मोदी राज में बेटिकट हुए आडवाणी ऐसे बने थे पहली बार पार्टी अध्यक्ष ? बेहद दिलचस्प है ये किस्सा

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से लालकृष्ण आडवाणी को टिकट नहीं दिया गया है. कभी इन्हीं आडवाणी की छत्रछाया में बीजेपी ने विस्तार किया था. आपको बता रहे हैं वो दिलचस्प किस्सा कि आडवाणी पहली बार बीजेपी के अध्यक्ष कैसे बने थे.
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बीजेपी पर मोदी और शाह के दबदबे के बाद बुजुर्गों लिए बने मार्गदर्शक मंडल में भेज दिए गए और अब टिकट से बेटिकट कर दिए गए लालकृष्ण आडवाणी के पहली बार पार्टी अध्यक्ष बनने का दिलचस्प किस्सा है . बात 1972 की है . भारत-पाक युद्ध के बाद हुए चुनावों  में वाजपेयी के नेतृत्व वाले जनसंघ को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. पार्टी अध्यक्ष के तौर चार साल का कार्यकाल पूरा कर चुके अटल बिहारी वाजपेयी हार की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर चुके थे .

पार्टी बहुत संघर्ष और संकट के दौर से गुजर रही थी,ऐसे में वाजपेयी चाहते थे कि कोई नया आदमी उनकी जगह पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाले. आडवाणी उन दिनों राज्यसभा

सदस्य थे और वाजपेयी के काफी करीबी भी. दोनों अक्सर जनसंघ के विस्तार के बारे में विमर्श किया करते थे.एक दिन वाजपेयी  ने आडवाणी से कहा – ‘अब आप पार्टी के अध्यक्ष बन जाइए’

बकौल आडवाणी 1957 में पहली बार सांसद बने वाजपेयी अपनी भाषण शैली की वजह से तब तक काफी लोकप्रिय हो चुके थे . संसद के भीतर और बाहर लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे  जबकि आडवाणी वक्ता के तौर पर वाजपेयी के मुकाबले कहीं नहीं टिकते थे. जनता के बीच बोलने में संकोची भी थे.ऐसे में जनसंघ के लिए उन जैसा हो कोई अध्यक्ष चाहिए था .

आडवाणी मानसिक रुप से इतने बड़े ओहदे के लिए तैयार नहीं थे . उन्होंने वाजपेयी से कहा- ‘ मैं किसी सभा में भाषण भी नहीं दे सकता हूं , फिर पार्टी अध्यक्ष कैसे बन सकता हूं ?’

वाजपेयी ने उन्हें संसद में उनके भाषणों का जिक्र करते हुए कहा ‘अब तो आप संसद में बोलने लगे हैं , फिरये संकोच कैसा ?’ आडवाणी के मुताबिक उनके भीतर वाजपेयी की जादुई भाषण कला की वजह से हीन ग्रंथी पनप गई थी . वो कई सालों से वाजपेयी के साथ रहते हुए उन्हें देख सुन रहे थे और यही वजह थी कि वो इस मामले में अपने को वाजपेयी सेबहुत कमतर मानते थे . उन्हें लगता था कि संसद में बोलने और हजारों की भीड़ में बोलने में बहुत फर्क है इसलिए वो इस पद के लिए बिल्कुल फिट नहीं हैं .

आडवाणी ने वाजपेयी को सलाह दी कि पार्टी में कई दूसरे वरिष्ठ नेता हैं . उनमेंसे किसी को अध्यक्ष बनायाजा सकता है . वाजपेयी ने तब भी उन्हें दीनदयाल उपाध्याय का जिक्र करते हुए समझाया कि वो भी बहुत अच्छे वक्ता नहीं थे लेकिन उनके शब्दों में गहन चिंतन था , इसलिए लोग सुनते थे . पार्टी अध्यक्ष होने के लिए बहुत अच्छा वक्ता होना जरुरी नहीं . फिर भी आडवाणी अपनी झिझक से मुक्त नहीं हो पाए .

उन्होंने किसी दूसरे नेता की तलाश करने को कहा . वाजपेयी ने जब पूछा कि दूसरा कौन हो सकता है तो आडवाणी ने ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिधिंया का नाम सुझाया .

1962 कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बनी राजमाता सिंधिया कुछ साल पहले ही जनसंघ में शामिल हुई थीं लेकिन उनकी पहचान जनसंघ की लीडर के तौर पर बन चुकी थी . वाजपेयी राजमाता को अध्यक्ष की जिम्मेदारी देने को तैयार हो गए. फिर तय हुआ कि पहले ग्वालियर चलकर उनसे बात तो की जाए कि वो तैयार भी हैं या नहीं.दोनों ग्वालियर गए .

काफी मनाने के बाद राजमाता आखिरकार मान गईं . वाजपेयी और आडवाणी उन्हें शुक्रिया अदाकर लौटने वाले थे कि राजमाता ने कहा कि अंतिम स्वीकृति के लिए उन्हें एक बार

अपने गुरुजी से अनुमति लेनी होगी . उसी दिन राजमाता दतिया में रहने वाले अपने गुरुजी से मिलने गईं . वाजपेयी और आडवाणी बेचैनी से उनकी वापसी का इंतजार करते रहे.

जब राजमाता वापस लौटीं तो उन्होंने गुरुजी के इनकार की खबर दी और पार्टी अध्यक्ष पद स्वीकार करने से माफी मांग ली. बात फिर वहीं की वहीं रह गई. एक बार फिर वाजपेयी औरआडवाणी नए नाम के बारे में सोचने लगे. तब आडवाणी ने जनसंघ के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद भाई महावीर का नाम सुझाया . वाजपेयी तुरंत सहमत हो गए. जगन्नाथराव जोशीके साथ दोनों भाई महावीर से मिलने दिल्ली के पंत मार्ग स्थित उनके निवास पर गए . बिना किसी अधिक मान मनौवल के भाई महावीर पार्टी अध्यक्ष बनने को सहमत हो गए . वाजपेयी और आडवाणी खुश हुए कि चलो अध्यक्ष की तलाश का मिशन पूरा हुआ.

तभी भाई महावीर ने कहा – ‘आप थोड़ा इंतजार कीजिए . मैं पत्नी से राय -मशविरा करके बताता हूं’

भाई महावीर घर के भीतर गए . कुछ समय बाद बुरी खबर के साथ वापस लौटे कि मेरी पत्नी इसके लिए

तैयार नहीं है . इस तरह से अध्यक्ष तलाशने के दो प्रयास विफल होने के बाद वाजपेयी ने आडवाणी से कहा ‘अब और असफल प्रयास नहीं. आपके पास विकल्प नहीं हैं. आपको हां कहना ही होगा.’ और इस तरह से आडवाणी पहली बार जनसंघ के अध्यक्ष बने . 1968 में जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद वाजपेयी ने पार्टी की कमान संभाली थी.1973 में आडवाणी ने उनकी विरासत पहली बार संभाली ..उसके बाद की

कहानी फिर कभी..

पूरी कहानी आडवाणी की किताब मेरा देशमेरा जीवन से है 

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