कैफी आजमी को जब फिल्म इंडस्ट्री के लोग कहने लगे थे ‘मनहूस,’ पढ़िए कैसे थे गर्दिश के दिन

आज यानी 14 जनवरी को कैफी साहब की 101वीं जयंती है. गूगल ने अपना डूडल उन्हें समर्पित किया है. हम समर्पित कर रहे हैं संघर्ष से भरी जिंदगी के किस्से.

कैफी आजमी. एक ऐसा शायर जिसने आजादी की लड़ाई में भी हिस्सा लिया, आजादी के बाद राजनीति में भी हिस्सा लिया और मजदूरों के लिए लड़ाई लड़ी, इन सबके बावजूद वह शायर बना रहा. आज यानी 14 जनवरी को कैफी साहब की 101वीं जयंती है. गूगल ने अपना डूडल उन्हें समर्पित किया है. हम समर्पित कर रहे हैं उनकी संघर्ष से भरी जिंदगी के किस्से.

मुंबई में और फिल्मों में आने की अपनी यात्रा के बारे में कैफी आजमी ने दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में बताया था. उन्होंने कहा ‘मैं मुंबई कमाने नहीं आया था. हिंदुस्तानी कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर था जहां से बहुत सारे अखबार निकलते थे. एक अखबार उर्दू का भी निकलता था. उसमें एक स्टाफ की जरूरत थी जिसके लिए मुझे बुलाया गया था. यहां आने के बाद उससे जुड़ गया. उसके बाद कई ट्रेड यूनियनों में काम किया, मजदूरों के साथ काम किया. संघर्ष किया, स्ट्राइक की.’

‘इस तरह यहां आकर मैंने जिंदगी गुजारी है. फिल्मों से वास्ता बहुत बाद में पड़ा. ये तब शुरू हुआ जब मेरे पास कोई दूसरा जरिया नहीं रह गया था. मेरे लिए रोटी कमाना जरूरी हो गया था. उस वक्त फिल्मों का रुख किया और गाने लिखे. उसके पहले में देशभक्ति का धुंधला सा तसव्वुर था.’

रोज सुबह 5 बजे लिखते थे एक नज्म

कैफी साहब की पत्नी शौकत आजमी एक इंटरव्यू में बताती हैं कि अपने घर-परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर मैंने कैफी आजमी से शादी कर ली. वहां गुरबत का आलम यह था कि मेरे खाने को पैसे नहीं होते थे. कैफी साहब को पार्टी 45 रुपए देती थी जिसमें 30 रुपए वो मेरे लिए देते थे.

शौकत आजमी आगे बताती हैं ‘कैफी सुबह पांच बजे उठकर रोज़ एक नज्म लिखते थे. मुझे बहुत बुरा लगता था उन्हें वैसे काम करता देखकर. मैंने प्रेम धवन से कहा कि कहीं काम दिलवाओ. उन्होंने एक गाने के कोरस में काम दिलवाया जिसके लिए मुझे 30 रुपए मिले. मैं बहुत खुश हुई. फिर मैंने पृथ्वी थिएटर में भी काम किया.’

इंडस्ट्री वाले मान चुके थे ‘मनहूस’

कैफी आजमी अपने गर्दिश के दिनों पर बात करते हुए कहते हैं ‘मैं लिखता तो था लेकिन लोगों ने मुझे तब शायर माना जब गुरुदत्त ने अपनी फिल्म में मुझे साइन किया. ‘कागज के फूल’ उनकी महत्वाकांक्षी फिल्म थी लेकिन वह फ्लॉप हो गई. उसके बाद लोगों ने मेरे बारे में ये नहीं कहा कि लिखना नहीं आता. कहा कि लिखते तो बहुत अच्छा हैं लेकिन इनके सितारे खराब हैं. इसकी वजह से बहुत से प्रोड्यूसरों ने मेरे करीब आना बंद कर दिया. म्यूजिक डायरेक्टर समझने लगे कि ये मनहूस है. बहुत बेकारी और तकलीफ के दिन गुजरे.’

किस्मत पलटने का वाकया बताते हुए कैफी साहब कहते हैं ‘उन दिनों चेतन आनंद की बहुत सी फिल्में फ्लॉप हो चुकी थीं, वे भी निराश थे. उन्होंने हकीकत फिल्म के लिए जब मुझे साइन किया तो लोगों ने उनसे कहा कि मुश्किल से ये फिल्म आपके हाथ आई है, इसमें भी आप उन्हें ले रहे हैं जिनके सितारे खराब चल रहे हैं. चेतन साहब ने कहा कि सितारे मेरे भी खराब चल रहे हैं, दो खराब सितारे मिलकर शायद कुछ अच्छा कर लें.’

गौरतलब है कि 1964 में रिलीज हुई ‘हकीकत’ सुपरहिट रही और इसके गाने बहुत पसंद किए गए. देशभक्ति गानों की बात आए तो आज भी कैफी आजमी का लिखा ये गाना सबसे पहले जुबान पर आता है- ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों… अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.’

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