अश्वत्थामा मारा गया…! 89 चुनाव के बाद ऐसे तोड़ा गया था ‘अध्यक्ष जी’ का मनोबल

Share this on WhatsAppनयी दिल्ली 1989 का एक चर्चित किस्सा है. ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री’ के खेल में शह और मात का किस्सा. कुर्सी के लिए वीपी सिंह और चंद्रशेखर की टकराहटों के नाटकीय अंजाम का किस्सा. मोर्चा सरकार के संभावित मुखिया के तौर पर देवीलाल का नाम उभरने और आखिरी वक्त पासा पलटकर वीपी सिंह […]

नयी दिल्ली
1989 का एक चर्चित किस्सा है. ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री’ के खेल में शह और मात का किस्सा. कुर्सी के लिए वीपी सिंह और चंद्रशेखर की टकराहटों के नाटकीय अंजाम का किस्सा. मोर्चा सरकार के संभावित मुखिया के तौर पर देवीलाल का नाम उभरने और आखिरी वक्त पासा पलटकर वीपी सिंह की ताजपोशी का किस्सा.

1989 के चुनाव के बाद जब राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने का वक्त आया तो चंद्रशेखर के मंसूबों को मात देने के लिए एक ‘खेल’ रचा गया, जिसके किरदार देवीलाल थे. कुलदीप नैयर थे. बीजू पटनायक थे. अरुण नेहरू थे और कुछ बड़े नेता. ये ऐसा ‘खेल’ था जो सियासत के बड़े खिलाड़ी और ‘अध्यक्ष जी’ के नाम से मशहूर चंद्रशेखर को गच्चा देने के लिए खेला गया था. संसदीय दल के नेता की ताजपोशी के मंच पर चंद्रशेखर के सामने सब कुछ मिनटों के भीतर ऐसे घटित हुआ कि वो आवाक रह गए कि अरे ये क्या हो गया? चंद्रशेखर के ‘वीपी रोको प्लान’ को पलीता उनके ही मुख्य किरदार ने एक ‘गुप्त प्लान’ का हिस्सा बनकर लगा दिया था.

हुआ यूं था कि 1989 के चुनाव नतीजे आ चुके थे. राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस बोफोर्स घोटाले के चुनावी मुद्दे के सामने पस्त होकर 197 सीटों पर सिमटकर रह गई थी. कांग्रेस संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी जरूर थी लेकिन संख्या बल को समझते हुए राजीव गांधी ने विपक्ष में बैठने का ऐलान कर दिया था. दूसरे खेमे में विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ बीजेपी और वामदलों के समर्थन की ताकत ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार की बुनियाद रख दी थी. जनता दल सांसदों का बहुमत वीपी सिंह के साथ था क्योंकि राजीव गांधी विरोधी चुनाव के सबसे बड़े चेहरे वही थे

जब बनाया गया ‘गुप्त प्लान’ 
वीपी सिंह पीएम पद के स्वभाविक उम्मीदवार थे लेकिन एक शख्स था, जो किसी भी सूरत में वीपी सिंह को पीएम बनते नहीं देखना चाहता था. वो थे चंद्रशेखर. चंद्रशेखर ने वीपी सिंह का रास्ता रोकने के लिए सारे घोड़े खोल दिए थे. चौधरी देवीलाल पर दांव चलकर वीपी सिंह के मुकाबले उन्हें खड़ा कर दिया था. दूसरी तरफ बीजू पटनायक से लेकर तमाम दिग्गज थे, जो हर हाल सिर्फ वीपी सिंह को ही पीएम बनाने के पक्ष में थे, चाहे पार्टी टूट जाए. तनातनी की तलवारें अंदरखाते भांजी जा रही थी. चंद्रशेखर टस से मस नहीं हो रहे थे. तभी एक ‘गुप्त प्लान’ तैयार किया गया. ऐसा ‘गुप्त प्लान’, जो आजाद भारत में अब तक पहली और आखिरी बार ही तैयार हुआ और कामयाब हुआ. इस ‘गुप्त प्लान’ का जिक्र कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में किया है. तो आगे का हिस्सा उनकी ही किताब से…
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‘पार्टी का शुभचिंतक होने के नाते मैंने वीपी सिंह और देवीलाल के बीच मुकाबले को टालने की जिम्मेदारी ले ली. मैं अरुण नेहरू से मिला, जो वीपी सिंह के निकट सहयोगी थे. वे भी सर्वसम्मति के पक्ष में थे लेकिन वीपी सिंह की कीमत पर नहीं. मैं देवीलाल को अच्छी तरह जानता था. मैं मुकाबले की सुबह उनसे मिला. वे अपने आपको लेकर किसी भ्रम में नहीं थे. उन्होंने कहा कि वीपी सिंह बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे लेकिन उनकी परेशानी यह थी कि वे चंद्रशेखर को जुबान दे चुके थे कि वो मुकाबले में जरूर उतरेंगे. मैं जानता था कि वीपी सिंह का रास्ता रोकने की मुहिम चंद्रशेखर ने ही शुरू की थी. खुद देवीलाल उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे. चंद्रशेखर उस किस्म के नेता थे जो अपनी बात न मनवा पाने की स्थिति में या तो पार्टी को तोड़ देते हैं या उसे छोड़ देते हैं. मुझे डर था कि नवगठित जनता दल में फूट कांग्रेस की वापसी का रास्ता खोल देगी. ऐसा लगता था कि राजनीतिज्ञों ने इमरजेंसी और उसके बाद जनता सरकार के पतन से कोई सबक नहीं सीखा था.

देवीलाल ने चंद्रशेखर को उड़ीसा भवन बुलाया. वे मुझे भी अपने साथ लेते गए. वहां चंद्रशेखर के अनुरोध पर बीजू पटनायक पहले से मौजूद थे. यह बिल्कुल साफ था कि अगर वीपी सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया तो पार्टी टूट जाएगी. चंद्रशेखर ने कहा कि उन्होंने मधु दंडवते को देवीलाल का नाम प्रस्तावित करने को कहा था, जिसका वो अनुमोदन करेंगे. चंद्रशेखर के कड़े तेवरों को देखते हुए मैंने देवीलाल से अनुरोध किया कि उन्हें चंद्रशेखर का फॉर्मूला स्वीकार कर लेना चाहिए. देवीलाल ने ऐसा ही किया, हालांकि वो जानना चाहते थे कि मेरे मन में क्या है. मैने सिर्फ मुस्कुरा दिया.

जब हिचकिचाए देवीलाल
हम दोनों कार में संसद भवन की ओर जा रहे थे तो मैंने उन्हें अपना फार्मूला समझाते हुए कहा कि उनका नाम प्रस्तावित और अनुमोदित होने के बाद उन्हें खड़े होकर खुद ही अपना नाम वापस ले लेना चाहिए और वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित कर देना चाहिए. देवीलाल ने चौंककर मेरी तरफ देखा और मुस्कुराकर राजी हो गए. संसद भवन में पार्टी के सांसद नेता के चुनाव के लिए जमा हो चुके थे. देवीलाल चंद्रशेखर को धोखे में रखते हुए हिचकिचा रहे थे. मैंने उनको हिम्मत बंधाते हुए उन्हें महाभारत का एक प्रसंग सुनाया. युधिष्ठिर यह कहने के लिए राजी हो गए थे कि अश्वत्थामा, जो कि एक हाथी था, युद्ध में मारा गया . कौरवों की सेना में इसी नाम का एक योद्धा था, जिसने पांडवों के छक्के छुड़ा दिए थे. युधिष्ठिर ने झूठ नही बोला था लेकिन पांडवों ने उनके कथन को कौरवों में खलबली मचाने और उनका मनोबल तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया था. मैंने देवीलाल से कहा कि उनके नाम के प्रस्ताव और अनुमोदन के बाद चंद्रशेखर को दिया गया उनका वचन भी पूरा हो जाएगा, भले ही एक मिनट बाद वे किसी दूसरे का नाम प्रस्तावित कर दें. देवीलाल को मेरी बात समझ में आ गई.

इस ‘गुप्त फार्मूले’ की जानकारी मेरे और देवीलाल के अलावा सिर्फ पंजाब केसरी के संपादक अश्विनी कुमार को थी. दंडवते ने देवीलाल का नाम प्रस्तावित किया और योजनानुसार चंद्रशेखर ने इसका अनुमोदन कर दिया. देवीलाल मेरे साथ हुई बातचीत पर कायम रहते हुए अपनी सीट से उठ खड़े हुए. उन्होंने अपना नाम वापस लेकर और वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित करके हर किसी को चौंका दिया. सब कुछ इतनी तेजी से और इतना अचानक हुआ कि कोई भी वीपी सिंह के नाम का अनुमोदन करके के लिए अपनी सीट से खड़ा नहीं हुआ. कुछ क्षणों के असमंजस के बाद जब सदस्यों को समझ में पूरी बात आई तो अजित सिंह ने उठकर वीपी सिंह के नाम का अनुमोदन कर दिया.
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वीपी सिंह सर्वसम्मति से नेता चुन लिए गए. इस अवसर पर एक दिलचस्प बात यह हुई कि न्यूज एजेंसी यूएनआई का टिकर देवीलाल को पार्टी का नेता चुने जाने की घोषणा कर रहा था. इसका कारण यह था कि सबसे पहले खबर जारी करने की न्यूज एजेंसियों की होड़ को देखते हुए यूएनआई का रिपोर्टर देवीलाल का नाम प्रस्तावित और अनुमोदित होते ही टेलीफोन की तरफ दौड़ पड़ा था. नतीजा ये हुआ कि एजेंसी ने यही खबर जारी कर दी थी. देवीलाल ने अपनी सीट से उठने में कुछ समय लगाया था तो मेरा दिल धड़कने लगा था. लेकिन फिर वे उठे औऱ उन्होंने घोषणा की कि वे ‘ताऊ’ ही बने रहना चाहते थे. वीपी सिंह ने उन्हें उपप्रधानमंत्री बनाकर उनके बड़प्पन का सम्मान किया.

मैं देवीलाल को बधाई देने उनके घर पहुंचा तो उनके परिवार के लोगों ने उन्हें घेर रखा था और उन्हें प्रधानमंत्री की बजाय उप प्रधानमंत्री का पद स्वीकर करने के लिए कोस रहे थे. देवीलाल उन्हें आश्वस्त करते हुए कह रहे थे कि उनके पद के आगे लगा ‘उप’ जल्दी ही गायब हो जाएगा. उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला जो बाद में हरियाणा के मुख्यमंत्री बने, मुझे कभी माफ नहीं कर पाए. वे हमेशा यही सोचते थे कि मैंने वीपी सिंह के साथ साजिश रचकर उनके पिता को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया.’

पुनश्च..
ऊपर का इतना हिस्सा कुलदीप नैयर की किताब से हूबहू है. इस कहानी में एक झोल है. कुलदीप नैयर ने लिखा है कि इस पूरे प्लान के बारे में उनके और देवीलाल के अलावा सिर्फ पंजाब केसरी के अश्विनी कुमार को पता था. उन्होंने ये भी लिखा कि देवीलाल का नाम चंद्रशेखर की तरफ से अनुमोदित होने के बाद जब उन्होंने उठने में समय लगाया तो कुलदीप नैयर की धड़कन बढ़ने लगी कि कहीं प्लान फेल न हो जाए.

मेरे मन में स्वाभाविक से सवाल हैं कि ऐसा कैसे मुमकिन है कि देवीलाल को समझा बुझाकर इतने बड़े खेल की तैयारी की गई और जनता दल के दिग्गजों को पता ही नहीं चला या उनकी जानकारी के बगैर ये सब हो गया?

अगर वहां देवीलाल अपने कदम वापस नहीं खींचते तो क्या होता?
चंद्रशेखर के मंसूबों को मात देने के लिए बीजू पटनायक और वीपी खेमे ने क्या तैयारी की थी?
कुछ तो की होगी, वो कुलदीप नैयर के इस अनजाने प्लान के भरोसे तो नहीं बैठे होंगे?
सबसे आखिर में, कुलदीप नैयर पत्रकार होते हुए ये सब क्यों कर रहे थे?
ऐसी पैंतरेबाजी किसी पत्रकार को क्यों करनी चाहिए?
वीपी सिंह की सरकार ने ही कुलदीप नैयर को ब्रिटेन में भारत का उच्चायुक्त बनाकर भेजा था.
कहीं ये वीपी सिंह ने अहसान का बदला तो नहीं चुकाया था? इस पर फिर कभी…