सावरकर पर शोर के बीच ज़रा अशफ़ाक़ की वो क़ुर्बानी याद कर लें

19 दिसम्बर, 1927 को जिस दिन अशफ़ाक़ को फांसी होनी थी. अशफ़ाक़ ने अपनी जंजीरें खुलते ही बढ़कर फांसी का फंदा चूम लिया और बोले, मेरे हाथ लोगों की हत्याओं से जमे हुए नहीं हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र चुनाव में विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिलाने का वादा कर एक नयी बहस छेड़ दी है. बीजेपी इन्हें महान क्रांतिकारी बताती है तो वहीं  विरोधी कई प्रसंगो का ज़िक्र करते हुए ऐसा मानने से इनकार करते हैं. आज शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का जन्मदिन है. इसलिए आज अशफ़ाक़ की बात करते हैं.

देश में धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता का माहौल बन रहा है. ऐसे में आज का दिन अशफ़ाक़ और बिस्मिल की दोस्ती को याद करने का है. अशफ़ाक़ को शुरुआत से ही शेरो-शायरी का शौक़ था वो ‘हसरत’ के तखल्लुस (उपनाम) से शायरी किया करते थे.

हालांकि घर के अंदर जब भी शायरी की बात चलती तो उनके बड़े भाई राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ का ज़िक्र करते थे. इस वजह से अंदर-ही-अंदर अशफ़ाक़ के मन में ‘बिस्मिल’ के लिए एक दीवानगी पैदा हो रही थी.

चार भाईयों में सबसे छोटे अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को आज के उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िला में हुआ था और वो पांच वक़्त के नमाजी थे. वहीं रामप्रसाद बिस्मिल अपने नाम के आगे पंडित लगाते थे. इतना ही नहीं वो बचपन से ही आर्य समाज से भी जुड़े हुए थे. इसके बावजूद अंग्रेज़ सरकार अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान को बिस्मिल का दाहिना हाथ बताते थे.

बिस्मिल हिन्दू-मुस्लिम एकता पर यकीन करते थे. राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा के अंत में देशवासियों से निवेदन किया था. ‘जो कुछ करें, सब मिलकर करें और सब देश की भलाई के लिए करें. इसी से सबका भला होगा.’

गांधी जी का असहयोग आंदोलन जोरों पर था. तब शाहजहांपुर में बिस्मिल एक मीटिंग में भाषण देने आए थे. अशफ़ाक़ को जैसे ही मालूम पड़ा कि बिस्मिल मीटिंग में आने वाले है वो भी बिना किसी देरी के वहां पहुंच गए. यहीं पर दोनों की पहली मुलाक़ात हुई थी.

अशफ़ाक़ ने बिस्मिल के सामने अपने बड़े भाई का ज़िक्र करते हुए बताया कि वो उनके दोस्त के छोटे भाई हैं. साथ ही ये भी बताया कि वो ‘वारसी’ और ‘हसरत’ के नाम से शायरी करते हैं. बिस्मिल को शायरी वाली बात जंच गई, वो अशफ़ाक़ को अपने साथ ले आए और शेर सुनाने को कहा. बिस्मिल को अशफ़ाक़ की शायरी बेहद पसंद आ गई और इस तरह दोनों की मुलाक़ात शुरू हो गई.

आगे चलकर अशफ़ाक़ और बिस्मिल की जोड़ी फ़ेमस हो गई. वो जहां भी जाते थे महफ़िल लूट लेते थे.

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने के लिए हथियार और पैसे की ज़रूरत थी. ऐसे में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूटने का प्लान बनाया.

काकोरी कांड की जब प्लानिंग हो रही थी तो बिस्मिल जानते थे कि उनके पास दोनों के अलावा बाकी के सदस्य नए हैं और उनसे यह काम करवाना आसान नहीं होगा. यहां तक कि अशफ़ाक़ ने बिस्मिल को यही तर्क देते हुए फिर से सोचने की सलाह दी थी. लेकिन बिस्मिल को अशफ़ाक़ पर भरोसा था और अशफ़ाक़ को बिस्मिल पर.

9 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली पैसेंजर ट्रेन को क्रांतिकारियों ने काकोरी में जबरदस्ती रुकवाया. जब ट्रेन से अंग्रेज़ों का खज़ाना बाहर निकाला गया तो इनके सामने बॉक्स को तोड़ने की चुनौती थी. काफी प्रयास किया गया लेकिन बॉक्स खुल नहीं रहा था.

आख़िरकार बिस्मिल ने अपने सबसे भरोसेमंद दोस्त अशफ़ाक़ से बॉक्स तोड़ने को कहा. अपनी लंबी-चौड़ी क़दकाठी की वजह से अशफ़ाक़ ने कुछ ही प्रयास में ताला तोड़ दिया और ख़ज़ाना लेकर फ़रार हो गये.

तकनीकी कमियों की वजह से एक महीने के अंदर ही करीब 40 लोगों की गिरफ्तारी हुई. इनमें स्वर्ण सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान, राजेंद्र लाहिड़ी, दुर्गा भगवती चंद्र वोहरा, रोशन सिंह, सचींद्र बख्शी, चंद्रशेखर आजाद, विष्णु शरण डबलिश, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल, शचींद्रनाथ सान्याल एवं मन्मथनाथ गुप्ता शामिल थे.

इनमें से 29 लोगों के अलावा बाकी को छोड़ दिया गया. 29 लोगों के खिलाफ स्पेशल मैजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा चला.

अप्रैल, 1927 को आखिरी फैसला सुनाया गया. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. जिनलोगों पर मुकदमा चलाया गया उनमें से कुछ को 14 साल तक की सजा दी गई. दो लोग सरकारी गवाह बन गए, इसलिए उनको माफ कर दिया गया. दो और क्रांतिकारी को छोड़ दिया गया था.

चंद्रशेखर आजाद किसी तरह फरार होने में कामयाब हो गए थे लेकिन बाद में एक एनकाउंटर में वह शहीद हो गए.

राजेंद्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में, 19 दिसंबर को बिस्मिल को गोरखपुर जिला जेल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान को फैजाबाद जिला जेल और रोशन सिंह को इलाहाबाद के मलाका जेल में फांसी दी गई. जेल में बंद रहते हुए बिस्मिल ने मेरा रंग दे बसंती चोला गीत लिखा.

19 दिसम्बर, 1927 को जिस दिन अशफ़ाक़ को फांसी होनी थी. अशफ़ाक़ ने अपनी जंजीरें खुलते ही बढ़कर फांसी का फंदा चूम लिया और बोले, मेरे हाथ लोगों की हत्याओं से जमे हुए नहीं हैं. मेरे खिलाफ जो भी आरोप लगाए गए हैं, झूठे हैं. अल्लाह ही अब मेरा फैसला करेगा. फिर उन्होंने वो फांसी का फंदा अपने गले में डाल लिया.