सुशांत केस में काम कम, हो हल्ला ज्यादा, क्या हम सभी नहीं लांघ रहें सीमाएं? क्या शालीनता जरूरी नहीं?

हमारी मंशा रिया चक्रवर्ती की वकालत बिल्कुल नहीं है, क्योंकि यह हमारा काम नहीं है, लेकिन जिस तरह से यह केस आगे बढ़ रहा है. वह अपने आप में दिलचस्प तो है, साथ ही एक सभ्य समाज के लिए कई सवाल भी खड़े करता है.

आज बात करेंगे सुशांत सिंह राजपूत केस की. सुशांत की दोस्त रिया चक्रवर्ती से आज केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) ने पूछताछ की है. रिया पर सुशांत की फैमिली ने आरोप लगाया है कि उन्होंने सुशांत को मानसिक पीड़ा दी, उनके पैसे पर हाथ साफ़ किया और उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने पिछले हफ्ते अपनी जांच शुरू की, जो उस FIR पर आधारित है, जो सुशांत के परिवार ने पटना में दर्ज कराई थी. FIR में रिया, उनके माता-पिता और भाई शोविक का नाम भी शामिल है.

हमारी मंशा रिया चक्रवर्ती की वकालत करना बिल्कुल नहीं है, क्योंकि यह हमारा काम नहीं है, लेकिन जिस तरह से यह केस आगे बढ़ रहा है, वह अपने आप में दिलचस्प तो है, साथ ही एक सभ्य समाज के लिए कई सवाल भी खड़े करता है.

जांच में लगीं कई एजेंसियां, वजह क्या?

एक सवाल यह है कि ऐसी क्या वजह है, जो इस केस की इन्वेस्टीगेशन में बहुत सारी जांच एजेंसियां लगी हुई हैं. शुरू में मुंबई पुलिस को जांच का काम सौंपा गया, लेकिन उसकी कार्रवाई दोस्ताना पूछताछ से आगे नहीं बढ़ी. मुंबई पुलिस के साथ ही पटना पुलिस भी एफआईआर दर्ज होने के बाद तहक़ीक़ात के लिए निकल पड़ी. हालांकि, उसे मामले में मुंबई पुलिस का सहयोग नहीं मिला.

सीबीआई से पहले चल रही ईडी की जांच

इसके बाद सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा तो वो मुस्तैदी से इन्वेस्टीगेशन करने लगी. प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी सीबीआई से पहले ही अपनी जांच में लगी हुई थी. ईडी का काम फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट की तामील करवाना है. ED प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की कुछ धाराओं का पालन भी सुनिश्चित करती है कि काले धन का लेन देन तो नहीं हो रहा.

ईडी को नहीं मिला किसी बड़े घपले का सुराग

अभी तक ईडी को मामले की जांच में ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जो किसी बड़े घपले की ओर इशारा करता हो. सुशांत के बैंक अकाउंट्स से रिया के बैंक अकाउंट्स में किसी बड़ी रकम के ट्रांसफर के कोई सुबूत नहीं मिले हैं, लेकिन ईडी के सूत्रों की मानें तो सुशांत के पिता का यह आरोप सही है कि सुशांत के अकाउंट्स से 15 करोड़ का लेन देन हुआ है.

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सूत्रों ने बताया कि ईडी सुशांत, रिया और उसके भाई के अकाउंट्स के बीच एक-एक एंट्री की जांच कर रही है. ईडी के सूत्र का यह भी कहना है कि 15 करोड़ की रकम पर सुशांत ने 2.7 करोड़ रुपए का टैक्स भी अदा किया था.

ईडी की अब तक की सबसे सनसनीख़ेज़ टिप

सुशांत मामले में अभी तक ईडी की सबसे सनसनीख़ेज़ टिप नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के लिए थी, जिसमें उसने एनसीबी को रिया की व्हाट्सएप चैट की जानकारी दी थी, जिनमें ड्रग्स के खरीदने, बेचने और इस्तेमाल की जानकारी थी. एनसीबी ने इस मामले में नेशनल ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के तहत रिया के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. ये जांचने के लिए कि सुशांत की मौत में कोई ड्रग एंगल तो नहीं है.

एनआईए जांच की भी मांग

सच्चाई यह है कि एनसीबी अगर व्हाट्सएप का सहारा लेकर व्यापक रूप में जांच करने लगे तो वहाट्सएप इस्तेमाल करने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा एनसीबी की इन्वेस्टीगेशन की ज़द में आ जाएगा. अब समाज के कुछ प्रतिष्ठित लोग सुशांत केस में नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (NIA) को भी शामिल करना चाहते हैं. किस लिए? अभी यह साफ़ नहीं है.

हमारी इस तक़रीर का लब्बोलबाब यह है कि इतनी सारी जांच एजेंसियां अपने-अपने हिस्से की इन्वेस्टीगेशन में अभी तक कुछ बड़ा हासिल नहीं कर पाई हैं. अब हम आपका ध्यान सुशांत केस की मीडिया कवरेज की ओर लाना चाहते हैं, खास तौर पर न्यूज़ चैनल्स पर.

सुशांत की मौत 14 जून को हुई थी. तब से अब तक करीब ढाई महीने से रोज़ाना इस मामले को लगातार कवरेज मिल रही है. हालांकि, मौत के कारणों, परिस्थितियों और दोषी लोगों के बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं मिली है.

कई बड़े मुद्दों के साथ लगातार कवरेज 

ऐसा तब है जब भारत की सीमाओं पर हमारी और चीन की फौज आमने-सामने हैं. कश्मीर में पाकिस्तान के साथ अघोषित संघर्ष तो जारी है ही और कोरोना वायरस का संक्रमण रोज और लोगों को घेर रहा है. इसके चलते अर्थव्यवस्था मंदी चल रही है. करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए हैं.

सभी न्यूज़ चैनल्स रोज़ दावा करते हैं कि सुशांत केस की सबसे सटीक जानकारी सिर्फ और सिर्फ उनके पास है, लेकिन यह दावा तथ्यों की बजाय दर्शकों को अपने साथ बनाए रखने के लिए होता है.

‘मर्डर’ कहना शुरू कर दिया

एक चैनल ने तो इस केस को, जो अभी तक सुसाइड माना जा रहा है, इसे मर्डर कहना शुरू कर दिया है. मर्डर का आरोप लगाने के लिए इस चैनल ने कोई सुबूत नहीं दिए हैं. इस चैनल के साथ कम्पीट कर रहे बाक़ी न्यूज़ चैनल भी बिना सबूत चार्ज लगाने में बहुत पीछे नहीं हैं.

यही नहीं, न्यूज़ चैनल्स इस होड़ में अब एक दूसरे के काम पर छींटाकशी भी करने लगे हैं कि मेरी कमीज बाकी सभी की कमीज़ों से ज़्यादा सफ़ेद है. यह छींटाकशी कई बार शालीनता की सीमाएं लांघ जाती है.

कोर्ट और चैनल्स दोनों जगह पर जिरह करते वकील

एक और बात, सुशांत के परिवार की तरफ से पेश होने वाले वकील, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ नामी वकील हैं. आप कोर्ट में तो जिरह करते ही हैं, न्यूज़ चैनल्स पर भी जिरह करते नज़र आते हैं. यानी अब न्यूज़ चैनल्स भी अदालत की तरह व्यवहार कर रहे हैं. यह अधिकार इनको किसने दिया?

क्या इस मामले में या ऐसे सभी मामलों में न्यूज़ चैनल्स पर वकीलों की अपियरेंस को रेग्युलेट करने के लिए बार एसोसिएशन को हस्तक्षेप करना चाहिए?

ठीक से हो जिम्मेदारी का निर्वहन

हमने ये सवाल केवल यह बात रेखांकित करने के लिए उठाए हैं कि समाज में समाचार का प्रसार एक बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है. मीडिया के पास अभी सेल्फ रेगुलेशन की आज़ादी है. उसे अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन ठीक से करना चाहिए, ताकि सब कुछ तर्क संगत, न्याय संगत और शालीनता के दायरे में हो.

आप भी इस विषय में ज़रा सोचिए. यह हम सब की ज़िम्मेदारी है.

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