. साल 2002 में एक वक्त आया जब उन्होंने उप राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. पार्टी के आदेश पर वो 2004 के आखिरी महीनों में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बनने को भी राजी हुए.

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ऐसा नहीं कि सुशील कुमार शिंदे हमेशा बड़े पदों पर रहे. अपने  राजनीतिक सफर से पहले वो सेशन कोर्ट में अमीन और पुलिस में सिपाही भी रहे. महाराष्ट्र सीआईडी में उन्होंने 6 साल सेवा दी और सब इंस्पेक्टर पद तक पहुंचे. बाद में शरद पवार 1971 में उन्हें सियासत में ले आए. दिलचस्प है कि जिस सरकार में शिंदे गृहमंत्री बने उसी में शरद पवार कृषमंत्री थे. फिलहाल उनकी बेटी प्रणिति अब सोलापुर में शिंदे की राजनीतिक विरासत संभालने में जुटी हैं.

वैसे कांग्रेस का नया अध्यक्ष चाहे जो हो लेकिन बुरा होगा अगर उसे प्रॉक्सी अध्यक्ष के तौर पर देखा जाने लगे. किसी गांधी की छाया में यूं भी अगले अध्यक्ष के लिए काम करना चुनौतीपूर्ण होगा और उसकी परेशानी का हल खुद गांधी परिवार को ढूंढना होगा.