मुग़ल-ए-आज़म के डायरेक्टर भी ‘शहंशाह’ से कम नहीं थे!

Share this on WhatsAppनयी दिल्ली मुग़ल-ए-आज़म…! जिस तरह हिंदी सिनेमा की हस्ती को अज़ीम-ओ-शान तरीके से बयां करने के लिए ये एक फिल्म ही काफ़ी है, ठीक उसी तरह इस फिल्म के डायरेक्टर के. आसिफ़ की अपनी अलग ही शान थी. ज़रा सोचिए, जो फिल्म 1944 में शुरू हुई और 5 अगस्त 1960 में रिलीज़ […]

नयी दिल्ली

मुग़ल-ए-आज़म…! जिस तरह हिंदी सिनेमा की हस्ती को अज़ीम-ओ-शान तरीके से बयां करने के लिए ये एक फिल्म ही काफ़ी है, ठीक उसी तरह इस फिल्म के डायरेक्टर के. आसिफ़ की अपनी अलग ही शान थी.

ज़रा सोचिए, जो फिल्म 1944 में शुरू हुई और 5 अगस्त 1960 में रिलीज़ हुई. जिस फिल्म को बनने में करीब 16 साल लगे. कहानी, गाने, म्यूज़िक, डायलॉग, कैरेक्टर, सेट, लाइटिंग सब के सब बेमिसाल. जहां इतना परफेक्शन हो, तो ज़रूर उसके पीछे डायरेक्टर का हद दर्ज़े का क्रियेटिव होना लाज़मी है. उसी क्रियेटिव शख़्सियत का नाम है के. आसिफ़. शायद कम लोग जानते होंगे कि के. आसिफ़ सेट पर समय से पहुंचने के बजाय थोड़ा देर में ही पहुंचते थे. इसके पीछे उनके करीबी लोग ये बताते हैं कि वो सब कुछ रेडी होने पर ही शॉट के लिए तैयार होते थे. वो चाहते थे कि जब वो सेट पर पहुंचें तो सारी चीज़ें तैयार मिलें. वो जाएं और डायरेक्शन शुरू कर दें. मगर, ऐसा कम ही हो पाता था, क्योंकि ‘मुग़ल-ए-आज़म’ जैसी फिल्म में दिन और रात के कई सीन नेचुरल लाइट में शूट किए गए हैं. इसकी वजह से दो मिनट के शॉट के लिए जिस तरह की प्राकृतिक लाइट की ज़रूरत होती थी, उसके लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ता.

चुटकी बजाकर वो सिगरेट की राख गिराया करते. (Photo Source: Facebook)

कॉम्प्रोमाइज़ का सवाल नहीं 

एक बार ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के सेट पर डायरेक्टर के. आसिफ़ कई घंटे की देरी से पहुंचे. वो सेट को देखते रहे और सिगरेट पीते रहे. उनका अंदाज़ ऐसा था कि सिगरेट को मुट्ठी में भरकर अंगूठे के पास से निकालते थे और तब कश भरते थे. एक के बाद एक करीब तीन सिगरेट ख़त्म हो गईं, के. आसिफ़ ने चौथी सिगरेट निकाली और सेट की ओर देखते रहे. अचानक चौथी सिगरेट भी ख़त्म होने लगी. जिस तरह वो सिगरेट ख़ास अंदाज़ में पीते थे, ठीक उसी तरह सिगरेट की राख को भी ख़ास अंदाज़ में गिराते थे. चुटकी बजाकर वो सिगरेट की राख गिराया करते. चौथी सिगरेट ख़त्म हुई, के. आसिफ़ की चुटकी बजी, सिगरेट की राख गिरी और एक आवाज़ गूंजी…’पैक अप’. लाखों रुपये का सेट बेकार हो गया. अगले दिन नए तरीके से सेट लगता था. ये था के .आसिफ़ का अंदाज़, जिन्होंने मुग़ल-ए-आज़म के मामले में किसी भी छोटे-बड़े शॉट के लिए कोई कॉम्प्रोमाइज़ नहीं किया.

चलो सिगरेट निकालो

एक बार वो हमेशा की तरह सेट पर देरी से पहुंचे. उनका करीबी असिस्टेंट उनकी नकल करने लगा. सिगरेट मुट्ठी में भरी और अंगूठे के पास से सिगरेट का सिरा निकालते हुए कश भरने लगा. के. आसिफ़ की तरह सिगरेट पीते हुए वो असिस्टेंट सेट को घूरता रहा. चूंकि के. आसिफ़ का असिस्टेंट था, इसलिए उसके कहने पर फ्लोर पर साइलेंस यानी ख़ामोशी थी. असिस्टेंट की सिगरेट ख़त्म होने लगी, उसने सिगरेट का आख़िरी कश भरा और के. आसिफ़ की तरह चुटकी बजाई, राख गिराई और ज़ोर से बोला पैकअप. इतना कहते ही उसने के. आसिफ़ के अंदाज़ में पीछे मुड़कर देखा, तो डायरेक्टर के. आसिफ़ खड़े थे. ये देखकर असिस्टेंट के होश उड़ गए. वो कुछ कह पाता, इससे पहले ही के. आसिफ़ ने अपना हाथ असिस्टेंट के कंधे पर रखा. उन्होंने कहा- जब के. आसिफ़ सिगरेट पीकर उसकी राख गिराते हुए पैक बोलता है तो उस राख के साथ लाखों का सेट भी गिर जाता है. इसके बाद मुस्कुराते हुए उन्होंने असिस्टेंट से कहा- सिगरेट निकालो.

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