आपातकाल से पहले और बाद के वो 24 घंटे जिसने लिखी अगले 19 महीनों की कहानी

4 दशकों से भी पहले देश में लागू हुए आपातकाल को आज तक याद किया जाता है. आज ही के दिन 1975 में शुरू हुए उस काले दौर से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से पेश हैं.

आज ही के दिन 44 साल पहले 25 जून 1975 को देश ने आपातकाल की वो काली सुबह देखी थी जिसकी शाम 21 मार्च 1977 को 19 महीने बाद ढली. उस दौर में कई लोग रातोंरात अपनी निष्ठा बदलकर सत्ता के साथ हो लिए तो कई ने आनेवाले मुश्किल दिनों में सरकार से लड़ाई लड़ने के लिए अपने मोर्चे संभाल लिए. लड़नेवालों में नेता तो थे ही, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे.

आपातकाल में क्या-क्या घटा वो 19 महीनों में कभी ठीक से लोगों के सामने नहीं आ सका लेकिन देश का लोकतंत्र जब पटरी पर लौटा तब हर किसी ने अपने ढंग से आज़ादी के बाद के राजनीतिक इतिहास की सबसे अहम घटना को कागज़ों पर उकेरा. 25-26 जून की दरम्यानी रात के अंधेरे में जो कुछ अंजाम दिया जा रहा था वो आज भी याद किया जाता है. दरअसल जो कुछ हो रहा था उसकी भूमिका कम से कम दो हफ्तों से बनती दिख रही थी. अगर ठीक से कहें तो आपातकाल से छह महीने पहले ही इंदिरा के दिमाग में इस विचार को रोंपा गया कि वो जिन परिस्थितियों से जूझ रही हैं उसका समाधान राष्ट्रीय आपातकाल में निहित है. 8 जनवरी 1975 को बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने खत लिखकर इस आत्मघाती समाधान को इंदिरा के सामने परोसा था.

वैसे इंदिरा गांधी ने जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी तो उन्हें अंतिम निर्णय होने तक वोट से वंचित व्यक्ति के तौर पर लोकसभा की कार्रवाई में भाग लेने की छूट मिल गई थी लेकिन बावजूद इसके भारत में पहली और अब तक अंतिम बार आपातकाल लागू कर दिया गया.

आपातकाल का वो दिन
आपातकाल लागू होने के एक दिन पहले विपक्षियों ने इंदिरा से ‘सिंहासन’ खाली करने की मांग रखी थी. दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण के भाषण ने सत्ता प्रतिष्ठान को हिला डाला. इंदिरा गांधी के करीबी इस जुगत में लग गए कि कैसे रामलीला मैदान से उठे गुबार की खबर अखबारों के ज़रिए लोगों तक ना पहुंचे. आधी रात में दिल्ली के बहादुरशाह ज़फर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तर में बिजली कट गई. हिंदुस्तान टाइम्स बचा रहा क्योंकि उसका दफ्तर वहां नहीं था. अफरा-तफरी में एक के बाद एक फैसले लिए जा रहे थे, उससे ज़्यादा जल्दबाज़ी में उनका क्रियान्वयन हो रहा था. सही-गलत सोचने से अधिक ज़ोर इस बात पर था कि विरोध का हर स्वर या हर लिखी गई पंक्ति अपना असर ना कर सके.

इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन के कमरे में बैठकर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था. नामों पर बार-बार इंदिरा गांधी से सलाह-मश्विरा किया जा रहा था. आखिरकार 26 जून की अलसुबह जब इंदिरा सोने के लिए अपने कमरे में गईं तब तक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत तमाम बड़े नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे. आधी रात को घर से उठाकर थाने पहुंचाए गए लोगों को ठीकठाक मालूम नहीं था कि चल क्या रहा है. कितने ही उदाहरण हैं जब किसी को पकड़कर पहले थाने में बंद किया गया और उसके बाद गिरफ्तारी का आदेश बनाया गया. ये होना स्वाभाविक था क्योंकि गिरफ्तारियां जितनी तेज़ चल रही थीं कागज़ों पर दौड़ रही कलम उसकी बराबरी कर नहीं पा रही थी.

वास्तव में अब तक जो सत्ताधीशों के विचार में था वो रातोंरात कागज़ों पर जारी हो गया.

देश को इंदिरा ने क्या बताया ?
26 जून की सुबह 6 बजे मंत्रिमंडल की बैठक के बाद इंदिरा गांधी भारत में आपातकाल की घोषणा करने के लिए ऑल इंडिया रेडियो के स्टूडियो पहुंच गईं. आकाशवाणी के अधिकारियों से प्रधानमंत्री के संदेश प्रसारित करने का कहा गया जिसके बाद इंदिरा रिर्काडिंग रूम में चली गईं.यूं तो आपातकाल के लागू होने की वजहों का सभी अपने ढंग से विश्लेषण करते हैं. विपक्षियों का कुछ कहना है तो इंदिरा के सहयोगियों का कुछ और, लेकिन देश को अचानक आपातकाल में धकेलनेवालीं पूर्व प्रधानमंत्री को आखिर देश के सामने कुछ तो बताना ही था. ये अहम है कि उन्होंने रेडियो पर देश को आपातकाल लगाने के पीछे क्या कारण गिनाए.

इंदिरा गांधी ने उस सुबह लोगों के सामने निर्वाचित सरकारों को कुछ लोगों द्वारा काम ना करने देने की दुहाई दी. विरोध प्रदर्शनों की उत्तेजना की ओर सबका ध्यान खींचा. हिंसक घटनाओं का ज़िक्र किया जो देश के कई हिस्सों में घट रही थीं. यहां तक कि उन्होंने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी एलएन मिश्र की नृशंस हत्या को भी उन कारणों में शामिल कर लिया जिसने आपातकाल का माहौल तैयार किया.  वो कह रही थीं कि- कुछ लोग तो हमारे सैन्य बलों और पुलिस को विद्रोह करने के लिए उकसाने की हद तक जा पहुंचे हैं. यह तथ्य कि हमारे सुरक्षा बल एवं पुलिस अनुशासित और पक्के देशभक्त हैं, इसलिए उनकी बातों में नहीं आते, उनकी इस उत्तेजक कार्रवाई की गंभीरता को कम नहीं करता. हमारी एकता को खतरे में डालने के लिए विखंडनकारी तत्व अपनी पूरी शक्ति से काम कर रहे हैं और सांप्रदायिक उन्माद भड़का रहे हैं.

इंदिरा गांधी उस संबोधन में खुद को प्रधानमंत्री रहने या ना रहने को महत्वहीन बताती हैं. वो प्रधानमंत्री संस्था को महत्वपूर्ण बताते हुए समझा रही हैं कि उसकी गरिमा को कम करने का राजनीतिक प्रयास प्रजातंत्र या राष्ट्र के हित में नहीं है.

‘राष्ट्र की अखंडता ठोस कार्रवाई की मांग करती है.इस कथन के साथ पक्के इरादों वाली इंदिरा गांधी ने बता दिया कि वो जिस ओर बढ़ चली हैं अब हटनेवाली नहीं हैं.

आपातकाल का एक दिलचस्प किस्सा
यूं तो उस दौर को देखनेवाले हर आदमी के पास अपने किस्से हैं जो खूब बांचे भी गए लेकिन यहां हम कई किताबों की लेखिका और पत्रकार कूमी कपूर की किताब ‘इमरजेंसी’ से एक घटना आपके सामने रख रहे हैं.

वो 26 जून 1975 की सुबह थी. दिल्ली में गिरफ्तारियों का दौर जारी था. डीआईजी रेंज भिंडर की अगुवाई में पुलिस का जत्था दिल्ली यूनिवर्सिटी को चारों तरफ से घेर चुका था.करीब 200 एबीवीपी कार्यकर्ता अपने छात्रसंघ अध्यक्ष अरुण जेटली को सुनने इकट्ठा हुए थे. तब तक किसी को मालूम नहीं था कि ये इमरजेंसी की शुरूआत है.. हालांकि कई विपक्षी नेता पिछली रात जेल में डाले जा चुके थे. पुलिस को देख जेटली ने अपने साथियों विजय गोयल (अब केंद्रीय मंत्री) और रजत शर्मा (अब पत्रकार) से जाकर छिप जाने को कहा. इसके बाद जेटली ने अपने एबीवीपी के ही एक और साथी प्रभु चावला ( पत्रकारिता की दुनिया के जानेमाने चेहरे) से कहा कि वो अपना स्कूटर लेकर उनसे यूनिवर्सिटी की एक बिल्डिंग के पास मिलें. इससे पहले की पुलिस जेटली के पास पहुंचती वो वहां से रफूचक्कर हो गये.. लेकिन प्रभु चावला स्कूटर के साथ नहीं मिले. प्रभु चावला दगा दे गए. बाद में मालूम चला कि प्रभु चावला, बलबीर पुंज (भाजपा के राज्यसभा सांसद) और श्रीराम खन्ना ने इंदिरा के बीस सूत्रीय कार्यक्रम पर हस्ताक्षर कर दिए. ( ये इंदिरा के पक्ष में एक प्रतिज्ञा की तरह था जिसका मकसद सिर्फ ये घोषणा थी कि आप इंदिरा के विरोधी संगठन से असंबद्ध हैं और अब सरकार के साथ हैं). कूमी ने ये किस्सा जेटली से साक्षात्मकार में सुना था.

इसी तरह सभी ने सुना है कि पीएम मोदी भी कई रूप बनाकर आपातकाल में भमिगत रहे, बाद में उन्होंने एक किताब भी लिखी.

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