किस डर की वजह से कश्मीर मामले को यूएन लेकर गए थे नेहरू?

गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर हमला बोला है. पढ़िए उन हालात के बारे में जब नेहरू कश्मीर मसले को यूएन लेकर गए.

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर निशाना साधा. उन्होंने कहा ‘जब अपनी सेना जीत रही थी तो युद्धविराम क्यों किया गया? असमय युद्धविराम करने की क्या मजबूरी थी. यूएन में जाने का निर्णय भी नेहरू का व्यक्तिगत था और मेरी समझ से यह हिमालय से भी बड़ी गलती थी. ये दो देशों के बीच का मामला था. चार्टर का सेलेक्शन भी गलत था.’

ये पहली बार नहीं है जब अमित शाह ने नेहरू पर निशाना साधा हो. जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद उन्होंने अपने कई भाषणों में नेहरू का जिक्र किया है. जवाहरलाल नेहरू कश्मीर मामले को यूएन में लेकर क्यों गए, उस समय राजनैतिक माहौल कैसा था और किसका पलड़ा भारी था, ये जानने के लिए इतिहास के पन्ने खंगालने होंगे.

22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर में पाकिस्तान की तरफ से 200-300 ट्रक आए जिनमें वहां के कबायली लोग भरे हुए थे. ये लोग जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करके उसे पाकिस्तान में मिलाने आए थे जिनका नेतृत्व पाकिस्तानी सैनिक कर रहे थे. उसके तुरंत बाद वहां के राजा हरि सिंह ने भारत में कश्मीर का विलय करने के लिए हामी भर दी और भारत की सेनाएं कबायलियों को खदेड़ने के लिए जम्मू-कश्मीर पहुंच गईं.

Jawaharlal Nehru, किस डर की वजह से कश्मीर मामले को यूएन लेकर गए थे नेहरू?
राजा हरि सिंह

ये काम लंबा खिंच गया और दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई. जनवरी 1948 में कश्मीर मामले को यूएन लेकर गए और वहां जनमत संग्रह की बात उठी. हालांकि जनमत संग्रह में सब पहले जैसा ही रहा. पाकिस्तान का हिस्सा उसके पास और भारत का हिस्सा भारत के पास ही रहने का निर्णय आया. लेकिन सवाल ये है कि जिन हालात में नेहरू कश्मीर मसले को लेकर यूएन गए, वो किसके पक्ष में मजबूत थे? भारत के या पाकिस्तान के? इसके लिए हमें यूएन जाने से पहले के घटना क्रम के बारे में जानना होगा.

लेखक पीयूष बबेले अपनी किताब ‘नेहरू: मिथक और सत्य’ में नेहरू के 23 दिसंबर 1947 के एक वक्तव्य का जिक्र करते हैं. नेहरू ने कहा था ‘ये मामला हम संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा समिति के सामने पेश करेंगे. शायद सुरक्षा समिति अपना एक कमीशन भेजे. तब तक हम अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेंगे. बेशक हम इन कार्रवाइयों को जोरों से चलाने की आशा करते हैं. हमारा अगला कदम दूसरी घटनाओं पर निर्भर होगा, इस अवसर पर इस बात को पूरी तरह गुप्त रखना होगा.’

जवाहरलाल नेहरू क्या किसी डर से मामले को यूएन ले जा रहे थे? ये जानने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन के द्वारा नेहरू को लिखे एक पत्र के बारे में जानना होगा. ये पत्र माउंटबेटन ने कश्मीर मसले पर जिन्ना से बात करने के बाद 2 नवंबर 1947 को लिखा था. नेहरू और सरदार पटेल कश्मीर मसले को सुलझाने में लॉर्ड माउंटबेटन की मदद लेते रहते थे.

Jawaharlal Nehru, किस डर की वजह से कश्मीर मामले को यूएन लेकर गए थे नेहरू?
नेहरू, माउंटबेटन और जिन्ना

जिन्ना चाहते थे कि उनकी बातचीत के बारे में माउंटबेटन नेहरू को बताएं. माउंटबेटन लिखते हैं:

‘मैंने मिस्टर जिन्ना से पूछा आप जनमत संग्रह का इतना विरोध क्यों करते हैं? उन्होंने जवाब दिया- कारण यह है कि कश्मीर पर भारतीय उपनिवेश का अधिकार होते हुए और शेहुख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस के सत्तारूढ़ होते हुए वहां से मुसलमानों पर प्रचार और दबाव का ऐसा जोर डाला जाएगा कि औसत मुसलमान कभी पाकिस्तान के लिए वोट करने की हिम्मत नहीं करेगा.’

इतिहासकारों की मानें तो जिन्ना के इस बयान को देखकर लगता है कि कश्मीर मसले को यूएन ले जाना और जनमत संग्रह की बात करना उनकी कूटनीति का हिस्सा था और वो इसके प्रति विश्वास से भरे हुए थे कि कश्मीर के मुसलमान भारत के पक्ष में वोट करेंगे. वहीं जिन्ना इस बात से डरे हुए थे इसलिए लगातार इसका विरोध करते जा रहे थे.