औरंगज़ेब का सत्ता संघर्ष : दारा शिकोह समेत तीनों भाइयों के कत्ल और शाहजहां की नजरबंदी का सच

आगरा शहर को समर्पित इस खंड में लेखक ने औरंगज़ेब और उसके भाइयों दारा शिकोह, शाह शुजा और मुराद बख्श के बीच शाहजहां के तख्त हासिल करने को लेकर हुए खूनी संघर्ष की पड़ताल की है.
Aurangzeb power struggle the murder of three brothers, औरंगज़ेब का सत्ता संघर्ष : दारा शिकोह समेत तीनों भाइयों के कत्ल और शाहजहां की नजरबंदी का सच

भारतीय समाज में औरंगज़ेब का किरदार हमेशा से तीखी बहस का विषय बना रहा है. इन दिनों केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से हुमायूं का मकबरा कैंपस में स्थित 140 कब्रों में दारा शिकोह की कब्र तलाशने के लिए इतिहासकारों के पैनल गठन के बाद यह फिर सामने आ गया है. औरंगज़ेब के नायक या खलनायक होने की बहस बदस्तूर चलती रहती है. इन बहसों में औरंगजेब के ईमान पर चर्चा ज्यादा सुर्खियां बटोरती हैं, इतिहास पर कम. औरंगज़ेब को लेकर सवालों, आरोपों और कमोबेश ऐसे ही जवाबों के अंधड़ के बीच कई बार पता नहीं चलता कि हकीकत क्या है?

शाहजहां के तख्त को लेकर खूनी संघर्ष

पत्रकार-संपादक-लेखक अफसर अहमद ने औरंगज़ेब को लेकर यह बीड़ा उठाया है. सामान्य यानी गैर अकादमिक हिंदी-उर्दू में ‘औरंगज़ेब नायक या खलनायक’ विषय पर वह छह खंडों में एक सीरीज ला रहे हैं. इसका दूसरा खंड ‘सत्ता संघर्ष’ नाम से प्रकाशित हुआ है. आगरा शहर को समर्पित इस खंड में लेखक ने औरंगज़ेब और उसके भाइयों दारा शिकोह, शाह शुजा और मुराद बख्श के बीच शाहजहां के तख्त हासिल करने को लेकर हुए खूनी संघर्ष की पड़ताल की है. साजिशों, धोखों और कई जंगों की दास्तानगोई और फैक्ट चैक करने की एक मजबूत कोशिश की है. सीरीज के दूसरे खंड में भी पहले की तरह औरंगज़ेब पर लिखे गए मूल संदर्भ ग्रंथों का ही सहारा लिया गया है.

मूल फारसी फरमानों से ली मदद

इतिहास में इससे पहले औरंगज़ेब पर सबसे ज्यादा पांच खंडों की एक सीरीज इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अंग्रेजी में लिखा है. अफसर अहमद की यह सीरीज हिंदी में एक प्रमाणिक पहल है और इसमें पूर्ववर्ती के मुकाबले एक खंड ज्यादा लाने की योजना है. लेखक के मुताबिक इन छह खंडों में औरंगज़ेब की पूरी जिंदगी पर चर्चा की जाने वाली है. पहले खंड में उन तमाम सवालों को पिरोया गया था जो बार-बार बहस का हिस्सा बन जाता है. दूसरे खंड में जिन सवालों के जवाब खोजे गए हैं उनमें औरंगज़ेब पर भाइयों के कत्ल और शाहजहां को नजरबंद किया जाना शामिल है. इनके लिए मूल फारसी फरमानों के अनुवाद की मदद ली गई है. साथ ही इस खंड में मुगल बादशाह शाहजहां के आखिरी दिनों के बारे में मुस्तैदी से बताने की कोशिश भी की गई है.

तस्वारों में पत्रकरिता की झलक

डिजिटल शब्दावली में कहें तो ‘सत्ता संघर्ष’ के हरे कवर पर भगवा रंग में दर्ज औरंगज़ेब बाउंस रेट कम होने की गारंटी है. वहीं किताब के आखिरी पन्नों में दर्ज संदर्भों की सूची पढ़कर तथ्यों की प्रमाणिकता पर भरोसा बना रहेगा. करीब 15 संदर्भ ग्रंथों में अधिकतर 80-100 साल पुराने हैं. कुछ किताबें औरंगज़ेब की समकालीन भी हैं. लेखक ने अपनी कृति में तस्वीरों का बेहद सधा हुआ इस्तेमाल किया है. इस काम में उनकी पत्रकारिता की झलक दिखती है.

किताब की शुरुआत में इतिहास विभाग, सेंट जोन्स कॉलेज, आगरा के पूर्व विभागाध्यक्ष रमेशचंद्र शर्मा ने लिखा है कि अभी लेखन कार्य का प्रारंभ ही है. इसके पूर्ण हो जाने पर कोई सम्मति देना सार्थक होगा. अभी सीरीज के चार और खंड सामने आने वाले हैं. यह सीरीज इतिहास में दिलचस्पी और खबरों में प्रमाणिकता रखने वाले छात्रों, शिक्षकों, पत्रकारों और लेखकों के लिए संदर्भ स्रोत की तरह काम आ सकती है. लेखक की इस सीरीज से पहले आई किताब ‘ताजमहल या ममी महल’ भी काफी चर्चा में रही है.

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