डोनाल्‍ड ट्रंप ने ईरान में हमले के लिए 52 जगहें क्‍यों चुनीं? पढें 444 दिन तक चले ‘ब्‍लैकमेल’ की कहानी

आखिर ट्रंप ने 52 जगहें ही क्‍यों चुनीं? इसके पीछे है 1979 में 444 दिन तक अमेरिका से हुई 'ब्‍लैकमेलिंग'.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने ईरान की 52 जगहें चुन ली हैं. उन्‍होंने चेताया कि अगर ईरान ने अपने कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेने की कोशिश की तो अमेरिका इन्‍हीं जगहों पर हमले करेगा. सुलेमानी को मारने का आदेश ट्रंप ने ही दिया था. ट्रंप का ट्वीट इशारा करता है कि ये 52 जगहें ईरानी संस्‍कृति के लिहाज से बेहद अहम हैं.

आखिर ट्रंप ने 52 जगहें ही क्‍यों चुनीं? इसके पीछे है 1979 में 444 दिन तक अमेरिका से हुई ‘ब्‍लैकमेलिंग’. यह ‘ब्‍लैकमेल’ तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में हुआ.

क्‍या हुआ था 1979 में?

उस ब्‍लैकमेलिंग के बीच पड़े 1953 में. लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्‍मद मोसादेग की सरकार को अमेरिका और ब्रिटेन ने गिरवा दिया. मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्‍ता सौंपी गई. पहलवी ईरान के शाह (राजा) थे और उस समय तक अयातुल्‍लाह खुमैनी पेरिस में निर्वासित होकर रहे रहे थे. इस तख्‍तापलट की वजह से 1979 में एक क्रांति हुई. कट्टरपंथियों ने पहलवी को सत्‍ता से उखाड़ फेंका.

बेदखली के बाद, कैंसर के इलाज के लिए पहलवी को अमेरिका में ही भर्ती कराया गया. ईरान की मांग थी कि पहलवी को वापस किया जाए और वो ट्रायल का सामना करें. अमेरिका ने ईरान की बात नहीं मानी. इसके बाद, ईरान की कट्टरपंथी जमात अमेरिका से बेहद नाराज हो गई. उनके गुस्‍से का निशाना बना तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास.

4 नवंबर, 1979 को ईरानी छात्रों ने दूतावास पर हमला किया और 52 डिप्‍लोमेट्स और US नागरिकों को बंधक बना लिया. किसी तरह की बातचीत बेनतीजा रही. दिन गुजरते जा रहे थे. ऐसे में तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति जिमी कार्टर ने मिलिट्री बुलाई. ऑपरेशन ‘ईगल क्‍लॉ’ शुरू किया गया. ईरान के नजदीक मौजूद जंगी जहाजों को इस मिशन पर लगाया गया. 24 अप्रैल, 1980 को एक कोशिश हुई जो फेल हो गई. अमेरिका ने 8 सैनिक खोए और एक ईरानी नागरिक मारा गया.

Iran hostage crisis, डोनाल्‍ड ट्रंप ने ईरान में हमले के लिए 52 जगहें क्‍यों चुनीं? पढें 444 दिन तक चले ‘ब्‍लैकमेल’ की कहानी

समझौते से पड़ी दुश्‍मनी की नींव

दिसंबर 1979 में पहलवी ने अमेरिका छोड़ा, उसे इजिप्‍ट ने शरण दी. 27 जनवरी, 1980 को CIA और कनाडा ने मिलकर छह अमेरिकी डिप्‍लोमेट्स को ईरान से बाहर निकाल लिया. ये दूतावास में बंधक नहीं थे. इसी बीच 27 जुलाई, 1980 को पहलवी की मौत हो गई. सितंबर 1980 आते-आते ईराकी सेना ने ईरान पर हमला कर दिया था. अब बातचीत जरूरी हो चली थी. ऐसे में अल्‍जीरिया को मध्‍यस्‍थ बनाकर दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू हुई.

नागरिकों को छुड़ाने में नाकाम रहे कार्टर अपने देश में घिर चुके थे. 1980 में वह बुरी तरह चुनाव हारे. रोनाल्‍ड रीगन अले राष्‍ट्रपति बने और मिनटों बाद ही उन्‍होंने ‘अल्‍जीरिया डिक्‍लेरेशन’ पर हस्‍ताक्षर कर दिए. इसी के बाद 52 अमेरिकी बंधकों को ईरान ने रिहा किया.

इस समझौते की कुछ शर्तें थीं. इनमें अमेरिका के ईरानी के अंदरूनी मामलों में दखल ना देना, ईरानी संपत्तियों को अनफ्रीज करना, उसपर से पाबंदियां हटाना. दोनों देशों के बीच कानूनी मामलों के लिए अलग ट्रिब्‍यूनल बना. अमेरिकी संस्‍थाओं से ईरान ने जो कर्ज लिया है, वो चुकाया जाएगा. इस पूरे प्रकरण ने अमेरिका और ईरान के रिश्‍तों को हमेशा के लिए बदल दिया.

ये भी पढ़ें

इटावा के इस कलेक्टर ने बनाई थी कांग्रेस पार्टी, पढ़ें क्यों सुलगी थी ब्रिटिश सरकार से विरोध की चिंगारी

बैटल ऑफ लोंगेवाला : जब पाकिस्‍तानी टैंकों के लिए ‘भूलभुलैया’ बन गया थार रेगिस्‍तान