Chhapaak Review : कमजोर दिल वालों के लिए नहीं, समाज का आइना है दीपिका की ये फिल्‍म, Video

फिल्म में सबसे बड़ा चैलेंज था इस संवेदनशील मुद्दे को लोगों के सामने रखना ताकि लोग उस दर्द को महसूस कर सकें. शायद मेघना के अलावा कोई दूसरा डायरेक्टर इस फिल्म के साथ इंसाफ ना कर पाता.

‘छपाक’ से पहचान ले गया…यूं तो इस फिल्म के गाने की ये पंक्तियां पूरी पिक्चर में कई बार सुनने को मिलती हैं, लेकिन जब भी ये शब्द कानों में पड़े, मानो दिल को छू गए. छपाक उस ध्वनि को कहते हैं जो किसी तरल पदार्थ पर चोट करने पर उठती है.

मेघना गुलज़ार ने फिल्म ‘छपाक’ शब्द का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पे किया है. यहां सोच है कि एसिड की ‘छपाक’ कैसे किसी हंसती-खिलखिलाती जान की पूरी ज़िदगी और सपनों को एक झटके में बर्बाद कर देती है.

मालती की चीखें फिल्म खत्म होने के बाद भी साथ नहीं छोड़ेगी

2 घंटे से ज्यादा की ये फिल्म, जिसमें दीपिका पादुकोण और विक्रांत मैसी लीड रोल में नज़र आए. फिल्म की कहानी रूह कंपा देने वाली है. दीपिका, जो इस फिल्म की निर्माता भी हैं, मानो अपने किरदार ‘मालती’ के माध्यम से लक्ष्मी अग्रवाल- जिनकी ज़िदगी पर ये फिल्म आधारित है, उनके दर्द को जी गई हो. मालती की चीखें फिल्म खत्म होने के बाद भी आपका साथ नहीं छोड़ती.

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साल 2005 में लक्षमी, जो उस वक्त महज़ 15 साल की थीं, वे एसिड अटैक का शिकार हुई थीं और वहीं से उन्होंने एक नई लड़ाई की शुरुआत की. ये मुहीम थी एसिट अटैक से पीड़ित लड़कियों की ज़िदगी को बर्बाद होने से बचाना और उनकी इस लड़ाई में उनका साथ देना. फिल्म उनके इस मुश्किल सफर, प्रयासों और उनकी जैसी कई एसिड अटैक पीड़ित लड़कियों के दर्द को बयां करती है.

‘तू अपनी बहन को सर्कस में क्यों नहीं भेज देता’

इतना ही नहीं, फिल्म पीड़ित परिवार के प्रति लोगों के रवैये पर भी रोशनी डालती है. फिल्म में एक सीन है जिसमें मालती के भाई का दोस्त उससे कहता है कि, ‘तू अपनी बहन को सर्कस में क्यों नहीं भेज देता.’ फिल्म के डायलॉग काफी प्रभावशाली हैं जो समाज की कड़वी सच्चाई को बेपर्दा करते हैं.

फिल्म में बहुत सी बार ऐसा हुआ जब आंखें नम हो गईं और दिल बैठ सा गया. फिल्म में एक ऐसा सीन है, जिसमें मालती हादसे के बाद गलती से अपना चेहरा शीशे में देख लेती है. उसके बाद वो चीख-चीखकर रोती है. इस सीन को देखकर हाथ कांपने लगते हैं.

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शायद ये कहना गलत नहीं होगा कि दीपिका ने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की है- चाहे वो अपने किरदार में पूरी तरह से उतरना हो या फिर एसिड अटैक विक्टिम की तरह दिखने के दिल्ली की तपती गर्मी में शूट करने के लिए प्रोस्थेटिक्स का इस्तेमाल हो.

मेघना ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि दीपिका ने जैसे ही ये कहानी सुनी तो बिना सोचे ही हां कर दिया. दीपिका की फिल्म में एक्टिंग को देखकर फिल्म को लेकर उनका डेडिकेशन खूब झलकता है.

सोशल मीडिया के झूठ का पर्दाफाश

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर बहुत सी बातें कही जा रही हैं. कुछ लोगों ने फिल्म को देखने से पहले ही ये कह डाला कि असल में लक्ष्मी पर तेज़ाब मुसलमान ने फेंका था, जिसे फिल्म में हिंदू के रूप में दिखाया गया है.

सोशल मीडिया पर जो कहा जाता है वो किसी तथ्य पर आधारित नहीं होता. वैसा ही कुछ इस फिल्म के साथ भी हुआ है, क्योंकि फिल्म में बशीर खान को आरोपी दिखाया गया है, न कि किसी हिंदू को.

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मेघना गुलजार ने किया कहानी के साथ इंसाफ

इस फिल्म को देखकर एक बात तो साफ हो जाती है कि मेघना गुलज़ार, जिन्होंने राज़ी और तलवार जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है, एक बेहतरीन डायरेक्टर हैं जो अपने काम को बड़े पर्दे पर उतारना बखूबी जानती हैं.

फिल्म में सबसे बड़ा चैलेंज था इस संवेदनशील मुद्दे को लोगों के सामने रखना ताकि लोग उस दर्द को महसूस कर सकें. शायद मेघना के अलावा कोई दूसरा डायरेक्टर इस फिल्म के साथ इंसाफ ना कर पाता.

शानदार अभिनय

मेघना ने मालती और अमोल के किरदार को बहुत बारिकी से बुना है. फिल्म में मधुरजीत सरधी का भी बहुत अहम किरदार है जो कि मालती के वकील का रोल निभा रही है. फिल्म में विक्रांत मैसी भी रीड रोल में नज़र आ रहे हैं. विक्रांत फिल्म में पत्रकार और सोशल वर्कर अमोल का रोल निभा रहे हैं, जो फिल्म में भले ही ज्यादा बड़ा ना हो, पर बहुत अहम हैं. फिल्म में उनकी एक्टिंग भी काबिले तारीफ है.

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इंटरवल से पहले फिल्म आपको पूरी तरह बांधे रखती है. फिल्म का सेकेंड हॉफ थोड़ा धीमा है. कहीं- कहीं हल्का हंसी मज़ाक भी है, लेकिन शायद फिल्म में इसकी ज़रुरत भी थी और जैसे ही आप सोचेंगे कि फिल्म के अंत में मुस्कुराने का थोड़ा कारण मिल जाए तो वहीं आप एक बार फिर गलत साबित हो जाते हैं.

‘कैसे 30 रुपये की ये बोतल किसी की पूरी ज़िदगी एक झटके में तबाह कर देती है’- फिल्म का ये डायलॉग थियेटर से निकलकर भी आपके ज़हन से इतनी आसानी से नहीं निकलने वाला. बेशक ये फिल्म कमज़ोर दिल वालों के लिए न हो लेकिन ये एक ऐसी कहानी है जिसका दुनिया के सामने आना बेहद ज़रूरी हैं.

 

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