जानिए, क्या है नेहरू-लियाकत समझौता जिसके विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिया था इस्तीफा

इसे दिल्ली पैक्ट (Delhi Pact) के नाम से भी जाना जाता है. समझौते के समय सरदार वल्लभ भाई पटेल भी मौजूद थे.

नागरिकता संशोधन बिल, 2019 ( Citizenship amendment bill, 2019) लोकसभा में सोमवार को पास हो गया. राज्यसभा में इसे बुधवार को पेश किया जाएगा. बिल को लेकर सदन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने 1950 में हुए नेहरू-लियाकत समझौते ( Nehru-Liaquat Pact, 1950) का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इसे पूर्ण रूप से लागू ही नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि अगर विभाजन धर्म के आधार पर नहीं होता इस बिल को लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

असम के मंत्री हेमंत विस्व शर्मा ने भी लोगों को नेहरू लियाकत समझौता की याद दिलाई. विस्व शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि यह बिल नेहरू-लियाकत समझौता की ऐतिहासिक भूलों को ठीक करनेवाला है.

आइए हम जानते हैं कि कौन था लियाकत अली खान और क्यों हुआ था नेहरू लियाकत समझौता.

लियाकत अली खान

लियाकत अली खान विभाजन और आजादी से पूर्व भारत में एक अस्थायी और कम समय की सरकार में पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल सहयोगी रहे थे. वित्त मामलों को देखने की जिम्मेदारी को तरीके से नहीं निभाने के कारण लियाकत वहां काफी विवादित रहे थे. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़े लियाकत बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने. उन्हीं के कार्यकाल में भारत पर पाकिस्तान की ओर से पहला सैन्य हमला किया गया.

मोहम्मद अली जिन्ना से राजनीति सीखने वाले लियाकत ने अपना पहला चुनाव मुजफ्फरनगर (यूनाइटेड प्रोविंसेज) से लड़ा था. पाक के प्रधानमंत्री के तौर उनकी एकमात्र बड़ी उपलब्धि 1949 में नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान बनाने का है. 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के कंपनी बाग में लियाकत अली खान की गोली मारकर हत्या कर दी गई. लियाकत की हत्या के बाद पहले दशक में ही पाकिस्तान में लगातार रहने वाले सैन्य शासन की शुरुआत हो गई.

क्या है नेहरू-लियाकत समझौता

स्वतंत्र भारत और नए बने पाकिस्तान बंटवारे के बाद हुए भीषण दंगों से पीड़ित थे. इसी पृष्ठभूमि में इस समझौते पर दिल्ली के गवर्मेंट हाउस में दोनों देशों के पहले प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान ने दस्तखत किए थे. समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने देश में अल्पसंख्यक आयोग गठित किए थे. इस समझौते के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच दिल्ली में छह दिनों तक बातचीत हुई थी. इसे दिल्ली पैक्ट (Delhi Pact) के नाम से भी जाना जाता है.

समझौते के समय गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल भी मौजूद थे. इस समझौते का विरोध करते हुए नेहरू सरकार के उद्योगमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा दे दिया था. मुखर्जी तब हिंदू महासभा के नेता थे. उन्होंने पैक्ट को मुस्लिम तुष्टिकरण करनेवाला करार दिया था.

आज से 69 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस समझौते की चार प्रमुख बातें –

1. प्रवासियों को ट्रांजिट के दौरान सुरक्षा दी जाएगी. वे अपनी बची हुई संपत्ति को बेचने के लिए सुरक्षित वापस आ-जा सकते हैं.
2. जिन औरतों का अपहरण किया गया है, उन्हें वापस परिवार के पास भेजा जाएगा. अवैध तरीके से कब्जाई गई अल्पसंख्यकों की संपत्ति उन्हें लौटाई जाएगी.
3. जबरदस्ती धर्म परिवर्तन अवैध होगा, अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा के अधिकार दिए जाएंगे. दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह का कुप्रचार नहीं चलाने दिया जाएगा.
4. दोनों देश, युद्ध को भड़ाकाने वाले और किसी देश की अखंडता पर सवाल खड़ा करने वाले प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे. (उपखंड c धारा 8).

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