गृहमंत्री ने कांग्रेस को क्यों दिलाई ईदी अमीन और युगांडा की याद, क्या है नागरिकता कानून से संबंध

जो एशियाई युगांडा से निकाले गए उनमें बड़ी संख्या में भारतीय और खासकर गुजराती उद्योगपति थे जो सौ साल से भी ज्यादा समय से वहां रह रहे थे.

नागरिकता संशोधन बिल, 2019 पर लोकसभा में सोमवार को बहस करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने युगांडा की चर्चा की. उन्होंने बिना नाम लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री के बारे में कहा कि कांग्रेस सरकार ने युगांडा से तानाशाह ईदी अमीन के अत्याचारों से तंग होकर आए भारतीयों को शरण और नागरिकता दी गई थी. ऐसा इंग्लैंड से आए लोगों को तो नहीं दी.

अमित शाह ने बांग्लादेश और पाकिस्तान के शरणार्थियों के बारे में भी कहा. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने सरकार ने ऐसा विशिष्ट वर्गीकरण के आधार पर ही तो किया था. शाह के बयान के बाद लोग युगांडा के उस काले दौर के बारे में जानने की कोशिश करने लगे.

युगांडा में क्या हुआ था

अफ्रीकी देश युगांडा में सैन्य तख्तापलट के बाद ईदी अमीन 1971 के दशक में युगांडा के शासक बने थे. अगस्त 1972 को ईदी अमीन ने कहर ढाते हुए एक आदेश जारी कर हजारों भारतीय मूल के लोगों को वहां से निकलने पर मजबूर कर दिया. वहां रह रहे लगभग 40 हजार भारतीयों पर इसका बुरा असर पड़ा था.

युगांडा में रहनेवाले भारतीय मूल के लोगों के पास ब्रिटेन और युगांडा दोनों का पासपोर्ट था. युगांडा 1962 में आजाद हुआ था, लिहाजा वहां इससे पहले से रहने वाले एशियाइयों के पास युगांडा के साथ ब्रिटिश नागरिकता भी थी. जो एशियाई युगांडा से निकाले गए उनमें बड़ी संख्या में भारतीय और खासकर गुजराती उद्योगपति थे जो सौ साल से भी ज्यादा समय से वहां रह रहे थे.

अमीन ने एशियाइयों को वहां से जाने का आदेश दिया तो कहा कि निर्वासित होने वाले एशियाई अपने केवल दो सूटकेस और 55 पाउंड ही ले जा सकते हैं. करीब 50 हजार लोगों के पास ब्रिटिश पासपोर्ट थे जिसके आधार पर 30 हजार ब्रिटेन चले गए. बाकी ने अमेरिका, कनाडा और भारत में शरण ली. इसको लेकर इंग्लैंड में काफी विरोध भी हुआ. वहां की सरकार भी परेशान हुई और इंदिरा सरकार पर दबाव बनाया था.

इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने ईदी अमीन के इस निर्णय को मानवाधिकारों और नागरिकता के अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन बताते हुए भारतीय राजदूत को राजधानी कंपाला से वापस बुला लिया. साथ ही युगांडा के राजदूत को दिल्ली से वापस लौटा दिया. युगांडा से भारतीय मूल के लगभग दो हजार लोग भारत आए. उन्हें इंदिरा गांधी सरकार ने अपना लिया. विशिष्ट वर्गीकरण के आधार पर ही शरण और नागरिकता दी थी.

रेलवे मजदूर बनाकर युगांडा भेजे गए थे भारतीय

ब्रिटिश सरकार ने ज्यादातर भारतीय 1896 से 1901 के बीच युगांडा में रेलवे के निर्माण के लिए मजदूर के रूप में भेजे थे. इसमें से ज्यादातर लोगों ने वहीं बसने का फैसला किया. वो भारत से अपने परिवारों को वहां ले आए. ये लोग ज्यादातर गुजरात और पंजाब के थे. उन्होंने वहां धीरे धीरे अपनी स्थिति बेहतर कर ली थी. कुछ समय बाद उन्होने चीनी, कॉफी और चाय उगाने में अपनी किस्मत आज़माई और उसके बाद फिर मैन्युफैक्चरिंग में. वे देश में नई तकनीक लाए, लोगों को प्रशिक्षण और काम दिया. धीरे धीरे वे समाज का अमीर और असरदार तबका बन गए थे.

अर्थव्यवस्था गिरी तो युगांडा ने गलती कबूली

भारतीय मूल के लोगों के निकलते ही युगांडा की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई. ईदी अमीन 1971 से 1979 तक युगांडा के तानाशाह थे. योवेरी कागुता मुसेवनी ने जब 1986 में युगांडा की सत्ता संभाली तो उन्हें समझ में आया कि वर्षों से जारी गृहयुद्ध के बाद अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने में भारतीय उनकी मदद कर सकते हैं. इसके बाद मुसेवनी ने तमाम लोगों को युगांडा वापस बुलाया. उनके निमंत्रण के बाद भी ज्यादातर भारतीय वापस नहीं गए. युगांडा में 90 प्रतिशत भारतीय पहली पीढ़ी के लोग हैं. आज युगांडा में लगभग 15 हजार भारतीय हैं. वे लोग वहां काफी असरदार हालत में हैं.

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