और इस तरह 44 साल पहले आज ही के दिन लागू कर दी गई थी Emergency

इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी का मानना था कि प्रधानमंत्री के रूप में पार्टी के किसी भी नेता पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि उस स्थिति में इंदिरा की हैसियत पार्टी के अंदर कम होगी.

नई दिल्ली: इतिहास में 25 जून का दिन भारत के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटना का गवाह रहा है. आज ही के दिन 1975 में देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की गई जिसने कई ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया.

26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल था. तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी.

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. रातोंरात लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए. विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया. अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

अब सवाल यह उठता है कि देश में आपातकाल क्यों लगाया गया.

सन 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद देश का विकास सुस्त पड़ गया था. इसके अलावा बेरोज़गारी, सूखा, तेल संकट और चरमराती अर्थव्यवस्था मज़दूरों, छात्रों या यूं कहें पूरी आवाम में आक्रोश पैदा कर रहा था.

जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया और उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखा और देश के बिगड़ते हालात के बारे में बताया. 8 अप्रैल 1974 को जयप्रकाश नारायण ने सरकार के विरोध में एक जुलूस निकाला, जिसमें सत्ता के खिलाफ लाखों लोगों ने हिस्सा लिया.

जयप्रकाश नारायण ने उत्तर भारत के कई हिस्सों का दौरा किया, छात्रों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों को आंदोलन में शामिल होने के लिए तैयार किया. 1971 में जिन विपक्षी दलों को कुचल दिया गया, उन्होंने जेपी को एक लोकप्रिय नेता के तौर पर देखा, जो इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़े होने के लिए सबसे उपयुक्त थे.

जेपी ने भी इन दलों की संगठनात्मक क्षमता की आवश्यकता को महसूस किया, ताकि वे इंदिरा गांधी का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें.

वहीं दूसरी तरफ ‘राजनारायण बनाम उत्तरप्रदेश’ केस में आये फ़ैसले ने इंदिरा गांधी के अंदर बौखलाहट पैदा कर दी, नतीजतन पूरे देश में अपाताकाल लागू कर दिया गया.

दरअसल 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इस केस में इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली का दोषी पाते हुए उनके रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दे दिया.

मामला 1971 के रायबरेली चुनावों से जुड़ा था. ये वही लोकसभा चुनाव था, जिसमें इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को जबरदस्त क़ामयाबी दिलाई थी. इंदिरा खुद रायबरेली से चुनाव जीती थीं. उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण को भारी अंतर से हराया था लेकिन राजनारायण अपनी जीत को लेकर इतने आश्वस्त थे कि नतीजे घोषित होने से पहले ही विजय जुलूस निकाल दिया था.

अदालत ने इसके साथ ही अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. ऐसी स्थिति में इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा. अब उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के इस फैसले पर खूब माथापच्ची की लेकिन उस समय पार्टी की जो ​स्थिति थी उसमें इंदिरा गांधी के अलावा किसी और को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमति नहीं बनी.

‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ का नारा देने वाले कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने इंदिरा गांधी को सुझाव दिया कि अंतिम फैसला आने तक वे कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं और बरुआ प्रधानमंत्री बन जाएंगे.

जबकि इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी का मानना था कि प्रधानमंत्री के रूप में पार्टी के किसी भी नेता पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि उस स्थिति में इंदिरा की हैसियत पार्टी के अंदर कम होगी.

बताया जाता है कि इंदिरा गांधी अपने बेटे के तर्कों से सहमत हो गई. उन्होंने तय किया कि वे इस्तीफा देने के बजाय बीस दिनों की मिली मोहलत का फायदा उठाते हुए फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी.

इंदिरा गांधी ने इस फैसले के ख़िलाफ़ 23 जून को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्णत: रोक लगाने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट की ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ के जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने 24 जून को अपना फ़ैसला पढ़ते हुए कहा कि वो प्रधानमंत्री बनी रह सकतीं है लेकिन फैसले पर पूर्ण रोक नहीं लगाया जा सकता.

कोर्ट ने बतौर सांसद इंदिरा गांधी के वेतन और भत्ते लेने पर भी रोक बरकरार रखी.

इधर गुजरात और बिहार में छात्रों का आंदोलन उग्र होता जा रहा था, पूरा विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो चुका था. लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण यानी जेपी पूरे विपक्ष की अगुआई कर रहे थे. वे केंद्र सरकार पर पूरी तरह से हमलावर थे इसके साथ ही बिहार की कांग्रेस सरकार से भी इस्तीफा देने की मांग कर रहे थे.

वहीं कोर्ट के फैसले ने विपक्ष को हिम्मत दे दी वो पूरी तरह से इंदिरा सरकार पर आक्रामक हो गई.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन ही यानी 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की रैली थी. जेपी ने इंदिरा गांधी को स्वार्थी और महात्मा गांधी के आदर्शों से भटका हुआ बताते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की. इसी रैली में जेपी ने रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का अंश ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को नारे के तौर पर गढ़कर लोगों के अंदर सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह पैदा कर दी.

इतना ही नहीं जेपी ने देश की सेना और पुलिस से कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वो सरकार के उन आदेशों की अवहेलना करें जो उनकी आत्मा को कबूल न हों.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने तो इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की इजाजत दे दी थी, लेकिन समूचा विपक्ष सड़कों पर उतर चुका था.

वहीं इंदिरा गांधी किसी तरह सत्ता में बने रहना चाहती थीं और उन्हें अपनी पार्टी में किसी पर भरोसा नहीं था. ऐसे हालात में उन्होंने जयप्रकाश नारायण का बहाना बनाते हुए आपातकाल लागू करने का फैसला ​किया.

25 जून को दिन में जेपी की रैली हुई और रात में इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा कर दी गई है.

आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी.’

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