कैसे कॉलेज के प्रोफेसर से आतंक का आका बना हाफिज़ सईद, जानिए पूरी कहानी

हाफिज़ सईद एक बार फिर सलाखों के पीछे है, लेकिन ये पहली बार नहीं हुआ है. आइए आपको बताते हैं कि कॉलेज में पढ़ानेवाला एक सामान्य सा प्रोफेसर कैसे दक्षिण एशिया में आतंक का पर्यायवाची बन गया.

फरवरी 2013 का महीना था. जेकेएलएफ के यासीन मलिक इस्लामाबाद के प्रेस क्लब के बाहर सड़क पर 26 घंटे की भूख हड़ताल पर बैठे थे. वो भारतीय संसद पर हमले के दोषी अफज़ल गुरू की फांसी के खिलाफ धरने पर बैठे थे. इसमें कोई खास बात नहीं थी. अक्सर कश्मीरी अलगाववादी पाकिस्तान में बैठे अपने दोस्तों, शुभचिंतकों और फंड करनेवालों के पास जाते ही रहते हैं इसलिए यासीन मलिक का ऐसा प्रदर्शन कोई विशेष घटना नहीं थी, लेकिन अचानक ही वहां खलबली मच गई. कैमरे के फ्लैश चमकने लगे. कोई था जिसके आने से पूरा माहौल ही बदल गया. न्यूज़ चैनलों और अखबारों को हेडलाइंस मिल गई. ये था हाफिज़ मोहम्मद सईद. जमात उद दावा का सरगना और उसकी आड़ में चलनेवाले लश्करे तैयबा का कर्ताधर्ता.

दुनिया भर में अमन का खलनायक हाफिज़ सईद
हाफिज़ सईद के संगठन का नाम 2008 के मुंबई हमले में आ चुका था. उसके पहले 2006 में मुंबई ट्रेन धमाकों में भी उसकी मिलीभगत के सबूत सामने आए थे. 2001 में भारतीय संसद के हमलावरों के संबंध भी सईद से जुड़े होने की बातें उभरी थीं. उसके ज़हरबुझे भाषणों के क्लिप यूट्यूब के ज़रिए भारतीयों तक पहुंच रहे थे. भारतीय चैनल उसकी हरकतें बार-बार दर्शकों को दिखा रहे थे. ऐसे में महज़ 15 मिनट धरने में बैठकर हाफिज़ सईद ने यासीन मलिक के उस प्रदर्शन की हवा निकालकर रख दी जिसे वो गांधीवादी बताकर भारतीयों की प्रतिक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाने के इच्छुक थे.

असल में हाफिज़ सईद वो शख्स है जिसके साथ किसी भारतीय का बैठना भारत की आवाम बर्दाश्त नहीं करती और ना ही उसके नाम के साथ जी या साहब लगाना ही सामान्य रह गया है. भारत में अपनी इस ‘प्रतिष्ठा’ का कारण खुद हाफिज़ सईद ही है. नफरत के इस प्रोफेसर ने दो दशकों में ऐसा बहुत कुछ किया कि वो ना सिर्फ भारत के लिए मोस्ट वॉन्टेड बन बैठा बल्कि 2012 में व्हाइट हाउस भी उस पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखने को मजबूर हो गया. आखिरकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 10 दिसंबर 2008 को उसका नाम उन आतंकियों की लिस्ट में डाल दिया जिन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ भी वैश्विक शांति के लिए खतरनाक मानता है. इसी साल के मार्च महीने में संगठन ने लिस्ट से बाहर निकालने की हाफिज़ सईद की अपील ठुकरा दी.

हाफिज़ सईद के मामले में अमेरिका भी पाकिस्तान को रियायत देने के मूड में नहीं

अब आलम ये है कि अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोपियन यूनियन समेत, रूस और ऑस्ट्रेलिया भी लश्करे तैयबा को बैन कर चुके हैं. ये अलग बात है कि हाफिज़ सईद ने लश्कर के साथ अपने संबंधों को कभी नहीं माना.

हिसार से लाहौर के दर्दनाक सफर ने डाली नफरत की नींव
हाफिज़ सईद का जन्म पाकिस्तानी पंजाब के सरगोधा में 5 जून 1950 (कई जगहों पर 6 मई 1950) को ऐसे परिवार में हुआ था जो विभाजन में हिसार से लाहौर का सफर चार महीनों के भारी संघर्ष के बाद पूरा कर सका था. इस हिजरत में उसके परिवार के 36 लोगों ने अपनी जान खो दी थी. खुद हाफिज़ सईद ने कराची के उर्दू अखबार रोज़नामा उम्मत को अपने इंटरव्यू में बताया था कि उसे विभाजन के दौरान हिंदू और सिखों के अत्याचारों के बारे में बताया गया था जिस वजह से परिवार को पुश्तैनी घर छोड़ देना पड़ा. उसके पिता कमालुद्दीन एक किसान थे. बकौल हाफिज़ मोहम्मद सईद उसके पिता ने बताया था कि हरियाणा छोड़ते हुए उनके काफिले में 800 लोग थे जिन्होंने पहले ट्रेन से यात्रा की शुरूआत की लेकिन भारी मारकाट की वजह से वो पैदल ही पाकिस्तान जाने को मजबूर हुए.

सरगोधा में बसने के बाद शुरूआती दिन मुश्किल थे. कुछ रिश्तेदार जो पहले ही भारत से पाकिस्तान आकर एक गांव चख में बस चुके थे उन्होंने सईद परिवार को कच्चे मकान में एक कमरा दे दिया. हाफिज़ के बचपन के कई साल वहां बीते. बाद में पिता ने एक किराना दुकान खोल ली. कुछ ही दिन गुज़रे थे कि सरकार की पॉलिसी के तहत उन्हें मुहाज़िर होने के नाते 15 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई जिस पर एक बार फिर से परिवार किसानी करने लगा.

पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े हाफिज़ सईद को उसकी मां ने कुरआन कंठस्थ कराई. उन्होंने गांव में एक मदरसा भी खोल लिया. पढ़ाई के साथ-साथ अब हाफिज़ का काम पिता के साथ खेती करना भी था. आगे की पढ़ाई के लिए उसे सरगोधा शहर जाना पड़ा और उससे भी आगे पढ़ने के लिए वो बहावलपुर पहुंचा. उसके चाचा हफीज़ अब्दुल्लाह खुद भी बहावलपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे. हफीज़ अब्दुल्लाह का ताल्लुक अहले-हदीस नाम के पंथ से था जो वहाबी समुदाय का हिस्सा है और अपने कट्टरपंथ के लिए जाना जाता है. इन्हीं हफीज़ अब्दुल्लाह के विचारों का बहुत असर हाफिज़ सईद पर पड़ा. इनका बेटा अब्दुल रहमान मक्की आगे चलकर हाफिज़ सईद का दायां हाथ बना.

अब्दुल रहमान मक्की

1965 और 1971 की जंग ने दिल को दिया गहरा ज़ख्म 
वक्त बीतता रहा और भारत के प्रति हाफिज़ सईद के ज़हन में नफरत पकती रही. यहां तक कि 1965 की भारत-पाक जंग के दौरान जब वो नौवीं जमात में था तो उसने तीस-चालीस लड़कों का एक ग्रुप बनाकर लाठी-डंडों से गांव की चौकीदारी करनी शुरू कर दी. तब ये अफवाह फैली थी कि कभी भी भारतीय पैराशूटर्स सरगोधा में उतर सकते हैं.

साइकोलॉजी और फिलोसॉफी में ग्रेजुएशन करनेवाला हाफिज़ सईद जब सरगोधा में आगे की पढ़ाई करने के लिए तैयारी में लगा था तभी एक दिन उसके चाचा ने उसे अपने पिता के साथ बहावलपुर बुलाया. वो हाफिज़ को अपना दामाद बनाना चाहते थे. उसी शाम की नमाज़ के बाद निकाह पढ़वा दिया गया. शादी के बाद हाफिज़ सईद ने लाहौर यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया जहां से उसका जीवन एक अहम मोड़ लेनेवाला था. उसने यूनिवर्सिटी की राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी और इस्लामी जमाते तुल्बा का सदस्य बन गया. इसी दौरान पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और पूर्व में नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ जिससे हाफिज़ सईद को गहरा सदमा लगा. 1972 में वो पहली बार बांग्लादेश विरोधी आंदोलन में ही जेल भी गया.

अरबी और इस्लामिक स्टडीज़ में मास्टर्स करने के बाद हाफिज़ सईद को पाकिस्तानी तानाशाह ज़िया उल हक ने 1974 में इस्लामिक आइडियोलॉजिकल काउंसिल में रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम करने का मौका दिया. महज़ सात महीनों के बाद उसे यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में लेक्चरर पद पर नियुक्ति मिली जहां वो आनेवाले 25 सालों तक पढ़ाता रहा.

साधारण प्रोफेसर से कैसे बना हाफिज़ आतंक का उस्ताद
साल 1981 में हाफिज़ सईद की ज़िंदगी ने एक और मोड़ लिया. यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हुए उसे सऊदी अरब के रियाद में स्थित किंग सऊद यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप का न्यौता मिला. 2 सालों तक पढ़ाई के दौरान हाफिज़ सईद ने सऊदी अरब के प्रमुख मुफ्ती शेख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ की तकरीरें नियमित सुनीं. ये वो दौर था जब हाफिज़ सईद की समझ पक्की हो रही थी. वो खुद मानता है कि अगर शेख बिन बाज़ से उसकी मुलाकात ना होती तो जमात उद दावा का बनना मुश्किल था. ये वही मुफ्ती थे जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को भी सबक दिए थे. हालांकि हाफिज़ सईद के मुताबिक उस दौर में ओसामा वहां मौजूद नहीं था.

शेख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ ने लादेन और हाफिज़ दोनों को बहुत प्रभावित किया

1983 में वतन वापसी के बाद एक बार फिर से हाफिज़ मोहम्मद ने उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू कर दिया, लेकिन अब वो सिर्फ पढ़ा नहीं रहा था. उसके दिमाग में एक खलबली मची थी. जमात-उद-दावा का कॉन्सेप्ट तैयार हो रहा था. कुछ वक्त बाद उसने 1985 में शेख बिन बाज़ के संस्थान मरकज़-दावत-उल -इरशाद से प्रेरणा लेकर पांच- छह लोगों के सहयोग से जमात-उद-दावा शुरू कर दिया. उस  वक्त साइकिल पर चलनेवाला हाफिज़ सईद लोगों के घर-घर जाकर उन्हें इस्लामिक शिक्षा देता था. एक मैग्ज़ीन भी निकाली जाने लगी जिसका नाम था दावा, जिसे बाद में परवेज़ मुशर्रफ ने बैन भी कराया. हाफिज़ का संगठन सार्वजनिक तौर पर डिस्पेंसरी खोल रहा था, कराची से लेकर गुजरांवाला तक अस्पताल बना रहा था, एंबुलेंस चला रहा था, स्कूलों का निर्माण कर रहा था लेकिन पर्दे के पीछे जो असल खेल था वो आम भाषा में आतंकवाद कहा जाता है.

Pervez Musharraf
मुशर्रफ ने एक पत्रकार के साथ टेलीफोनिक इंटरव्यू के दौरान ये बात कही.

जमात -उद-दावा वो नकाब था जिसके पीछे लश्करे तैयबा की करतूतें जारी थीं. जमात-उद-दावा ने 2005 में भूकंप और 2010 में बाढ़ के दौरान लोगों के बीच जाकर जो काम किया उसने इसे मकबूलियत दिलाई. आगे चलकर इन्हीं इलाकों में वो अपनी पैठ जमाता गया.  आम पाकिस्तानी उसे समाजसेवी के रूप में देख रहा था. हाफिज़ सईद का सीधा सा गणित लोगों के बीच अपना प्रभाव जमाना और उन्हीं के बीच से अपने काम के लड़कों को कश्मीर में जारी आतंकी गतिविधियों में झोंकना था. यही वजह है कि उसके समाजसेवा के कामों की तारीफ करनेवाले अमेरिका ने ही बाद में उस पर नकेल कसवाई.

9/11 के बाद अमेरिका के दबाव में बदला पाकिस्तान का रुख
जब तक हाफिज़ सईद का हिंसक चेहरा छिपा रहा तब तक ठीक था लेकिन 9/11 के बाद दुनिया बहुत बदल गई. आतंकवाद को ना समझने का नाटक करनेवाला अमेरिका अपने आंगन में गिरती इमारतों को देखकर हिल गया. तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ को समझा दिया गया कि या तो साथ दो या फिर कीमत चुकाने को तैयार रहो. अब तक हाफिज़ सईद और मौलाना मसूद अज़हर को पनाह देकर मासूम बन रहा पाकिस्तान अचानक हरकत में आया. लश्करे तैयबा को प्रतिबंधित कर दिया गया. 2002 में हुकूमत ने उसे सहला रेस्टहाउस में नज़रबंद करके उसे सब जेल में तब्दील कर दिया. यकीनन पाकिस्तान सरकार के लिए मुश्किलें बहुत बड़ी थीं. पाकिस्तान में ऐसे बहुत लोग थे जो हाफिज़ सईद के साथ थे. फिर भी अमेरिका का दबाव नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था. हाफिज़ सईद को सिर्फ तब छोड़ा गया जब उसकी मां गुज़र गई. नज़रबंदी में कैद के दिन उसके बाद भी जारी थे. तीन महीनों के बाद वो छूटा तो 14 दिनों के अंदर उसने खुद को एक बार फिर 6 महीने की जेल में पाया. सरकार कहती रही कि हाफिज़ सईद आज़ाद है पर उसे कहीं आने-जाने देने पर पाबंदी थी. आखिरकार उसे घर में नज़रबंद कर लेने पर मामला शांत हुआ.

साल 2006 में मुंबई बम धमाकों के बाद पंजाब की प्रांतीय सरकार ने फिर से हाफिज़ सईद को करीब 3 हफ्तों के लिए नज़रबंद कर लिया. जिस दिन उसकी नज़रबंदी हटी उसी दिन वो फिर से शेखूपुरा के रेस्टहाउस में बंद कर दिया गया. बाद में लाहौर हाईकोर्ट के आदेश ने उसे मुक्ति दिलाई.  2008 में नवंबर के महीने में जब मुंबई आतंकियों के हमले से दहला तब भारत सरकार ने सख्त प्रतिक्रिया दिखाई. महीने भर बाद फिर से हाफिज़ सईद नज़रबंदी में था. हालांकि लाहौर हाईकोर्ट ने उसकी नज़रबंदी को जून 2009 में गैर कानूनी ठहरा दिया. इस वक्त तक पाकिस्तान में भी एक हिस्सा ऐसा उभरा जो हाफिज़ को खलनायक मानने लगा. यही वजह थी कि पाकिस्तानी सरकार ने लाहौर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की. मुसीबतों का एक मोर्चा 25 अगस्त 2009 में खुला जब इंटरपोट ने हाफिज़ सईद के विरुद्ध रेडकॉर्नर नोटिस जारी किया. नतीजतन वो फिर चारदीवारी के बीच था. इस बार भी लाहौर हाईकोर्ट उसके लिए राहत लाई. फिर भी उसे ना अमेरिका और ना भारत की तरफ से रियायत मिली.

अमेरिका और भारत का दुश्मन है हाफिज़ मोहम्मद सईद
हाफिज़ सईद पाकिस्तानी सरकार के लिए वो गले की हड्डी बन गया जो ना निगला जा रहा है और ना उगला. इसके अलावा पाकिस्तान भर में उसके संपर्क आईएसआई के लिए फायदेमंद हैं. भारतीय कश्मीर में घुसपैठ के लिए भी वो अपने चुने हुए लड़कों को भेजता रहा है. ना जाने कितने ही सबूत हैं जिनसे साबित होता है कि हाफिज़ सईद कश्मीर में जारी हिंसा को ना केवल बढ़ावा देता है बल्कि उस पूरी हिंसक कवायद की अहम कड़ी है.

वो भारत के साथ बातचीत करने के मसले पर पाकिस्तानी सरकार की आलोचना भी करता रहा है. उसने भारत के टुकड़े करने को लेकर खुले आम बयान दिए हैं. अमेरिका में हिंसा का जमकर आह्वान किया है. हाफिज़ सईद ने कश्मीरी अलगाववादी मसर्रत आलम की गिफ्तारी पर कहा था कि- जिहाद एक इस्लामिक सरकार का पवित्र कर्तव्य है. पाकिस्तान में सरकार ने हमेशा कश्मीरियों की आज़ादी का पक्ष लिया है. मैं कहता हूं कि हमारी सेना को कश्मीरियों के लिए जिहाद छेड़ना चाहिए. 

हाफिज़ सईद ने अपने इंटरव्यू में भी माना है कि वो कश्मीर की आज़ादी के मुद्दे से भावनात्मक तौर पर जुड़ा है. हाफिज़ का मानना है कि एक दिन भारत को कश्मीर छोड़ना पड़ेगा. उसका तर्क है कि अगर सोवियत यूनियन और अमेरिका को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा तो भारत को कश्मीर छोड़ना ही होगा.

अंत में आपको बता दें कि हाफिज़ के दो भाई हैं. एक इस्लामिक यूनिवर्सिटी में इस्लाम पढ़ाता है तो दूसरा हाफिज़ का हाथ बंटाता है. पहली बीवी से उसके तीन बच्चे थे जिनमें एक लड़की थी जिसकी मौत हो गई. बेटा तल्हा लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ाता है. उसने दूसरी शादी ऐसी महिला से की जिसका पति मर चुका था. पांचों बच्चों को हाफिज़ सईद ने अपना लिया. खुद हाफिज़ मानता है कि पहली पत्नी को दूसरे निकाह पर ऐतराज़ था मगर बेटे ने साथ दिया तो सब मान गए. अभी हाफिज़ सईद को दूसरी बीवी से भी एक बेटा और बेटी है. हाफिज़ का पूरा खानदान उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में शामिल रहा है. ऐसे में सिर्फ हाफिज़ सईद की गिरफ्तारी हमेशा नाकाफी साबित होती है. पाकिस्तान भी उसे ही नज़रबंद करके दुनिया भर से पड़ रहा दबाव हल्का करने का प्रयास करता रहा है.