National Museum of Indian Cinema, जानें 100 साल पहले कैसे बनती थी मूवी, गुलशन महल में बना नेशनल म्यूज़ियम
National Museum of Indian Cinema, जानें 100 साल पहले कैसे बनती थी मूवी, गुलशन महल में बना नेशनल म्यूज़ियम

जानें 100 साल पहले कैसे बनती थी मूवी, गुलशन महल में बना नेशनल म्यूज़ियम

National Museum of Indian Cinema, जानें 100 साल पहले कैसे बनती थी मूवी, गुलशन महल में बना नेशनल म्यूज़ियम

नयी दिल्ली

भारतीय सिनेमा को दुनियाभर में काफी पसंद किया जाता है. हर साल देश में औसतन 1,500 फिल्में बनाई जाती हैं, जो कि किसी भी भाषा से हो सकती हैं. भारतीय सिनेमा दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में से एक है. भारतीय सिनेमा की इस उपलब्धि को देखते हुए मुंबई के पेडर रोड स्थित भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय म्यूज़ियम बनाया गया है.

इस म्यूजियम का निर्माण नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूज़ियम द्वारा किया गया. ऐतिहासिक गुलशन महल में बनाए गए इस म्यूज़ियम की 142 करोड़ रुपए की लागत आई है. इस म्यूज़ियम के द्वारा आज की जनरेशन यह जान सकेगी कि जब भारत में फिल्में बनने का दौर शुरू हुआ था, तो किस प्रकार फिल्में बनाई जाती थीं.

म्यूज़ियम के डिसप्ले में विंटेज कैमरा, प्रोजेक्टर्स, एडिटिंग और रिकोर्डिंग उपकरण, कॉस्टयूम्स् और ऐसी अन्य चीजें रखी गई हैं, जो भारतीय सिनेमा की यात्रा को दर्शाएंगी. इस म्यूज़ियम के शुरुआत में ही देश की पहली फिल्म ‘राजा हरीशचंद्र’ से जुड़ी चीजों को रखा गया है, जिससे दर्शकों को यह बताने की कोशिश की जाएगी कि पहली फिल्म कैसे बनी थी और इसे बनाने के लिए किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा था.

इसमें तीन दर्जन से भी ज्यादा मनमोहक गैलरी प्रदर्शनी के लिए लगाई गई हैं, जिसमें साइलेंट युग से लेकर टॉकीज़, ब्लैक एंड व्हाइट से लेकर कलर, फिल्म रॉल्स से लेकर डिजिटल टेकनॉलोजी शामिल हैं. साइलेंट मूवी के दौर से अभीतक की फिल्मों की यादों को म्यूज़ियम में संजो कर रखा गया है. इसके अलावा शुरुआती दौर के अभिनेताओं से लेकर हाल के अभिनेताओं की तस्वीरों को भी म्यूज़ियम में लगाया गया है. वहीं कई फिल्मों की तस्वीरें म्यूज़ियम में दिखाई देंगी, जिसमें दर्शकों को कई अहम पहलू देखने को मिलेंगे. इस म्यूज़ियम के जरिए भारतीय सिनेमा के 100 साल से भी पुराने इतिहास को दिखाने की कोशिश की गई है.

खामोश श्री पुंडालिक की एंट्री

देश में सबसे पहले साइलेंट फिल्म्स आयीं, जिनका 1890 से 1920 तक निर्माण किया गया था. सबसे पहले मराठी साइलेंट मूवी ‘श्री पुंडालिक’ का निर्माण किया गया, जिसे दादासाहेब तोरणे ने बनाया था. इसके बाद 1913 में भारत की पहली मोशन फिल्म आई. यह भी साइलेंट मूवी थी, जिसका नाम राजा हरीशचंद्र था. इस फिल्म का निर्माण धुंदीराज गोविंद फाड़के ने किया था, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से भी जाना जाता था. वो दौर ऐसा था, जिसमें महिला के किरदार के लिए किसी को लेना बहुत ही मुश्किल होता था, क्योंकि उस समय महिलाओं पर बहुत पाबंदियां लगाई जाती थीं. इसके बाद 1920 तक कई भाषाओं में साइलेंट मूवी बनने का दौर यूं ही चलता रहा.

जब गूंजी आलम आरा की आवाज

14 मार्च, 1931 में अर्देशिर ईरानी द्वारा पहली भारतीय टॉकी फिल्म का निर्माण किया गया, जिसका नाम ‘आलम आरा’ था. इस फिल्म में मनोरंजन के लिए म्यूजिक, डांस और गाने भी थे. इस फिल्म के बाद ईरानी ने पहली साउथ इंडियन टॉकी फिल्म ‘कालीदास’ बनाई. इन फिल्मों के बाद चितोड़ वी. नगैया द्वारा पहली बंगाली टॉकी बनाई गई, जिसका नाम ‘जुमई शास्थी’ था. यह पहली मल्टीलिंगुअल फिल्म थी. 1933 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी पहली तेलुगु फिल्म ‘सावित्री’ रिलीज़ की. यह फिल्म एक स्टेज प्ले ‘मायलवारम बाला भारती समाजम’ पर आधारित थी. 1934 में बॉम्बे टॉकीज़ और प्रभात स्टूडियो खोला गया, जिसके अंतर्गत कई फिल्मों का निर्माण किया गया. इसके बाद अन्य-अन्य भाषाओं में 1940 तक कई फिल्मों का निर्माण किया गया.

फिर चली पैरेलल सिनेमा की आंधी

1940 से 1960 का जो समय था वह भारतीय सिनेमा का गोल्डन ऐज था. इस युग में पैरेलल सिनेमा की आंधी सी चली थी, पैरेलल सिनेमा मूवमेंट के नाम से भी जाना जाता है. इस आंदोलन ने सोशल रियलिज़्म पर जोर दिया था. इस दौर की सारी फिल्में बहुत चर्चित थीं, लेकिन जो सबसे ज्यादा चर्चित थीं उनमें ‘धरती के लाल’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘पथेर पांचाली’, ‘नीचा नगर’, ‘प्यासा’, ‘कागज़ के फूल, ‘अपराजीतो’, ‘अवारा’, ‘श्री 420’, ‘मदर इंडिया’, ‘औरत’, ‘गंगा-जमुना’, ‘मधुमती’, ‘मायाबाज़ार’, ‘चारुलता’ शामिल हैं. इस दौर की फिल्मों में कई कलाकार उभरकर सामने आए, जैसे कि कमल हसन, जिन्हें 1960 में आई फिल्म ‘कलाथर कन्नाम्मा’ में एक बाल कलाकार के तौर पर डेब्यू करने का मौका मिला.

और फिर प्यार, ड्रामा, एक्शन

यह युग ऐसा था, जिसमें सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मशहूर स्क्रीनराइटर्स ने भारतीय सिनेमा को एक से एक बेहतरीन फिल्में दीं. यह फिल्में रोमांस, क्राइम, ड्रामा से भरी होती थीं. 1970 से 1980 तक क्लासिक फिल्मों का दौर चला. इस दौर में जो फिल्में सबसे ज्यादा मशहूर हुईं, उनमें, ‘अराधना’, ‘सच्चा-झूठा’, ‘हाथी मेरे साथी’, ‘आनन्द’, ‘अमर प्रेम’, ‘कटी पतंग’, ‘दुश्मन’, ‘दाग’, ‘दीवार’, ‘जंजीर’, ‘शोले’, ‘यादों की बारात’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘एक दूजे के लिए’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘तेजाब़’, जैसी फिल्में शामिल हैं. इसके बाद नई फिल्मों का दौर चला, जिनमें भरपूर एक्शन रहता था. इन फिल्मों में एक मिडिल क्लास परिवार को रोजमर्रा की जिंदगी से जद्दोजहद करते हुए दिखाया जाता था. इस प्रकार की फिल्में 80और 90 में बहुत बनी. इन फिल्मों के म्यूज़िक, डांस और गाने एकदम अलग होते थे. इन फिल्मों ने बॉलीवुड को तीन खान दिए, सलमान, आमिरऔर शाहरुख खान. इनके अलावा इस दौर की हिरोइन जूही चावला, माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी की खूबसूरती के कई दीवाने थे.

National Museum of Indian Cinema, जानें 100 साल पहले कैसे बनती थी मूवी, गुलशन महल में बना नेशनल म्यूज़ियम
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