मानवाधिकार हनन की खिलाफत पर जेल गए थे कम्‍युनिस्‍ट बलराज साहनी, बाहर आ बनाई ‘दो बीघा जमीन’

बलराज साहनी का असली नाम युधिष्ठिर साहनी था. 1 मई 1913 को 'मजदूर दिवस' के रोज जन्‍म हुआ था.
बलराज साहनी, मानवाधिकार हनन की खिलाफत पर जेल गए थे कम्‍युनिस्‍ट बलराज साहनी, बाहर आ बनाई ‘दो बीघा जमीन’

शम्‍भू के पास सिर्फ दो बीघा जमीन थी परिवार का पेट पालने को. गांव में लगातार सूखा पड़ रहा है. जमींदार शम्‍भू की जमीन हड़पना चाहता है क्‍योंकि उसे वहां मिल बनवानी है. धोखे से उसपर अधिक कर्जा लाद दिया जाता है. कोई सुझाता है कि कोलकाता जाकर कोई नौकरी कर लो. शम्‍भू कोलकाता आकर रिक्‍शा चलाने लगता है.

मुसीबतें शम्‍भू का पीछा नहीं छोड़तीं. सारी पूंजी गंवा कर जब वो गांव वापस आता है तो देखता है कि उसकी जमीन हड़पी जा चुकी है. वहां जमींदार की मिल बन रही है. शम्‍भू का बाप पागल होकर घूम रहा है. शम्‍भू अपनी जमीन से एक मुट्ठी मिट्टी उठाने की कोशिश करता है, मगर गार्ड उससे वह भी छीन लेते हैं. सिनेमा खत्‍म हो जाता है.

मानवाधिकार हनन पर बोलने की आज एक अभिनेता को क्‍या सजा दी जा सकती है? छद्म एक्टिविस्‍ट्स को किनारे रखिए. मुख्‍यधारा के कितने ऐसे कलाकार हैं जो अन्‍याय के खिलाफ आवाज उठाने पर जेल की सजा तक भुगतने को तैयार है? हर कोई बलराज साहनी तो नहीं होता. खांटी कम्‍युनिस्‍ट. खुद इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन की नींव रखी और उसके लिए लिखते समय बलराज साहनी और मजरूह सुल्‍तानपुरी ने तत्‍कालीन सरकार की बखिया उधेड़कर रख दी थी.

असहमति और विरोध लोकतंत्र की न्‍यूनतम शर्तें हैं, मगर स्‍वच्‍छंद नागरिक भला कहां सरकारों को पसंद आते हैं. उधर से प्रस्‍ताव आया कि माफी मांग लो तो जेल से रिहा कर दिए जाओगे. बलराज और मजरूह, दोनों ही नहीं माने. उसी दौरान, कम्‍युनिस्‍टों के एक जुलूस के दौरान हिंसा हो गई और बलराज गिरफ्तार कर लिए गए. नतीजा, जेल. बाहर आकर बलराज ने जो फिल्‍म बनाई, वो भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार कृतियों में से एक साबित हुई. नाम था ‘दो बीघा जमीन’.

नेहरू के कहने पर किया अटल के खिलाफ प्रचार

1962 में अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर सीट से चुनाव लड़े थे. पंडित जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि वे अटल के खिलाफ प्रचार करें इसलिए उन्‍होंने बलराज साहनी से कांग्रेस उम्‍मीदवार का प्रचार कराया. बलराज तब तक ‘दो बीघा जमीन’ से खासे मशहूर हो चुके थे. जब नतीजे आए तो कांग्रेस प्रत्‍याशी सुभद्रा जोशी 2052 वोटों से जीत गईं. यह पहला ऐसा चुनाव बताया जाता है जिसमें हिंदी सिनेमा के किसी सितारे ने प्रचार किया हो.

बलराज साहनी का असली नाम युधिष्ठिर साहनी था. रावलपिंडी में पले-बढ़े. बलराज साहनी टैगोर के शांति निकेतन में पढ़े. बापू संग स्‍वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शामिल रहे. बीबीसी लंदन में हिंदी के उद्घोषक के रूप में काम किया. वापस लौटे तो नाटक और लेख लिखने शुरू कर दिए. फिर फिल्‍मों की तरफ चले आए. अपनी मोटरसाइकिल से शूटिंग पर चले जाते थे. भारतीय कलाकार एसोसिएशन बनाकर फिल्‍मों में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों को उनका हक दिलाया. बलराज का जन्‍म भी तो 1 मई 1913 को हुआ था, ‘मजदूर दिवस’ के रोज. ‘दो बीघा जमीन’ के लिए किरदार में उतरने को बलराज कोलकाता की सड़कों पर सच में रिक्‍शा चलाते दिखते थे.

‘गरम हवा’ बलराज साहनी की आखिरी फिल्‍म थी. इसे उनके पूरे करिअर की सबसे बेहतरीन एक्टिंग वाली फिल्‍म समझा जाता है. मगर यह देखने के लिए वह जिंदा न रहे सके. फिल्‍म का काम खत्‍म होने के अगले दिन ही (13 अप्रैल, 1973) बलराज दुनिया छोड़ चुके थे. ‘गरम हवा’ के लिए जो आखिरी लाइन बलराज ने रिकॉर्ड थी, वो थी, “इंसान कब तक अकेला जी सकता है?”

Related Posts