75 साल तक संघ-बीजेपी के हर उतार-चढ़ाव को देखने वाले इस नेता की पारी 2019 में होगी खत्म?

बीजेपी में जनरेशन शिफ्ट पिछले लोकसभा चुनाव से ही होने लगा था और इस चुनाव तक लग रहा है कि ये चक्र पूरा हो जाएगा. इस चक्र की आखिरी कड़ी जो नेता बन रहा है वो पार्टी से नाराज़ है. आइए एक नज़र डालते हैं उसी नेता के करियर ग्राफ पर जिसने बीजेपी को अपने जीवन से सींचा.

साल 2019 का लोकसभा चुनाव कई नए चेहरों के लिए शुरूआत है तो वहीं कई पुराने चेहरे यादों की धूल में दफन होने की ओर हैं. ऐसा ही एक चेहरा है मुरली मनोहर जोशी का. जोशी को ना तो इस बार उनकी पार्टी ने टिकट ही दिया और ना ही अब तक उनका नाम स्टार प्रचारकों की सूची में है.

राजनीतिक विश्लेषकों की राय में इसे जोशी के राजनीतिक प्रस्थान की भूमिका माना जा रहा है लेकिन अब इसे समापन तक आपसी मशविरे से पहुंचाया जाएगा या फिर सिर फुटौव्वल से बस इतना तय होना बाकी है.

 

दिल्ली में जन्म, यूपी में पढ़ाई और संघ से संपर्क
मुरली मनोहर जोशी बीजेपी के कोई आम नेता नहीं रहे. पार्टी के जन्म से पहले, दौरान और बाद में उनकी भूमिका बेहद बड़ी रही है. उन्हें बीजेपी के इतिहास से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता. पूर्वी यूपी की राजनीति में पैठ जमाने वाले डॉक्टर जोशी का जन्म 5 जनवरी 1934 को देश की राजधानी दिल्ली में हुआ था. उनके पिता मनमोहन जोशी केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे. महज़ 24 दिन की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया. मां की ममता तले वो ननिहाल में ही पले-बढ़े. बिजनौर, अल्मोड़ा, मेरठ, इलाहाबाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की.  इलाहाबाद विवि से उन्होंने भौतिकी विज्ञान में एमसससी और स्पेक्ट्रोस्कोपी में डी फिल किया. आगे चलकर यहीं वो भौतिकी विभाग में पढ़ाने लगे और विभागाध्यक्ष बने. इलाहाबाद में ही उनकी मुलाकात प्रो राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया से भी हुई. भविष्य में रज्जू भैया सरसंघचालक बने (संघ के पहले गैर ब्राह्मण प्रमुख भी). रज्जू भैया के सान्निध्य में ही डॉ जोशी ने संघ कार्य तेज़ कर दिया. इलाहाबाद के गांव गांव जाकर वो प्रवास करने लगे. नौकरी के साथ संघ का काम ज़ोरशोर से तब तक चला जब तक वो पूरी तरह राजनीति में ही रच बस नहीं गए.
मुरली मनोहर जोशी की शादी हिंदी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर शिवानी की छोटी बहन तरला से हुई. तरला मध्यप्रदेश के रायपुर में अंग्रेजी की व्याख्याता थीं. शादी के बाद उन्होंने डॉ जोशी के साथ रहना शुरू कर दिया जिसके चलते उन्हें अध्यापन छोड़ना पड़ा.

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आरएसएस से शुरू सामाजिक जीवन
मुरली मनोहर जोशी के दिल्ली स्थित घर के सामने ही आरएसएस की शाखा लगती थी. देखा देखी वो उसमें हिस्सा लेने लगे. 1944 से उनका संबंध संघ से जो बना तो वो आज तक कायम है. साल 1948 में गांधी हत्या के बाद संघ पर पहला प्रतिबंध लगा तो अनेक स्वयंसेवकों की तरह जोशी भी पुलिस के खिलाफ सड़क पर उतरे और गिरफ्तारी दी. अगले साल 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गठन में उन्होंने अहम हिस्सेदारी निभाई. इसी संगठन में साल 1953 में वो राष्ट्रीय महामंत्री भी बने.
1952 में जनसंघ की स्थापना में भी उनका रोल रहा. चाहे 1954 का गोरक्षा आंदोलन हो या फिर 1955-56 का किसान आंदोलन डॉ जोशी ने हर बार पहले से अधिक उत्साह के साथ लड़ाई लड़ी. 1957 में उन्हें जनसंघ की इलाहाबाद शाखा का संगठनमंत्री नियुक्त किया गया.  फिर 1974 आया और इंदिरा शासन के खिलाफ ताल ठोकनेवालों में से वो भी एक बने. 19 महीने तक जोशी ने आपातकाल में जेल काटी. आखिरकार आपातकाल की रात खत्म हुई और उन्होंने अल्मोड़ा से चुनाव जीतकर पहली बार संसद में कदम रखा.

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राजनीति में जोशी की चमक
मुरली मनोहर जोशी को जनता पार्टी संसदीय दल का महासचिव नियुक्त किया गया तो उन्होंने अपने दायित्व को बढ़-चढ़कर निभाया. बीजेपी की स्थापना भी उन्हीं के सामने हुई. अटल और आडवाणी के बाद वो पार्टी के सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे. बुद्धिजीवी होने के साथ-साथ डॉ जोशी शानदार वक्ता और बेहतरीन संगठनकर्ता साबित हो रहे थे. डॉ जोशी बीजेपी के संस्थापक महामंत्री बने और 1996 से 2004 तक उन्होंने संसद में इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व किया. साल 1996 में बीजेपी ने केंद्र मे सरकार बनाई और वो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व मे देश के गृहमंत्री बने. 1998 में उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ विज्ञान एवं तकनीकी तथा महासागर विकास मंत्रालय संभाला.

ये मुरली मनोहर जोशी ही थे जिन्होंने विज्ञान और तकनीकी मंत्री के तौर पर देश को परमाणु शक्ति संपन्न बनते देखा. उस वक्त प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पूर्व पीएम शास्त्री के नारे को संवर्धित करते हुए कहा था- जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान.

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राष्ट्र और धर्म की राजनीति से छुआ चरम

आतंक के खिलाफ पहली बार राजनीतिक स्तर पर बड़ा अभियान चलानेवाले भी डॉ जोशी थे. कन्याकुमारी से कश्मीर तक उन्होंने एकता यात्रा निकाली. बीजेपी के अध्यक्ष के तौर पर जोशी ने 26 जनवरी 1992 को श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहराया.

बाबरी विध्वंस के समय भी जोशी मौके पर मौजूद थे. 6 दिसंबर को लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और मुरली मनोहर जोशी जब कारसेवकों के सामने पहुंचे तो धक्कामुक्की हुई. किसी तरह संघ के स्वयंसेवकों और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने उन्हें बचाया. जब गुंबद गिरने की खबर मिली तो रामकथा कुंज के मंच पर खड़े आडवाणी, सिंघल और जोशी फिक्रमंद दिखे. उधर उमा भारती बेहद खुश थीं. उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. वो खुशी में डॉ जोशी की पीठ पर चढ़ गईं. बाद में जो कुछ हुआ वो इतिहास है.

डॉ जोशी मोदी युग के बाद भी अपना राजनीतिक करियर बचा पाने में कामयाब रहे थे उन्हें मोदी के लिए साल 2014 में वाराणसी सीट छोड़नी पड़ी थी लेकिन बदले में उन्हें कानपुर सीट मिली और वो जीते. इस बार उन्हें कानपुर से खड़े होने का मौका भी नहीं मिल सका. माना जा रहा है कि इस चुनाव के साथ ही उनकी पारी पर भी विराम लग जाएगा.