बेहमई कांड : जब फूलन देवी ने 20 ठाकुरों को गोलियों से भून डाला, जानें क्‍यों हुआ था ये नरसंहार?

दस्यु सुंदरी फूलन देवी ने गैंगरेप का बदला लेने के लिए एक साथ 20 लोगों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था.
Behamai Massacre case, बेहमई कांड : जब फूलन देवी ने 20 ठाकुरों को गोलियों से भून डाला, जानें क्‍यों हुआ था ये नरसंहार?

देश-प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला देने वाले बेहमई कांड में आज लोअर कोर्ट का फैसला आ सकता है. इस नरसंहार ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. 14 फरवरी 1981 में एक साथ 20 लोगों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया था. इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही मुख्‍य आरोपी फूलनदेवी समेत 15 लोगों की मौत हो चुकी है. बेहमई कांड की मुख्य आरोपी डकैत फूलन देवी की 2001 में हत्या कर दी गई थी. 2011 में 5 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल शुरू हुआ लेकिन उनमें से भी एक की मौत हो चुकी है.

क्‍या है बेहमई हत्‍याकांड?

उत्तरप्रदेश के कानपुर में एक छोटा सा गांव है – बेहमई. फूलन यहीं रहती थी. उसका बाल विवाह कर दिया गया था. शादी के बाद फूलन को प्रताड़ित किया गया. डरी-सहमी फूलन मायके लौट आई. इस बीच, फूलन के पिता की 40 बीघा जमीन पर चाचा ने कब्जा कर लिया था. 11 साल की फूलन ने अपने चाचा से जमीन मांगी तो चाचा ने फूलन देवी पर डकैती के केस दर्ज करवा दिए. फूलन को जेल जाना पड़ा. जेल से बाहर निकलते ही फूलन डकैतों के गिरोह के संपर्क में आ गई. दूसरे गैंग के लोगों ने फूलन का गैंगरेप कर दिया. कहा जाता है कि दस्यु सुंदरी फूलन देवी ने इसका बदला लेने के लिए ठाकुर जाति के 20 लोगों को मौत के घाट उतार कर लिया. डकैत गैंग के अनुसार ये सभी बलात्कारी फूलन के गुनहगार थे. फूलन देवी ने इन्हें अपने तरीके से ही मौत की सजा सुनाई. इस हत्याकांड के बाद से ही फूलन देवी को ‘बैंडिट क्वीन’ कहा जाने लगा.

14 फरवरी 1981 को फूलन देवी साथी डकैतों के साथ बेहमई गांव पहुंची थी. इसके बाद तुलसीराम, जगन्नाथ सिंह, राजेंद्र सिंह, सुरेंद्र सिंह, रामाधार सिंह, लाल सिंह, रामचंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, शिव बालक सिंह, शिवराम सिंह, बनवारी सिंह, नरेश सिंह, दशरथ सिंह, हरिओम सिंह, हुकुम सिंह, हिम्मत सिंह समेत 20 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. जंटर सिंह समेत 6 से ज्यादा गांव के लोग गोली लगने से घायल हुए. इस हत्‍याकांड से तत्‍कालीन वीपी सिंह सरकार गिर गई. उन्‍होंने नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हुए मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा दे दिया.

‘वो शाम अजीब थी’

इस हत्याकांड के बाद राजाराम नाम के शख्‍स ने फूलनदेवी समेत 35-36 डाकुओं के खिलाफ सिकंदरा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. इस हत्याकांड में राजाराम का भाई बनवारी भी मारा गया था. अब राजाराम कहते हैं कि मैं बेहमई कांड पर फैसला आने के बाद ही इस दुनिया से विदा लेना चाहता हूँ. राजाराम ने बताया कि हत्याकांड वाले दिन मैं झाड़ियों में छुपकर देख रहा था. डाकू धीरे-धीरे गांव में घुसने लगे. 35 से 40 डकैत फूलन के साथ थे. पहले किली ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वो अक्सर गांव से होकर गुजरा करते थे. औरतें गावों में काम करने गई थी. मर्द घर पर ही थे. फूलन देवी फूलन ने ऊंची आवाज़ में कि पूछा कि लालाराम और श्रीराम (फूलन के साथ दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म की साजिश रचने वाले) को रसद कौन देता है और हमारी मुखबिरी कौन करता है? गांव के टीले के पास गांव के 23 लोग और 3 मजदूरों के पकड़ कर ले जाया गया. और कुछ देर बाद गोलियां चलने की आवाज़ आई. गांव के 20 लोग मारे जा चुके थे. लगभग 4 से 4:30 के बीच फूलन अपने साथियों के साथ गांव छोड़ चुकी थी. वो अजीब शाम थी. महिलाओं के विलाप की आवाजें आती रहीं, जानवर चिल्लाते रहे. पुलिस घटना के 4 घंटे बाद पहुंची.

मां ने कहा कि मैं नहीं चाहती थी कि बेटी डकैत बने

फूलन देवी की मां मुला देवी, कालपी से 10 किलोमीटर शेखपुरा गुढ़ा गांव में अकेले ही रहती है. भाई पुलिस में है. पास ही में उनकी फूलन की बहन अपने परिवार के साख रहती है. फूलन की मां ने कही जिस जमीन के लिए फूलन ने ये लड़ाई लड़ी वो आज तक हमें नहीं मिली. 70 के दशक में जब फूलन बागी हो गई थी तो फूलन का घर कच्चा था. अब मकान पक्का हो गया है लेकिन बदलाव कुछ खास नहीं है. मुला देवी ने बताया कि मेरी बेटी बहुत सीधी थी. वह लड़ाई-झगड़ों से दूर रहती थी, लेकिन जब अति हो गई और कोई चारा नहीं बचा तो डकैत बन गई. उन्होने बताया कि फूलन जब सांसद बनी थी तो गांव आई. लोगों को यहां कंबल-स्वेटर बांटे. मेरी बेटी अगर जिंदा होती तो हम लोगों के लिए भी कुछ करती. फूलन की मां इंदिरा गांधी से लेकर अखिलेश तक से मिल चुकी हैं. अखिलेश यादव ने एक बार मुला देवी को 50 रूपए की मदद दी थी.

चश्मदीद जिसके सीने पर तीन गोलियां लगी फिर भी बच गई जान

जेंटर सिंह उन लोगों में थे जिनके सीने पर गोलियां चलाई गई थी. हत्याकांड के चश्मदीद जेंटर सिंह ने बताया एक साथ 26 लोगों के लाइन में खड़ा करके गोलियां बरसाई गई. कुछ लोगों ने झूठमूठ भी गिरकर तड़पकर मरने का बहना किया. एक-एक को चेक कर गोलियां मारी. मुझे भी सीने पर बंदूक रखकर तीन गोलियां मारी जो मेरे शरीर से आरपार हो गईं. 3 साल तक कानपुर और लखनऊ में इलाज चला. किस्मत अच्छी थी तो बच गया. वो घटना यादकर अब भी रौंगटे घड़े हो जाते हैं.

केस पर नजर

इस घटना के ठीक दो साल बाद 1983 में फूलन ने सरेंडर कर दिया. वह मिर्जापुर से सांसद भी बनीं। बैंडिट क्वीन के दुश्मनों की संख्या भी कम नहीं थी. साल 2001 में दिल्‍ली में उनके घर के सामने ही गोली मार कर उनकी हत्‍या कर दी गई.

बेहमई हत्याकांड में आरोपी विश्वनाथ उर्फ पूतानी, भीखा, श्यामबाबू जमानत पर हैं जबकि आरोपी पोसा अभी भी जेल में हैं. इस मामले में 21 सितंबर 2012 को पहली बार गवाही शुरू हो पाई और12 लोगों की गवाही हुई. साल 2012 में फूलन देवी, पोसा, भीखा,श्यामबाबू, विश्वनाथ, और राम सिंह पर आरोप तय किए गए.

38 सालों में बेहमई गांव में क्या बदला?

बेगृहमई गांव में आज भी कुछ नहीं बदला. गांव में फोन कनेक्टिविटी है. नजदीकी बस स्टैंड 14 किमी दूर है. बिजली कम ही आती है. प्राइमरी हेल्‍थ सेंटर तक पहुंचने में दो घंटे से ज्यादा लग जाते हैं. रात होते ही गांव अंधेरे में डूब जाता है. इस हत्याकांड में मारे गए लोगों की विधवाएं न्याय की उम्मीद में अपना जीवन काट रही हैं. इन विधवाओं में ज्यादातर की मृत्यु हो चुकी है. केवल 8 महिलाएं ही बची हैं. इन महिलाओं को विधवा पेंशन का वादा किया गया था. आजतक किसी को भी पेंशन नहीं मिली.

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