अखिलेश ने किया सेना में अहीर रेजीमेंट का वादा, जानिए कब हुई सेना में जाति की घुसपैठ?

अखिलेश यादव ने सेना में अहीर रेजीमेंट बनाने की बात छेड़कर सेना में जातिगत भर्ती के मामले को हवा दे दी है. इस मुद्दे पर पहले भी कई बार टकराव होता रहा है, आज आपको बताते हैं कि सेना में जाति का फैक्टर आखिर कब से शुरू हुआ.

लोकसभा चुनाव 2019 का महाभारत शुरू हुआ तो हर किसी ने अपने तरकश से हर तरह के तीर निकाल लिए. समाजवादी पार्टी भी भला किसी से कहां पीछे रहनेवाली थी. अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी का घोषणापत्र जारी किया और कई वादों में एक वादा ये भी कर दिया कि अगर उनकी सरकार आई तो सेना में अहीर रेजीमेंट और गुजरात इन्फेंट्री रेजीमेंट बनवाएंगे. उनका यही वादा खूब चर्चा बटोर रहा है. आइए तो उनके बहाने इस मांग की गंभीरता और ज़रूर पर थोड़ी बात हो जाए.

अहीर रेजीमेंट की मांग पुरानी
दरअसल अहीर रेजीमेंट की मांग पुरानी है. पहली बार इसे चर्चा तब मिली जब 2016 में ऑल इंडिया यादव महासभा के मंच पर ये दोहराई गई. इसके बाद यादव जाति के लोगों ने अपनी बात मध्यप्रदेश के बीजेपी सांसद लक्ष्मीनारायण यादव तक पहुंचाई जिन्होंने वादा किया कि वो केंद्र सरकार तक इस मांग को पहुंचाएंगे. केंद्र सरकार से इस मामले में कभी कोई आश्वासन नहीं मिला. नतीजतन यादव जाति के लोग समय-समय पर प्रदर्शन कर अपनी मांग उठाते रहे. अब अखिलेश यादव ने अहीर वोटों की गोलबंदी की खातिर इस मांग को अपने घोषणापत्र तक पहुंचा दिया है और उम्मीद कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में उन्हें मनोवांछित कामयाबी हासिल होगी.

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सेना की रेजीमेंट्स में जाति का फैक्टर
राजपूत रेजीमेंट, राजपूताना राइफल्स, मराठा लाइट इन्फ्रेंटी, मद्रास रेजीमेंट, महार रेजीमेंट, जाट रेजीमेंट, गोरखा रेजीटमेंट वो कुछ रेजीमेंट्स हैं जो पहली नज़र में ही सेना के जातिगत विभक्तिकरण की तरफ ध्यान खींचती हैं. कई और भी रेजीमेंट और कंपनियां रहीं जो जाति, संप्रदाय या क्षेत्र के नाम पर थीं लेकिन बाद मे खत्म हो गईं. इसे ही देखते हुए कई मौकों पर याचिकाकर्ताओं ने अदालतों की शरण ली है. उन्होंने पूछा कि जब संविधान समानता का अधिकार देता है तो फिर ये सेना भर्ती मे क्यों नहीं दिखता. मसलन हरियाणा के गौरव यादव ने राष्ट्रपति की अंगरक्षक भर्ती पर सवाल उठाया था. 4 सितंबर 2017 को उन्होंने पूछा था कि सिर्फ तीन जाति जाट, राजपूत और जाट सिखों को ही इसमें भर्ती क्यों किया जाता है. इसी तरह 2012 में हरियाणा के एक चिकित्सक आईएस यादव ने भी जनहित याचिका दायर करके सुप्रीम कोर्ट में सेना की जाति आधारित भर्ती व्यवस्था को चुनौती दी थी.  सेना ने इस पर साल 2013 में जवाब दिया था कि आर्मी जातिगत आधार पर भर्तियां नहीं करती. जाट रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट जैसे नाम सिर्फ प्रशासनिक सुविधा के लिए प्रचलन में हैं. ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया है ताकि एक क्षेत्र से आनेवाले सैनिकों का एक ही तरीके से प्रशासनिक इंतज़ाम हो सके. सेना ने ये भी कहा कि पहले से चले आ रहे प्रचलन का वो अनुसरण कर रही है. सेना ने अपने पक्ष में ये भी कहा कि 1947 के बाद से चार बार कमेटियों ने उसकी भर्ती पॉलिसी की समीक्षा की हैं और सब कुछ ठीक पाया गया.

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‘मार्शल जाति’ की मानसिकता सेना पर हावी?
सेना में जाति, संप्रदाय के नाम पर रेजीमेंट के होने का इतिहास दरअसल ब्रिटिश ज़माने तक जाता है. भारत में शासन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने समाज की जातिवादी मानसिकता को समझ लिया था और उसे बदलने के बजाय बनाए रखते हुए काम लेने का फैसला किया. उन्होंने मार्शल और नॉन मार्शल जातियां छांट लीं. कुछ जातियां लड़ाकू मानी जाती थीं उन्हें प्राथमिकता दी गई और कुछ नहीं भी मानी जाती थीं. स्टीवन विल्किन्सन की एक किताब ‘Army and Nation’ में बताया गया है कि भारत की आज़ादी के वक्त भारतीय सेना के वरिष्ठ अफसरों में से आधे पंजाब से आते थे. इसी किताब में उस ख़त का भी ज़िक्र है जो 12 सितंबर 1946 को भारत की अंतरिम सरकार के उप प्रमुख और विदेशमंत्री नेहरू ने कमांडर इन चीफ और रक्षा सचिव को सेना में सुधार के लिए भेजा था.
नेहरू ‘भारतीय सेना की पृष्ठभूमि के पूरे बदलाव’ के हिमायती थे जिसका अर्थ था पंजाब जैसे चुनिंदा प्रांत से ‘मार्शल क्लास’ के लोगों को सेना में भर्ती कर लेने की व्यवस्था से मुक्ति. सेना में भर्ती की व्यवस्था का असंतोष कितना पुराना है वो इससे ही समझिए कि तीस के दशक में भी भारतीय नेताओं ने खुलकर इस पर बहसें की हैं.

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सेना में भर्ती सिस्टम का इतिहास
साल 1857 के विद्रोह के बाद भारतीय सेना का जातिगत आधार पर पहली बार विभाजन किया गया था. ये बात छिपी नहीं है कि ब्रिटिशर्स ने जानबूझकर मार्शल और नॉन मार्शल कौम के आधार पर सेना को बांटा, जिसका मतलब था कि वो मानते थे कथित नॉन मार्शल जाति नेता पैदा नहीं करती. अंग्रेज़ों ने पूर्व और दक्षिण भारत की तरफ से पैदा हुए विद्रोह को ध्यान में रखा और अपने तरीके से इस क्षेत्र के लोगों को सेना में प्राथमिकता देनी बंद कर दी. उत्तर भारतीयों का दखल ज़रूर बढ़ा दिया गया. विल्किन्सन अपनी किताब में कहते हैं कि 1970 तक भी सेना कुछ-कुछ इसी तरीके से काम करती रही. ‘मार्शल क्लास’ कहे जानेवालों की तादाद सेना में बढ़ाई गई. 1947 के बाद से उस पंजाब रेजीमेंट को 5 बटालियन से 29 बटालियन तक बढ़ा दिया गया जिसमें खास तौर पर सिख और डोगरों को रखा जाता है. जाटों और राजपूतों के प्रभुत्व वाली राजपूताना राइफल्स को भी 6 से 21 बटालियन तक बढ़ाया गया. 1857 के विद्रोह को देख अंग्रेज़ों ने भर्ती का केंद्र भी बदलकर उत्तर भारत पहुंचा दिया. इसके बाद सिखों और पंजाबी मुस्लिमों की भर्ती ज़ोरशोर से हुईं. हालांकि आज़ादी के बाद किसी भी रेजीमेंट में किसी भी जाति के लोगों को भर्ती किया जाने लगा लेकिन हिंदू जाट, सिख जाट और राजपूतों का वर्चस्व सेना में कायम रहा.

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अक़ील शाह अपनी किताब ‘The Army and Democracy’ में समझाते हैं कि बंगालियों को नॉन मार्शल लिस्ट में रखने के पीछे अंग्रेज़ों की बड़ी साज़िश थी. वो जानते थे कि 1857 का विद्रोह जिन सिपाहियों ने शुरू किया वो ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल सेना से ताल्लुक रखते थे. अंग्रेज़ ये भी समझते थे कि उनके खिलाफ जो नेता अहिंसक आंदोलनों में सक्रिय हैं उनका बड़ा तबका बंगाल से आता है. सेना में इसी बंगाल फैक्टर को कमज़ोर करने के लिए उन्होंने सेना में बंगालियों के दखल को कम किया. इससे पता चलता है कि अंग्रेज़ों ने सेना को जातियों में बांटा ताकि वो अपने शासन को सुरक्षित रख सकें.

सैन्य इतिहास बताता है कि 1903 में  जाति के आधार पर एक ब्राह्मण इंफेन्ट्री भी गठित की गई थी. पहले विश्वयुद्ध के अंत तक उसे कायम रखा गया. यहां तक कि दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ने के दौरान 1941 में 1 चमार रेजीमेंट बनाई गई जिसे दिसंबर 1946 में खत्म कर दिया गया. इस रेजीमेंट में बर्मा में काफी काम किया. 1941 में दक्षिण भारत के लिंगायत समुदाय को 1 लिंगायत बटालियन में भर्ती किया गया जो इंफेंट्री और एंटी टैंक रेजीमेंट के तौर पर काम करती रही. चालीस का दशक खत्म होते-होते ये भी खत्म कर दी गई.

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प्रेसीडेंट गार्ड्स को लेकर भी सवाल
सवाल प्रेसीडेंट बॉडीगार्ड्स पर भी उठे हैं. जनहित याचिकाओं में पूछा गया कि इनमें भर्ती होनेवाले सिर्फ तीन जातियों से ही क्यों हैं. दरअसल इसका इतिहास साल 1773 तक जाता है. इसका स्वरूप तत्कालीन भारतीय गवर्नर वॉरेन हेस्टिंग्स ने तय किया था. तब हेस्टिंग्स ने 50 सिपाहियों को चुना था जो पहले से सेना में थे. उन्हें ‘मुगल हॉर्स’ कहा गया. मुगल हॉर्स गठन करनेवाले सरदार मिर्ज़ा शाहबाज़ खान और सरदार खान तार बेग थे. उसी साल बनारस से राजा चैत सिंह ने 50 और सैनिकों को भेजा और इस तरह राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की टुकड़ी की संख्या सौ हो गई. 1773-1780 तक इनका नाम ‘ट्रूप्स ऑफ मुगल’ रहा. 1784 से 1859 तक इन्हें ‘गवर्नर जनरल बॉडीगार्ड’ कहा गया. फिर इसे  ‘44th डिविज़नल रिकॉनेसां स्क्वाड्रन’ कहा जाने लगा, 1946 में फिर से इनका नाम ‘गवर्नर जनरल बॉडीगार्ड’ हो गया. 1947 में इस टुकड़ी के दो हिस्से हो गए और एक पाकिस्तान चली गई. 1950 में भारत वाली टुकड़ी का नाम पड़ा ‘प्रेसीडेंट्स बॉडीगार्ड्स’. ये दुनिया की आखिरी बची घुड़सवारों की फौज है. इसका प्रमुख काम राष्ट्रपति की सुरक्षा है. फिलहाल इसमें 222 लोग बताए जाते हैं.

शुरूआत में इस टुकड़ी में मुसलमान भी थे लेकिन बाद में हिंदू भी शामिल हुए. तब राजपूत और ब्राह्मणों को इसका हिस्सा बनाया गया. कई दक्षिण भारतीय भी इसमें रहे. 1883 में पहली बार सिख समुदाय के लोग इसके हिस्से बनाए गए. 1887 में पंजाबी मुसलमान शामिल हुए. 1895 में ब्राह्मण और राजपूतों की भर्ती इसके लिए रोक दी गई जिसके बाद 50-50 फीसद के अनुपात में सिख और मुस्लिम इसमें बने रहे, बाद के दिनों में फिर स्वरूप बदला और आखिरकार जाट, राजपूत और सिख जाट इसका स्थायी हिस्सा बन गए. दरअसल तर्क दिया गया कि हिंदुस्तान में कुछ खास जाति के लोगों की शारीरिक संरचना ही राष्ट्रपति के सुरक्षा गार्ड बनने के काबिल रही. आज़ादी से पहले इसके लिए 6 फीट 3 इंच की ऊंचाई मांगी गई जो बाद में 6 फीट रह गई.