Bhagat Singh on Martyrdom Day, ‘ए मुंडा ते बड़ा भागांवाला ए’, जानें- शहीद दिवस पर भगत सिंह की कुछ पर्सनल और स्पेशल बातें
Bhagat Singh on Martyrdom Day, ‘ए मुंडा ते बड़ा भागांवाला ए’, जानें- शहीद दिवस पर भगत सिंह की कुछ पर्सनल और स्पेशल बातें

‘ए मुंडा ते बड़ा भागांवाला ए’, जानें- शहीद दिवस पर भगत सिंह की कुछ पर्सनल और स्पेशल बातें

आइए, आज शहीद दिवस पर अपने नायक भगत सिंह के बारे में कुछ पर्सनल और स्पेशल बातें जानते हैं.
Bhagat Singh on Martyrdom Day, ‘ए मुंडा ते बड़ा भागांवाला ए’, जानें- शहीद दिवस पर भगत सिंह की कुछ पर्सनल और स्पेशल बातें

देश आज अपने तीन सपूतों को उनके बलिदान दिवस पर कृतज्ञ होकर याद कर रहा है. सरकारी फाइलों के मुकाबले हर भारतीय के दिल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव बसते हैं. 23 मार्च 1931 को तय समय से एक दिन पहले डरी हुई ब्रिटिश सरकार ने इन तीनों देशभक्तों को फांसी दे दी थी.

आइए, आज शहीद दिवस पर अपने नायक भगत सिंह के बारे में कुछ पर्सनल और स्पेशल बातें जानते हैं.

ऐसे पड़ा भगत सिंह नाम

भगत सिंह के जन्म वाले दिन उनके पिता सरदार किशनसिंह और चाचा अजीतसिंह की जेल से रिहाई हुई थी. इस बात से खुश उनकी दादी जय कौर ने स्वाभाविक प्रतिक्रिया दी, ‘ए मुंडा ते बड़ा भागांवाला ए’ (यह लड़का तो बड़ा सौभाग्‍यशाली है).

भगत सिंह के भतीजे बाबरसिंह संधु के पुत्र यादविंदर सिंह संधु ने पारीवारिक चर्चाओं के मुताबिक याद करते हुए बताया था कि दादी के मुंह से निकले शब्दों के आधार पर घरवालों ने भागांवाला (भाग्‍यशाली) होने की वजह से लड़के का नाम इन्हीं शब्दों से मिलता-जुलता यानी भगतसिंह रखा. उनके नामकरण संस्कार यज्ञ के दौरान उनके दादा सरदार अर्जुनसिंह ने यह संकल्प भी लिया कि वे अपने इस पोते को देश के लिए समर्पित कर देंगे. भगतसिंह का परिवार आर्य समाजी था.

घर में पड़ा देश प्रेम का बीज

भारत की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था. यह स्थान अब पाकिस्तान में. देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी. भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह और श्‍वान सिंह इसमें मदद रहे थे. करतार सिंह सराभा की अगुवाई में चलाई जा रही गदर पार्टी से दोनों जुड़े थे. भगत सिंह पर इन दोनों का गहरा प्रभाव था.

जलियांवाला बाग नरसंहार ने बदल दिया

भगत सिंह पर घर के बाहर यानी देश के बड़े नेताओं में शामिल करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय का सबसे ज्यादा असर था. 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने भगत सिंह के बाल मन पर अंग्रेज सरकार के खिलाफ काफी गुस्सा भर दिया था.

नेशनल कॉलेज, लाहौर की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने 1920 में महात्‍मा गांधी के नेतृत्व में शुरू आंदोलनों में भाग लिया. गांधी के कहने पर विदेशी समानों का बहिष्कार किया. 14 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने सरकारी स्‍कूलों की पुस्‍तकें और कपड़े जला दिए. इसके बाद उनके नाम से पोस्‍टर छपने लगे.

चौरी-चौरा कांड के बाद आजाद के पास

चौरी-चौरा कांड ( 1921) में जब गांधीजी से किसानों का साथ नहीं दिए जाने को लेकर विचारों में अंतर आने पर भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद की टीम का अहम हिस्सा बन गए. आजाद के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज किया. भगत सिंह ने रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और प्रमुख क्रांतिकारियों ने साथ मिलकर 9 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ के लिए चली 8 नंबर डाउन पैसेंजर से काकोरी स्टेशन पर सरकारी खजाना लूट लिया.

दूध का कारोबार और शादी से इनकार

काकोरी कांड के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन पर अंग्रेजों ने काफी सख्ती की. भगत सिंह अपने दोस्त सुखदेव को लेकर किशन सिंह के यहां लाहौर गए. वहां खटाल और दूध के कारोबार से जुड़े. यहीं भगत सिंह ने शादी से मना किया था.

रसगुल्ला और चार्ली चैप्लिन की फिल्मों से प्यार

फिल्में देखना और रसगुल्ले खाना भगत सिंह को काफी पसंद था. मौका मिलने पर वह राजगुरु और यशपाल के साथ फिल्म देखने जाते थे. आजाद की नाराजगी को झेलकर भी वह अपने पसंदीदा चार्ली चैप्लिन की फिल्में देख आते थे.

ऐसे किया था बम-पिस्तौल का इस्तेमाल

चंद्रशेखर आजाद की मदद से भगत सिंह और राजगुरु ने मिलकर 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी) जेपी सांडर्स को मारा था. सांडर्स ने लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाई थी. इसके बाद भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश सरकार की तत्कालीन सेंट्रल असेंबली के हॉल में 8 अप्रैल 1929 को धुएं वाले बम और पर्चे फेंके थे.

लेखक-पत्रकार और संपादक भी रहे

क्रांतिकारी भगत सिंह एक अध्ययनशील विचारक, दार्शनिक, लेखक, पत्रकार और संपादक भी थे. फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का उन्होंने विशेष अध्ययन किया था. वह हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिश भाषा के जानकार थे. उन्होंने ‘अकाली’ और ‘कीर्ति’ दो अखबारों का संपादन भी किया. इसके अलावा अपने नाम और छद्म नाम से कई जगहों पर लिखा और छपे.

जेल में बिताए लगभग दो साल

भगत सिंह लगभग दो साल यानी 716 दिनों तक जेल में रहे. वहां भी उनका पढ़ना-लिखना, कसरत और क्रांति की बातें चलती रही. जेल में भगत सिंह ने अपने साथियों से मिलकर 64 दिनों तक भूख हड़ताल की. एक क्रांतिकारी साथी यतींद्रनाथ दास ने तो इस दौरान ही आखिरी सांसें ली. लाहौर सेंट्रल जेल में भगतसिंह ने 404 पेज की डायरी लिखी, जिसकी मूल प्रति इस समय उनके पोते यादविंदर के पास रखी है.

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फांसी पर झूलने वाला दिन

23 मार्च 1931 को फांसी से पहले भी भगत सिंह खुश और संतुष्ट थे. जब तीनों को फांसी देना तय किया गया था, तब जेल के बाकी सारे कैदी रो रहे थे. देश भर में प्रदर्शन हो रहे थे. लाहौर में भारी भीड़ को रोकने के लिए अंग्रेजों को मिलिट्री लगानी पड़ी थी.

जितेंदर सान्याल की लिखी किताब ‘भगत सिंह’ के मुताबिक, फांसी के तख्ते पर गले में फंदा डालने से ऐन पहले भगत सिंह ने डिप्टी कमिश्नर की ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “मिस्टर मजिस्ट्रेट, आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा है कि भारत के क्रांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर भी झूल जाते हैं.”

आखिर में भगत सिंह का एक शेर

भगत सिंह की जेल डायरी के पेज नंबर 124 पर लिखा है –

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे,
जो गम की घड़ी को भी खुशी से गुलजार कर दे.

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