9 दशक पहले आज ही के दिन बापू ने लिख दिया था अंग्रेज़ों का हिंदुस्तान से पैकअप

आज ही के दिन 89 साल पहले गांधी नाम के राजनीतिक संत ने भारत में ब्रिटिश हुकूमत के अंत की भूमिका लिख दी थी. जानिए ऐसा क्या किया था महात्मा गांधी ने कि कुछ ही साल बाद अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान से बोरिया बिस्तर बांधना पड़ा.

आज से 89 साल पहले भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन जब दिल्ली में शानो-शौकत से भरे नये-नवेले वायसरॉय हाउस में आराम फरमा रहे थे, तब करीब बारह सौ किलोमीटर दूर एक ‘अधनंगे फकीर’ ने अपनी उंगली की चुटकी से महान अंग्रेज़ी साम्राज्य के ब्रिटेन लौटने की भूमिका लिख दी थी.

6 अप्रैल 1930 की सुबह अरब सागर के किनारे बसे डांडी गांव में खड़े होकर गांधीजी ने अपनी चुटकी में रेत मिला नमक ज्यों ही उठाया वैसे ही ब्रिटिशर्स का नमक से जुड़ा काला कानून टूट गया. उगते सूरज की किरणों से नहाए उस संत ने वहीं खड़े होकर घोषणा की थी – ‘ऐसा करके मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूं.’

1920 के असहयोग आंदोलन और 1930 में कांग्रेस की रावी तट से उठी ‘पूर्ण स्वराज्य’ की हुंकार के बाद डांडी मार्च अंग्रेज़ों का बुखार बढ़ाने के लिए काफी था. 12 मार्च 1930 को जब महात्मा गांधी अपने साबरमती आश्रम से यात्रा शुरू कर रहे थे तब ब्रिटिश साम्राज्य को अंदाज़ा कहां था कि डांडी जा रहे कारवां से उठी धूल भारत में उनकी तस्वीर धुंधला कर देगी. महात्मा का हौसला देख भारत एकाएक उठ खड़ा हुआ.

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असहयोग आंदोलन के दुख भरे अंत के बाद गांधी फिर उठ खड़े हुए और इस बार वो खून बहने से विचलित नहीं हुए. उनकी आंखों में पूरी तरह आज़ाद भारत का सपना था.

हमेशा मिठास में भीगे शब्द बोलनेवाले गांधी अंग्रेज़ी हुक्मरानों की आंखों में आंखें डालकर पूछ रहे थे कि गरीब हिंदुस्तानी नमक के लिए अंग्रेज़ों को क्यों टैक्स चुकाए. उन्हें ज़मीन पर लगनेवाले भारी-भरकम टैक्स पर भी आपत्ति थी. सेना पर होनेवाले बेतहाशा खर्च को कम करने की मांग भी गांधी कर रहे थे. ऐसी ही ग्यारह मांगों को उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने रखा. 2 मार्च 1930 को उन्होंने महामहिम गवर्नर जनरल को फिर अपनी मांगें याद दिलाईं,  लेकिन घमंड में चूर गवर्नर जनरल ने भारतीयों की इन मांगों की तरफ देखना तक गवारा नहीं किया. गांधी इंतज़ार करते रहे और आखिरकार जब उन्हें भरोसा हो गया कि गवर्नर जनरल को गरीब हिंदुस्तानी रियाया की कोई परवाह नहीं तो उन्होंने सबसे पहले सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया. नमक कानून उसी सिलसिले की पहली कड़ी था.

dandi, 9 दशक पहले आज ही के दिन बापू ने लिख दिया था अंग्रेज़ों का हिंदुस्तान से पैकअप
डांडी यात्रा के गवाह बननेवाले भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल इरविन को अंदाज़ा नहीं था कि जिस आंदोलन से बेफिक्र हो वो सो रहे हैं, वही ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का कारक बनेगा

डांडी ने लाखों हिंदुस्तानियों में भरोसा पैदा कर दिया कि बिना बंदूक उठाए भी काले कानूनों का विरोध किया जा सकता है. अहिंसा की वही हिंसक रास्तों पर चलने की तुलना में ज़्यादा दूर तक जाती है.

फिर क्या था. गांधी तो आगे बढ़ चले लेकिन साथ ही देशभर के लोग पहली बार अंग्रेज़ों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. उधर गांधी रास्ते में पड़ रहे हर गांव में सभाओं को संबोधित कर रहे थे, वहीं कांग्रेस ने डांडी से कुछ दूर धरसाना की नमक फैक्ट्री पर सत्याग्रह का इरादा पक्का किया. 4-5 मई की आधी रात को धरसाना पहुंचने से एक दिन पहले ही पुलिस ने गांधी नाम के तूफान को जेल के सींखचों में बंद करना चाहा. गिरफ्तारी नेहरू और पटेल की भी हुई. गिरफ्तारियां भले कहां किसी को रोक सकती थीं. अब्बास तैयब जी नाम के रिटायर्ड जज की अगुवाई में भीड़ ने आगे बढ़ना शुरू किया. धरसाना पहुंचने से पहले उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. इस बार गिरफ्तारी कस्तूरबा की भी हुई.

अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों के अहिंसक हौसले से रूबरू हो रहे थे. सरोजिनी नायडू और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आगे बढ़े. देशभर से कांग्रेसी धरसाना की ओर कूच करने लगे. सैकड़ों की संख्या में गिरफ्तारियां होने लगीं. कांग्रेस का पूरा ज़ोर इसी बात पर था कि चाहे अंग्रेज़ पीटें, गोली मारें या गिरफ्तार करें लेकिन किसी भी सत्याग्रही को ज़रा सी भी हिंसा नहीं करनी. दुनिया इस अभूतपूर्व प्रयोग की ओर अचरज में देख रही थी. बम और बंदूक से क्रांति करनेवाला पश्चिम कहां विश्वास कर सकता था कि पूर्व का एक राजनीतिक संत अहिंसा के जादू से अपने विरोधियों को परास्त कर लेगा.

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डांडी यात्रा के बाद अंग्रेज़ों का दमन बढ़ गया लेकिन कांग्रेस की लीडरशिप इसके लिए तैयार थी. स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू और लौहपुरुष पटेल ने जनता का हौसला कम नहीं होने दिया.

और फिर वो मंज़र भी एक अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने देखा जब सत्याग्रहियों को पुलिस ने लाठियों से खुद के थक जाने की हद तक पीटा. उसने अपनी रिपोर्ट में दुनिया को बताया कि कैसे भारत की ज़मीन पर मनुष्यता को झकझोर देनेवाला नया राजनीतिक प्रयोग सफल हो रहा है. किसी भी सत्याग्रही ने पीटनेवाले को पलटकर नहीं मारा. मिलर की दर्दनाक रिपोर्ट ने तथाकथित सभ्य पश्चिमी देशों को झकझोर कर रख दिया. अंग्रेज़ बदनाम हो रहे थे. अंग्रेज़ी राज का कच्चा चिट्ठा खुल रहा था. एक ऐसी भीड़ को पीटा जा रहा था जो निहत्थी थी. भीड़ की अगली पंक्ति चोट खाकर गिरती और पिछली अपने आप आगे आ जाती. पास ही में एक झोंपड़ी पहले से बनी थी जहां घायलों को उठाकर ले जाया जा रहा था. मिलर लिखता है कि 18 लोगों को तो उठाकर ले जाया गया लेकिन 42 को मैंने ज़मीन पर लहूलुहान हालात में कराहते देखा. वो अपने उठाए जाने का इंतज़ार कर रहे थे. इंतज़ाम की भारी कमी थी. जब मिलर के लिए देख पाना असहनीय हो गया तो वो घटनास्थल से हट गया. मिलर की रिपोर्ट को भारत में बैठे ब्रिटिश टेलिग्राफ ऑपरेटर्स ने सेंसर करना चाहा लेकिन उनकी करतूत भी एक्सपोज़ करने की धमकी मिलते ही वो मजबूरन शांत बैठ गए. कहते हैं कि उस स्टोरी को दुनिया भर के करीब डेढ़ हजार अखबारों में जगह मिली.

भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने अपनी पुलिस के खूनी कारनामे पर खत लिखकर सफाई दी. उन्होंने लिखा कि कुछ लोगों को मामूली चोटें आई हैं.

पत्रकार मिलर ने बाद में अस्पताल जाकर घायलों का हाल देखा और बताया कि 320 घायलों को तो उसने अकेले ही गिना. कई के सिर फूटे थे, कई पेट में लातें लगने की वजह से कराह रहे थे. ना जाने कितने ही बेहोश पड़े थे. दो की तो मौत भी हो गई.

एक साल तक पूरा देश नमक कानून तोड़ता रहा. ना अंग्रेज़ी पुलिस के लाठी डंडों से कोई डरा. ना कोई गिरफ्तारी के खौफ में आया. गांधी के मंत्र पर पूरा देश मुग्ध होकर चल रहा था. हताश परेशान ब्रिटिश सरकार ने आखिरकार गांधी को रिहा किया और लंदन में आयोजित दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेंस में चलने के लिए मनाया. देशभर की जेलों में 60 हजार सत्याग्रही नमक कानून तोड़ने के चलते कैद हुए थे. अनोखा तथ्य है कि जिस दिन ये कानून गांधी जी ने तोड़ा उस दिन किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हुई थी. ये भी जानकारी में जोड़ लीजिए कि महज़ हाथ में रेत उठा लेने से नमक नहीं बना था लेकिन वो एक प्रतीक था. इस पूरी यात्रा में शामिल लोगों में से अधिकतर 20 से 30 साल की उम्र के बीच में थे.

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भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में डांडी यात्रा की खबर फैल गई. बाद में इस यात्रा की ऐतिहासिक अहमियत मानी गई. आज डांडी यात्रा को दुनिया की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक यात्राओं में एक माना जाता है.

गांधी इस यात्रा को बेहद अनुशासन से चलाने के इच्छुक थे इसलिए कांग्रेसियों के बजाय उन्होंने यात्रा के लिए साबरमती आश्रम में रहनेवाले अपने 78 अनुयायियों को चुना. पूरी यात्रा शानदार योजना बनाकर पूरी हुई. गांधी जी के जत्थे से आगे-आगे कुछ लोग दौड़ लगाकर गांवों में पहुंचते थे. वो तय करते थे कि शाम को सत्याग्रही कहां ठहरेंगे या फिर बापू गांव में लोगों को कहां संबोधित करेंगे. यात्रा में शामिल लोगों ने सफेद खादी पहनी थी इसलिए लोगों ने इसे ‘सफेद नदी’ भी कहा. कई बार गांव से भी लोग उस जत्थे में जुड़ जाते और पूरा रेला 2 मील तक फैल जाता. ‘रघुपति राघव राजा राम’ का भजन गाता इंसानों का समुद्र पूरी ताकत से डांडी की ओर बढ़ता जा रहा था जिसकी लहरों में अंग्रेज़ी कानून एक एक कर बह रहे थे. यात्रा के दौरान लाखों लोगों ने गांधी जी का भाषण सुना. ना जाने कितने पत्रकारों को उन्होंने इंटरव्यू दिए. विदेशी पत्रकारों के अलावा बंबई की तीन सिनेमा कंपनियों ने उनकी यात्रा को कवर किया जिसकी वजह से गांधी नाम यूरोप से लेकर अमेरिका तक फैल गया. उसी साल टाइम्स पत्रिका ने महात्मा गांधी को मैन ऑफ द ईयर घोषित किया. लोगों ने उस यात्रा के प्रभाव में अपने सरकारी पदों से इस्तीफे दे दिए. रास्ते भर में ढोल-नगाड़ों से उनका स्वागत हुए. डांडी पहुंचे सत्याग्रहियों का स्वागत पचास हज़ार लोगों ने किया.

कितनी हैरानी की बात है कि गांधी की डांडी यात्रा को लेकर शुरू में गवर्नर जनरल इरविन कतई परेशान नहीं हुए थे. उन्होंने लंदन के लिए लिखे खत में कहा भी था कि नमक आंदोलन उतना प्रभावशाली नहीं कि उनकी नींद उड़ जाए. खुद कांग्रेस के आला नेता नमक को लेकर किसी आंदोलन को छेड़ने में संकोच कर रहे थे. वो तो बड़े मुद्दे उठाना चाहते थे मगर गांधी जानते थे कि भले किसी के लिए बड़ा ना हो पर नमक पर लगा टैक्स गरीबों के लिए सबसे भारी है. वो चाहते थे कि आंदोलन का असर देश के सबसे पिछड़े तबके तक पहुंचे और इसके लिए सबसे मुफीद उन्हें नमक पर लगे टैक्स का मुद्दा लगा. अंग्रेजी राज के कुल टैक्स का 8% से ज्यादा हिस्सा इसी नमक टैक्स से इकट्ठा हो रहा था. डांडी से उठी लहर ने आखिर में अंग्रेजों के साथ-साथ कांग्रेसी नेताओं को भी गांधी की दूरदृष्टि का लोहा मानने को मजबूर कर दिया था.

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अमेरिका में अश्वेत अधिकारों के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग ने डांडी से प्रेरित होकर अलबामा में मार्च निकाला था

दुनिया ने उस 386 किलोमीटर की डांडी यात्रा के अगुवा को मनुष्यता के महात्मा के रूप में पहचाना. 62 साल के बापू ने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से नवसारी के डांडी गांव की वो यात्रा अपने लंबे डगों से 24 दिनों में नाप दी थी. 4 ज़िलों के 48 गावों को गांधी जी के जत्थे ने पार किया था. इसी यात्रा ने अमेरिका में अश्वेत अधिकार के लिए लड़ रहे डॉ मार्टिन लूथर किंग को प्रेरणा दी थी. किंग 10 फरवरी 1959 को भारत आए थे. उन्होंने महीना भर भारत मे बिताकर गांधी को करीब से समझा. साल 1965 में किंग ने डांडी की तर्ज़ पर ही सेलमा से मोंटगोमरी तक यात्रा निकाली. उस यात्रा ने आनेवाले वक्त में अमेरिका के इतिहास को जो मोड़ दिया वो अब तारीख में दर्ज़ है.