Rajendra Prasad Birth Anniversary, राजेंद्र प्रसाद : वो राष्ट्रपति जिसने पहले देश को दिया संविधान, बाद में निभाया भाई का धर्म
Rajendra Prasad Birth Anniversary, राजेंद्र प्रसाद : वो राष्ट्रपति जिसने पहले देश को दिया संविधान, बाद में निभाया भाई का धर्म

राजेंद्र प्रसाद : वो राष्ट्रपति जिसने पहले देश को दिया संविधान, बाद में निभाया भाई का धर्म

28 फरवरी को देश अपने प्रथम राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती मनाता है. उन्‍हें इतिहास एक ऐसे कर्मठ नेता के रूप में याद करता है जो अपने कर्तव्‍य को सबसे ऊपर रखते थे.
Rajendra Prasad Birth Anniversary, राजेंद्र प्रसाद : वो राष्ट्रपति जिसने पहले देश को दिया संविधान, बाद में निभाया भाई का धर्म

ये कहानी है एक ऐसे लड़के की जिसकी उत्तरपुस्तिका जांचते हुए परीक्षक जवाबों से ऐसा प्रभावित हुआ कि लिख दिया- ‘परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर जानता है.’

पढ़ाई-लिखाई में वो ऐसा अव्वल था कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के एंट्रेंस एग्‍जाम में ही टॉप कर तीस रुपए प्रति महीना का वजीफा पा लिया.

अपने काम का ऐसा धुनी की सगी बहन की मौत पर अंतिम संस्कार बाद में किया, पहले अपना अधूरा काम निपटाया.

उसे हमारा देश राजेंद्र प्रसाद के नाम से जानता है और दुनिया भारत गणराज्य के पहले राष्ट्रपति के तौर पर.

देशसेवा के लोभी लेकिन घर का मोह पड़ा भारी

राजेंद्र बाबू अच्छे खासे वकील थे लेकिन फिर एक दिन उनकी मुलाकात महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरू गोपालकृष्ण गोखले से हो गई. गोखले उन दिनों अपनी संस्था के लिए कुछ प्रतिभाशाली लड़कों की तलाश कर रहे थे. राजेंद्र बाबू उनसे मिलने पहुंचे और प्रभावित हुए लेकिन गोखले व्यवहारिक नेता थे. राजेंद्र बाबू की पारिवारिक स्थिति से वाकिफ थे इसलिए उनसे सोच समझकर देशसेवा का फैसला लेने के लिए कहा.

इसके बाद करीब दो हफ्तों तक राजेंद्र बाबू ऊहापोह की स्थिति में रहे. बड़े भाई के साथ रहते थे इसलिए उनकी मन:स्थिति वो भी देख रहे थे. कोर्ट जाना अचानक बंद कर चुके राजेंद्र बाबू समझ ही नहीं पा रहे थे कि राष्ट्रसेवा के अपने व्रत का फैसला भाई से कैसे कहें. फिर एक दिन हिम्मत जुटा कर भाई के नाम पर चिट्ठी लिख डाली और दबे पांव बिस्तर पर तब रख आए जब बड़े भाई टहलने बाहर गए थे. भाई की नज़रों से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा सके अलबत्ता खुद ही टहलने निकल गए.

भाई लौटे और खत पढ़ा. राजेंद्र बाबू को तलाशने लगे. बाहर दोनों भाई एक-दूसरे के सामने आए तो भावुकता उफान पर थी. एक-दूसरे से लिपट कर खूब रोये. तय हुआ कि घर लौटकर परिजनों को फैसले की जानकारी दे देनी चाहिए. ये अलग बात है कि घर का प्यार उन पर भारी पड़ा और वो गोखले की सर्वेंट्स ऑफ इंडियो सोसायटी को कभी ज्वाइन नहीं कर सके.

Rajendra Prasad Birth Anniversary, राजेंद्र प्रसाद : वो राष्ट्रपति जिसने पहले देश को दिया संविधान, बाद में निभाया भाई का धर्म

बापू के सच्चे सिपाही राजेंद्र बाबू

कांग्रेस के कई अधिवेशनों में शामिल होनेवाले राजेंद्र बाबू की मुलाकात सन 1916 में महात्मा गांधी से लखनऊ अधिवेशन में हुई. चंपारण सत्याग्रह के दौरान वो गांधी से बहुत प्रभावित हुए और गांधी उनसे. साल 1920 के असहयोग आंदोलन में वो भी कूदे. आखिरकार अपने करियर को तिलांजलि देकर उन्होंने कांग्रेस का भाग होना मंज़ूर कर ही लिया. स्वदेशी को अपनाने वाले वो सच्चे हिंदुस्तानी थे. उन्होंने अपने बेटे मृत्युंजय प्रसाद को कॉलेज से निकाल लिया और दाखिला बिहार विद्यापीठ में कराया जिसे भारतीय शैली से चलाया जा रहा था.

सच्चे जननेता के तौर पर राजेंद्र बाबू की पहचान

डॉ राजेंद्र प्रसाद खूब पढ़ाकू थे. लंबे अकादमिक जीवन के बावजूद वो तरह-तरह की किताबें भी पढ़ते थे. प्रसिद्ध घुमक्कड़ और साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन उनसे इतने प्रभावित थे कि उन्हें अपना गुरू मानने लगे. पढ़ाई-लिखाई के इतर उनका लोगों के साथ संपर्क ज़बरदस्त था. वो सही मायनों में जननेता थे और लोग उनकी अपीलों पर खूब ध्यान देते थे.  साल 1914 में बिहार में आई बाढ़ के दौरान उनके काम की सभी ने प्रशंसा की और इसी तरह अगले साल आए बाढ़ में उन्होंने राहत कार्य में खुद को पूरी तरह झोंक दिया.

राजेंद्र बाबू ने एक बिहार सेंट्रल रिलीफ कमेटी बनाई और लोगों से राहत के लिए धन जुटाना शुरू किया. इसी तरह 1935 में उन्होंने क्वेटा भूकंप के दौरान भी समिति बनाकर धन एकत्र किया और लोगों की मदद की. बताते हैं कि राजेंद्र बाबू की समिति वायसराय से भी तीन गुना ज़्यादा पैसा इकट्ठा करने में कामयाब रही.

राजेंद्र बाबू नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद 1939 में पार्टी के अध्यक्ष भी बने. 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें एक बार फिर जेल जाना पड़ा. तीन सालों तक उन्होंने जेल काटी.

आखिरकार देश आज़ाद हुआ और डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत की अंतरिम सरकार में खाद्य और कृषि मंत्री बने. 11 दिसंबर 1946 को वो भारत की संविधान सभा के अध्यक्ष चुने गए. 17 नवंबर 1947 के दिन उन्हें तीसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया और आखिरकार 26 जनवरी 1950 को उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के पद की शपथ ली. वो भारत के अकेले राष्ट्रपति हैं जो दो बार इस पद पर रहे.

उनका निधन 28 फरवरी 1963 को पटना में हुआ था. उनकी कर्मठता, जुझारू स्वभाव, अध्ययनशीलता और सेवाभाव ने उन्हें हमेशा मान दिलाया.

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