संघर्ष और सफलता के शानदार संतुलन की मिसाल रहे सुनील दत्त, 91वीं जयंती पर पढ़ें- कुछ अनसुने किस्से

सुनील दत्त (Sunil Dutt) की जिंदगी में कई ऐसी चीजें थीं जो कि उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी. आज हम सुनील दत्त के जन्मदिन के मौके पर उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से और कहानियों पर बात करेंगे.

सुनील दत्त (Sunil Dutt) को आप किस रूप में देखते हैं- एक अभिनेता, समाजसेवी या राजनेता. या एक ऐसा पिता जिसने अपने बेटे की खातिर अपना पूरा करियर तक दांव पर लगा दिया था. सुनील दत्त की शख्सियत इन सबसे बढ़कर थी और आज इस महान सितारे का 91वां जन्मदिन (Sunil Dutt 91st Birth Anniversary) है. अब सुनील दत्त तो हमारे बीच नहीं रहे हैं, लेकिन उनके अभिनय और आर्दश कामों को भुला पाना शायद मुमकिन नहीं है.

सुनील दत्त अभिनेता ही नहीं बल्कि राजनेता के तौर पर भी सफल रहे. वे पांच बार लोकसभा सांसद रहे हैं. सुनील दत्त की जिंदगी में कई ऐसी चीजें थीं जो कि उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी. आज हम सुनील दत्त के जन्मदिन के मौके पर उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से और कहानियों पर बात करेंगे.

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बंटवारे के दौरान बती सुनील दत्त की जान

सुनील दत्त का जन्म 6 जून, 1929 को पाकिस्तान स्थित पंजाब के झेलम जिले के खुर्द गांव में हुआ था. वे एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे. जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो उन्हें भी पाकिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा. पिता दीवान रघुनाथ का साया बचपन में ही उनके सिर से उठ चुका था. जब उनके पिता की मौत हुई तो वे महज 5 साल के थे.

बंटवारे के दौरान उनकी उम्र 18 साल थी. यह बंटवारा कितनों के खून से रंगा है यह तो आप और हम सभी जानते हैं. बंटवारे के समय जब सुनील दत्त ने अपने परिवार के साथ पाकिस्तान से निकलना चाहा तो वे भी हिंदू-मुस्लिम दंगों के बीच फंस गए. इस बीच उनकी मदद के लिए आगे आया उनका दोस्त याकूब. याकूब ने किसी तरह सुनील दत्त और उनके परिवार की जान बचाई.

फिल्मी करियर शुरू करने से पहले किया काफी संघर्ष

हिंदुस्तान की जमीन पर अब सुनील दत्त को पहचान मिली एक रिफ्यूजी के तौर पर. इस पहचान के साथ मुफलिसी में उन्होंने अपने जीवन का संघर्ष शुरू किया. पाकिस्तान से आने के बाद उन्होंने तब के पंजाब में यमुनानगर के मंडोली में शरण ली, जो कि अभी हरियाणा में पड़ता है. यहां कुछ समय बिताने के बाद वे और उनका पूरा परिवार लखनऊ शिफ्ट हो गया. यहां की अमीनाबाद गली में उन्होंने कुछ साल गुजारे. अपनी ग्रेजुएशन पूरी की.

अमीनाबाद के बाद वो मुंबई आ गए. मुंबई में काला घोड़ा में नौसेना की एक बिल्डिंग में उन्हें रहने के लिए एक कमरा मिला. इस शहर में रहकर उन्होंने अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और फिर यहीं बस गए. पोस्ट ग्रेजुएशन के साथ-साथ उन्होंने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम भी किया. इसके बाद उन्हें रेडियो सीलोन में नौकरी मिली, जहां पर वे फिल्मी सितारों का इंटरव्यू लिया करते थे. उस नौकरी में सुनील दत्त को 25 रुपये महीना मिलता था.

रेडियो में ऐसे मिला था काम

सुनील कॉलेज में थियेटर से जुड़े हुए थे. एक बार कॉलेज थियेटर का प्ले देखने रेडियो के प्रोग्रामिंग हेड पहुंचे थे. यहां उन्होंने सुनील दत्त को देखा और उनकी आवाज सुनकर उनके कायल हो गए. प्रोग्रामिंग हेड ने तुरंत ही सुनील दत्त को जॉब ऑफर की और जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. सुनील दत्त ने बड़े-बड़े कलाकारों का इंटरव्यू लेना शुरू किया और यहीं से वे अनऑफिशियली फिल्मी दुनिया से जुड़ गए. इस दौरान ही सुनील दत्त की मुलाकात नरगिस से हुई. हालांकि उस समय दोनों नहीं जानते थे कि भविष्य में वे पति-पत्नी बन जाएंगे.

फिल्मी सफर

एक कामयाब रेडियो जॉकी बनने के बाद अब सुनील दत्त कुछ नया करने की तलाश में थे. इसी बीच उन्होंने फिल्मों में काम करने का ऑफर मिला. उनकी पहली फिल्म थी रेलवे प्लेटफॉर्म, जो कि 1955 में आई थी. इसके बाद उन्होंने अपने फिल्मी करियर का  बड़ा ब्रेक मिला फिल्म मदर इंडिया से. इस फिल्म में सुनील दत्त का किरदार एक गुस्सैल बेटे का था, जो कि किसी की बात नहीं सुनता था. फिल्म में नरगिस, सुनील दत्त की मां बनी थीं.

इस फिल्म को काफी सफलता मिली. इसके बाद सुनील दत्त ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वे एक ऐसे अभिनेता बन चुके थे, जिनकी 50 औऱ 60 के दशक में हर फिल्म सुपरहिट साबित हुई. इनमें साधना (1958), सुजाता (1959), मुझे जीने दो (1963), खानदान (1965), पड़ोसन (1967) जैसी कई फिल्में शामिल हैं. अपने आखिरी समय तक भी वे फिल्मों से जुड़े रहे थे. सुनील दत्त ने आखिरी फिल्म अपने बेटे संजय दत्त के साथ की थी, जो कि मुन्नाभाई एमबीबीएस थी. सुनील दत्त केवल एक सफल अभिनेता ही नहीं रहे बल्कि एक सफल डायरेक्टर भी रहे हैं. अपने बेटे की पहली फिल्म भी उन्होंंने ही डायरेक्ट की थी.

नरगिस और सुनील दत्त की लव स्टोरी

नरगिस और सुनील दत्त की पहली मुलाकात तो आप जानते ही हैं कि रेडियो इंटरव्यू के दौरान हुई थी. बताया जाता है कि जब सुनील दत्त ने पहली बार नरगिस को देखा था तो उनके पसीने छूट गए थे. उनकी हालत इतनी खराब थी कि वो नरगिस का इंटरव्यू ही नहीं ले पाए. उस समय नरगिस के कारण उनकी नौकरी जाते-जाते बची थी. इसके बाद दोनों की मुलाकात फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के सेट पर हुई. दोनों में ज्यादा कुछ बातचीत नहीं हुई थी उस समय. सुनील दत्त काम के लिए फिल्म के सेट पर पहुंचे थे.

इसके बाद दोनों फिल्म ‘मदर इंडिया’ के दौरान आमने-सामने आए. फिल्म में सुनील दत्त का नाम बिरजू था. फिल्म के खत्म होने के बाद भी वे सुनील दत्त को बिरजू कहकर ही पुकारती थीं. दोनों के बीच प्रेम की शुरुआत तब हुई जब सुनील ने नरगिस को ‘मदर इंडिया’ के सेट पर लगी आग से बचाया. इस दौरान सुनील को काफी चोट आई थीं और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था. नरगिस रोज उनसे मिलने के लिए अस्पताल जाया करती थीं. दोनों के बीच प्यार हुआ और उन्होंने साल 1958 में शादी कर ली. दोनों के तीन बच्चे हैं संजय दत्त, प्रिया दत्त और नम्रता दत्त. संजय एक सफल अभिनेता हैं और प्रिया पिता की तरह राजनीति से जुड़ी हुई हैं.

बेटे की ड्रग की लत और पत्नी के कैंसर ने बनाया लाचार

सुनील दत्त का जीवन संघर्षपूर्ण रहा है. नरगिस को कैंसर था और उनका बेटा संजय दत्त को उस समय भयंकर ड्रग की लत थी. पत्नी, बेटा और अपनी करियर के बीच सुनील दत्त को काफी संघर्ष करना पड़ा था. इन दोनों ही चीजों ने उन्हें काफी लाचार बना दिया था. वे काफी दुखी भी रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी.

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