kandhar ajit dowal, वो पल जब अजीत डोभाल के सामने भारतीयों ने नहीं लगाए ‘भारत माता की जय’ के नारे
kandhar ajit dowal, वो पल जब अजीत डोभाल के सामने भारतीयों ने नहीं लगाए ‘भारत माता की जय’ के नारे

वो पल जब अजीत डोभाल के सामने भारतीयों ने नहीं लगाए ‘भारत माता की जय’ के नारे

भारत सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के खाते में भले ही हजारों उपलब्धियां हों, लेकिन कुछ मलाल उन्हें भी हैं. उन्हीं में से एक दुख के बारे में हम आपको बता रहे हैं.
kandhar ajit dowal, वो पल जब अजीत डोभाल के सामने भारतीयों ने नहीं लगाए ‘भारत माता की जय’ के नारे

देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल करीब डेढ़ सौ भारतीयों के सामने ‘भारत माता की जय’ या फिर ‘जय हिंद’ के नारे लगाएं लेकिन सामने से जवाब सन्नाटे में आए, क्या आप इस नज़ारे की कल्पना कर सकते हैं?

ऐसा ही हुआ था. वो भी आज से ठीक बीस साल पहले. वाकया भी खुद डोभाल ने ही बताया था, मगर ऐसा क्यों हुआ इसकी वजह जब आपको बताएंगे तो आप समझ सकेंगे कि वो क्या हालात थे कि डोभाल को अपने जोश में लगाए नारों का जवाब हिंदुस्तानियों की खामोशी में मिला.

बीस साल पहले कुछ यूं शुरू हुई अजीत डोभाल की परीक्षा

इस घटना को समझने के लिए आपको जाना होगा साल 1999 के आखिरी महीने में. वो 24 दिसंबर 1999 था जब इंडियन एयरलाइंस का विमान IC-814 नेपाल के काठमांडू से उड़ा दिल्ली के लिए था लेकिन  डेढ़ घंटे के उस सफर को एक हफ्ते के इंतज़ार में तब्दील हो जाना था. विमान ने दो घंटे की देरी से शाम 4 बजकर 27 मिनट पर त्रिभुवन हवाई अड्डे की ज़मीन को छोड़ा.

भारतीय वायुसीमा में घुसते ही करीब 4 बजकर 53 मिनट पर विमान में मौजूद करीब 170 यात्रियों और 15 सदस्यों के चालक दल को अहसास हुआ कि उनकी ज़िंदगी हरकत उल मुज़ाहिद्दीन के 5 आतंकवादियों की बंदूकों के निशाने पर है.

एक नकाबपोश हाईजैकर ने पायलट को हुक्म दिया कि अब उड़ान को पश्चिमी दिशा में मोड़ दिया जाए. जैसे ही विमान ने लखनऊ के आसमान में अपना तय रास्ता छोड़ा ज़मीन पर हलचलें बढ़ गईं. अस्वाभाविक घटनाओं को महसूस किया जा रहा था लेकिन अभी तस्वीर साफ होने में वक्त था. हाईजैकर्स विमान को लाहौर ले जा रहे थे मगर ईंधन की कमी के चलते उसे अमृतसर उतरना पड़ा.

उस दौर में इंटलिजेंस ब्यूरो के स्पेशल डायरेक्टर रहे अजीत डोभाल ने ज़ी को दिए अपने एक इंटरव्यू में बताया कि क्राइसिस मैनेजमेंट की टीम सक्रिय हो उठी थी. हर संबंधित एजेंसी को अलर्ट किया गया. कार्यवाही भी शुरू हो गईं. इसके बाद अमृतसर में ही विमान को रोकने की कुछ कोशिशें ज़रूर हुईं मगर 45 मिनटों तक विमान खड़े रहने के बावजूद कुछ खास नहीं हुआ. एक बार फिर विमान हवा में था लेकिन ईंधन की कमी ने हाईजैकर्स को मजबूर कर दिया कि वो फिर से उसे नीचे उतारें. इस बार विमान लाहौर हवाई अड्डे पर उतरा. ढाई घंटे तक विमान लाहौर में खड़ा रहा. उसमें ईंधन भरा गया जिसके बाद रात के अंधेरे में ही दुबई की ओर फिर उड़ान भरी गई. यहां 27 यात्रियों को मुक्त किया गया लेकिन साथ ही 25 साल के रुपन कत्याल का शव भी बाहर आया जिन्हें चाकुओं से गोद कर आतंकियों ने मौत की नींद सुला दिया था.

अजीत डोभाल बताते हैं कि कत्याल की मौत के बाद मीडिया और देश की जनता ने सरकार पर दबाव बना दिया कि विमान यात्रियों को सुरक्षित लौटा लाया जाए. डोभाल ये भी कहते हैं कि दुबई में रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने की संभावना नहीं बन पाई. कोई फिज़िकल एक्शन लिया जाना मुमकिन नहीं था. विमान तक पहुंचने का ज़रिया पाकिस्तान ही था जो शायद उसकी इजाजत नहीं देता. रेस्क्यू के लिए बड़ी तादाद में लोगों को ले जाना पड़ता. इसके अलावा एक खतरा डोभाल ये भी बताते हैं कि अगर आतंकियों को भारत के रेस्क्यू ऑपरेशन की भनक पड़ती तो सबसे पहला नुकसान बंधक यात्रियों को होता.

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कंधार हाईजैकिंग मामले में ऐसे हुई अजीत डोभाल की एंट्री

दुबई के बाद भारतीय यात्रियों को लेकर विमान 25 दिसंबर को सुबह सवा 8 बजे अफगानिस्तान के कंधार हवाई अड्डे पर उतरा. उस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था. अपने टीवी इंटरव्यू में अजीत डोभाल बताते हैं कि उन्हें स्पेशल एयरक्राफ्ट से कंधार जाने के लिए कहा गया. हाईजैकर्स से बातचीत का दारोमदार उन्हीं पर था. वो बताते हैं कि उन्हें अहसास हो गया कि हाईजैकिंग में की गई बातचीत कूटनीतिक बातचीत से अलग होती है.

डोभाल समझाते हैं कि हाईजैकर्स से बातचीत के तीन उद्देश्य होते हैं.

  1. किसी यात्री या चालक दल को नुकसान ना पहुंचे.
  2. अपनी सरकार या फिर जिस देश की ज़मीन पर विमान खड़ा हो वहां की सरकार को रेस्क्यू ऑपरेशन का मौका मिले.
  3. बातचीत के दौरान हाईजैकर्स के संबंध में जितनी जानकारी संभव हो उतनी जुटाना

अजीत डोभाल ने अपने इंटरव्यू में कंधार अपहरणकांड को याद करते हुए कहा कि हाईजैकर्स की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें परेशान नहीं किया जा सकता था. उन्हें खाना और दवाई मिल रहे थे. वो असुरक्षा की भावना में भी नहीं थे. उनका विमान में जाना और बाहर आना लगा हुआ था. डोभाल मानते हैं कि हाईजैकर्स से समझौते में सबसे बड़ी मुश्किल ही ये थी कि वो दबाव में नहीं थे, इसके उलट भारतीय पक्ष दबाव में था क्योंकि उसे तालिबान की चौतरफा मौजूदगी में बातचीत करनी थी. ऊपर से वहां ISI भी मौजूद थी. हाईजैकर्स को मालूम था कि भारतीय पक्ष दबाव में है. खुद डोभाल कहते हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी हाईजैकर्स को भारत की पल-पल की स्थिति से वाकिफ करा रही थी. वो बार-बार भारतीय मीडिया में चल रही खबरों का हवाला दे रहे थे. हाईजैकर्स कहते कि आप क्या करेंगे, आपकी तो मजबूरी है. अपनी जनता को देखिए, मीडिया को देखिए. आपको तो हमारे लोग छोड़ने ही पड़ेंगे.

अजीत डोभाल ने अपनी विवशता ज़ाहिर करते हुए कहा कि हमें हाईजैकर्स के बारे में जो भी जानकारी मिल रही थी उसके आधार पर कार्यवाही करने के लिए साधन नहीं थे. ना तो तालिबानी शासन खुद कार्यवाही करने को तैयार था और ना ही भारतीयों को छूट देने को तैयार था. उन्होंने कह दिया था कि वो ऐसी कोई भी कार्यवाही नहीं होने देंगे जिसमें खून खराबे का डर हो.

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हाईजैकर्स की वो मांगें और आखिरकार बनी सहमति 

अजीत डोभाल बताते हैं कि शुरूआत में हाईजैकर्स की मांगें अजीब थीं. वो राजनीतिक मांगें पूरी करवाना चाहते थे. उन्होंने भारत सरकार से कश्मीर छोड़ देने को कहा. चौबीस घंटे के बाद ही हाईजैकर्स अपनी असल मांगों पर आए. उन्होंने 36 आतंकियों को भारतीय जेलों से छोड़ने को कहा. अपने साथी सज्जाद अफगानी का शव लौटाने की मांग की. साथ ही उन्होंने दो सौ मिलियन डॉलर की फिरौती भी मांगी. डोभाल कहते हैं कि हाईजैकर्स ने सबसे पहले पैसे और शव की मांग छोड़ दी. वो शायद इन्हें लेकर गंभीर भी नहीं थे. तालिबान के एक मंत्री ने बताया कि उन्होंने ही हाईजैकर्स को कहा कि ऐसी मांगें गैर इस्लामिक हैं. हालांकि आतंकियों को छुड़ाने की मांग अभी भी कायम थी.

हाईजैकर्स के तेवर थे कि हम तो फिदायीन हैं, मरने ही आए हैं लेकिन हम विमान को भी उड़ा देंगे. अगर अब भारत सरकार कुछ नहीं करती तो ये उसकी ज़िम्मेदारी है.

कंधार अपहरण कांड के बाद अजीत डोभाल का मलाल

अजीत डोभाल भले ही महज़ तीन आतंकियों की रिहाई को भारतीय पक्ष की उपलब्धि मानते हों, या फिर यात्रियों की सुरक्षित वापसी से खुश हों लेकिन उन्हें कुछ मलाल रह गए. खुद डोभाल अपने इंटरव्यू में कहते हैं कि राष्ट्रीय सम्मान और गौरव को पहुंची ठेस का उन्हें मलाल है. शक्तिशाली देश होने के नाते भारत को जो कुछ करना चाहिए था वो नहीं हो सका. विमान को देश के भीतर ही ना रोक पाने का भी उन्हें दुख है. डोभाल ने अपने एक निजी मलाल को भी साझा किया. उन्होंने बताया कि जब वो कंधार की ज़मीन पर खड़े भारतीय विमान में घुसे तो उन्हें हाईजैकर्स की मौजूदगी में ही बंधक भारतीय यात्रियों को संबोधित करने का मौका मिला. डोभाल ने यात्रियों से कहा कि, ‘आप लोग आज़ाद हैं और भारत सरकार और भारत देश आपके साथ है.  हम आप लोगो को यहां से सुरक्षित ले जाएंगे.’

इसके बाद डोभाल ने ‘भारत माता की जय’ या ‘जय हिंद’ के नारे लगाए तो उन्हें रिस्पॉन्स ही नहीं मिला. डोभाल इसकी वजह लोगों पर छाये डर को मानते हैं. वो कहते हैं कि, ‘मुझे इस बात का ज़रूर मलाल था कि लोग इतने डरे हुए थे. उनके अंदर उस वक्त राष्ट्रीयता की भावना जितनी होनी चाहिए थी (नहीं थी), स्वाभाविक था इतनी देर तक कोई रहता तो ये होता.’

अजीत डोभाल पाकिस्तान को भी दोषी ठहराते हैं. उनका दावा है कि पाकिस्तान की ISI ने कंधार कांड में शामिल हाईजैकर्स को पूरा समर्थन दिया था. संयुक्त राष्ट्र संघ के एंटी हाईजैकिंग कानून पर हस्ताक्षर करने के बावजूद पाकिस्तान का रुख हैरान करनेवाला था. डोभाल ने पाकिस्तान को प्रभावशाली ढंग से डील ना कर पाने का दुख भी ज़ाहिर किया.

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