नेहरू से मोदी तक कई प्रधानमंत्री बने ‘गुरुजी’ के प्रशंसक, सामने कभी कुर्सी पर नहीं बैठे अटल

नागपुर के बाद साल 1927 में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमएससी की डिग्री हासिल की. वह राष्ट्रवादी नेता और बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय से बहुत प्रभावित थे. आध्यात्मिक तौर पर वह स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई अखंडानंद के शिष्य बने.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर की आज बुधवार को 114वीं जयंती है. संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने निधन से पहले उन्हें संगठन के सबसे बड़े पद के लिए चुना था. गोलवलकर को संघ के स्वयंसेवक और शुभचितंक प्रेम से ‘गुरुजी’ कहकर संबोधित करते हैं.

कैसा रहा जीवन

नागपुर के रामटेक तहसील में 19 फरवरी 1906 को जन्म लेने वाले मधु के जीवन में पढ़ाई, संन्यास और संगठन इन तीनों की प्रमुखता रही. नागपुर के बाद साल 1927 में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमएससी की डिग्री हासिल की. वह राष्ट्रवादी नेता और बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय से बहुत प्रभावित थे. आध्यात्मिक तौर पर वह स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई अखंडानंद के शिष्य बने.

डॉ. हेडगेवार के बाद गुरुजी ने साल 1940 से 1973 तक 33 वर्षों में संघ को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया. साल 1970 में वे कैंसर से पीड़ित हो गए. सर्जरी से कुछ लाभ तो हुआ पर पूरी तरह ठीक नहीं हो सके. इसके बाद भी संघ के काम से वह देश भर में लगातार प्रवास करते रहे. गुरूजी ने 5 जून, 1973 की रात अंतिम सांस ली.

दुनिया भर में कई असरदार संगठनों की शुरुआत

संघ के विचारों से जुड़े जितने भी संगठन आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखे और स्वीकारे जा रहे हैं उनके पीछे गुरुजी की प्रेरणा और कुशल मार्गदर्शन है. राजनीतिक जगत में दुनिया की सबसे बड़ी सदस्य संख्या वाली पार्टी बीजेपी का मूल जनसंघ, विद्यार्थियों का संगठन एबीवीपी, मजदूरों के बीच काम करने वाला भारतीय मजदूर संघ या शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती इन सबों के पीछे उनकी परिकल्पना ही दिखती है.

विरोधी विचार के लोग भी करते रहे सम्मान

गुरु गोलवलकर को लोग हिंदू राष्ट्र के लिए संगठन करने वाला बताते हैं. बहुत से लोग उनके विचारों का विरोध करते हैं, लेकिन जानकर हैरत होगी कि उनके बिल्कुल उलट विचारधारा वाले वामपंथी हों, नास्तिक हों, मुसलमान विचारक हों या समाजवादी नेता गुरुजी से मिलने के बाद सब उनके प्रशंसक हो जाते थे.

ईरानी मूल के डॉ. सैफुद्दीन जीलानी ने गुरुजी से हिन्दू-मुसलमानों के विषय में बात करने के बाद कहा, ‘मेरा निश्चित मत हो गया है कि हिन्दू-मुसलमान प्रश्न के विषय में अधिकार वाणी से यथोचित मार्गदर्शन यदि कोई कर सकता है तो वह श्री गुरुजी हैं.’

कम्युनिस्ट बुध्दिजीवी और पश्चिम बंगाल सरकार के पूर्व वित्त मंत्री डॉ. अशोक मित्र ने कहा, ‘हमें सबसे अधिक आश्चर्य में डाला श्री गुरुजी ने. उनकी उग्रता के विषय में बहुत सुना था, किंतु मेरी सभी धारणाएं गलत निकलीं, इसे स्वीकार करने में मुझे हिचक नहीं कि उनके व्यवहार ने मुझे मुग्ध कर लिया.’

देश में समाजवाद के सबसे बड़े नेताओं में एक लोकनायक जय प्रकाश नारायण भी गुरुजी के लिए सम्मान का भाव रखते थे. उनके मुताबिक पूज्य महात्मा गांधी और उनसे पूर्व जन्मे देश के महापुरुषों की परंपरा में ही पूज्य गुरुजी का भी जीवन था.

प्रसिद्ध पत्रकार और संपादक खुशवंत सिंह ने गुरुजी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में द इलेस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया में विस्तार से लिखा. लेख में सिंह ने माना कि गुरुजी से मिलकर बहुत सारी शंकाओं का समाधान मिला. उन्होंने लिखा, ‘ चेहरे पर एक स्थायी मुस्कान और चश्मे से झांकतीं दो चमकदार आंखें. देखने में वे भारतीय हो ची मिन जैसे हैं. मैं जैसे ही उनके पैर छूने के लिए झुका, उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए और अपने बगल में लगे आसन पर बैठाया. इंटरव्यू के बाद मैं जब जाने की आज्ञा मांगने लगा तो उन्होंने फिर मेरे हाथ पकड़ लिए ताकि मैं उनके चरण न छू पाऊं’ लेख के अंत में खुशवंत सिंह ने लिखा, ‘ क्या मैं उनसे प्रभावित था? मैं स्वीकार करता हूं, मैं (उनसे) प्रभावित था.’

गांधी हत्या के वक्त का हाल

महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ को काफी दिक्कतों को झेलना पड़ा. इस मामले में तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल की ओर से बिना शर्त प्रतिबंध हटाने और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में गांधी हत्या में संघ की कोई भूमिका नहीं होने के बावजूद राजनीतिक तौर पर यह आरोप लगाया जाता रहा है.

जब गांधीजी की हत्या का समाचार गुरुजी को मिला तब वह चेन्नई ( तब मद्रास) में थे. इस बारे में गुरुजी गोलवलकर के जीवनीकार सीपी भिषीकर ने लिखा है, ‘उस समय गोलवलकर के हाथ में चाय का प्याला था, जब किसी ने उन्हें गांधी की हत्या का समाचार दिया. चाय का प्याला रखने के बाद गोलवलकर बहुत समय तक कुछ भी नहीं बोले.’ फिर उनके मुंह से एक वाक्य निकला, ‘कितना बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का!’ इसके बाद उन्होंने अपना बाकी का दौरा रद्द कर दिया और पंडित नेहरू, सरदार पटेल को संवेदना का तार भेज कर वापस नागपुर आ गए.”

गुरुजी को 1 फरवरी, 1948 की आधी रात को नागपुर पुलिस ने गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जीप में बैठने से पहले उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था, “संदेह के बादल जल्द ही छंट जाएंगे और हम बिना किसी दाग के बाहर आएंगे.’ उनके सहयोगी भय्याजी दानी ने संघ की सभी शाखाओं को तार भेजा, ‘गुरुजी गिरफ्तार. हर कीमत पर शांत रहें.’ छह महीने बाद संघ से प्रतिबंध हटा लिया गया और गुरुजी बाइज्जत रिहा हो गए.

गांधी हत्या के बाद जब महाराष्ट्र में गोडसे की जाति के लोगों पर अत्याचार हुए. संघ कार्यालय पर हमले हुए. तब भी गुरुजी ने अपने कार्यकर्ताओं को संयम और धैर्य से रहने के लिए कहा. देश भर में प्रतिकूल माहौल में भी संघ के काम को आगे बढ़ाया.

देश के प्रधानमंत्रियों का व्यवहार

देश विभाजन के वक्त पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान से भारत आने वालों लोगों की सेवा और सुरक्षा के लिए कई समितियां बनाई और उनके पुनर्वास में भी मदद की. जम्मू कश्मीर के मसले पर भी गुरुजी महाराजा हरिसिंह और भारत सरकार के संपर्क में थे. हरिसिंह उनका काफी सम्मान करते थे.

चीन के साथ युद्ध 1962 में संघ ने नागरिक प्रशासन में शानदार भूमिका निभाई. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इससे काफी प्रभावित हुए. उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों को पूरे गणवेश (यूनिफॉर्म) और घोष (बैंड) के साथ साल 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए बुलाया. उन्होंने परेड देखने के बाद प्रसन्नता भी जाहिर की.

साल 1965 के युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने गुरुजी को सलाह के लिए बुलाया था. इंदिरा गांधी की गुरुजी से मुलाकात की कोई बात सामने नहीं आई, लेकिन एमपी के पूर्व सीएम बाबूलाल गौर के मुताबिक अटल जी ने साल 1971 में बांग्लादेश मामले में इंदिरा गांधी की गुरुजी से फोन पर बात करवाई थी. उनके निधन पर श्रीमती गांधी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, ‘वे विद्वान, शक्तिशाली और आस्थावान थे. अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व और अपने विचारों के प्रति अटूट निष्ठा के कारण राष्ट्र-जीवन में उनका महत्वपूर्ण योगदान था.

बीबीसी में छपी खबर के मुताबिक, अटल बिहारी वाजपेयी गुरुजी से इतने प्रभावित थे कि उनकी उपस्थिति में कभी कुर्सी पर न बैठ कर हमेशा जमीन पर बैठते थे. साल 2006 में गुरुजी की शतवार्षिकी के मौके पर अटल बिहारी वाजपेयी ने 1940 में गुरुजी से हुई अपनी पहली मुलाकात को याद किया. उस वक्त वे कक्षा 10 में पढ़ रहे थे. उस मुलाकात का उनका अनुभव ऑर्गनाइजर में प्रकाशित हुआ जिसकी भाषा लगभग आध्यात्मिक है.

वाजपेयी ने लिखा था, “गुरुजी ग्वालियर स्टेशन आए थे. हम लोग उनका स्वागत करने स्टेशन पहुंचे थे. जब मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे वे मुझे पहचानते हों. सच तो यह है कि मुझे पहचानने का कोई कारण नहीं था क्योंकि वह हमारी पहली मुलाकात थी. लेकिन उस मीटिंग का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा. उस दिन पहली बार मैंने निश्चय किया कि मुझे राष्ट्र के लिए काम करना है.”

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी जब गुजरात के सीएम थे तब साल 2007 में श्रीगुरुजी पर एक किताब प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से छपी है. 2008 में नरेन्द्र मोदी ने ज्योतिपुंज नाम की किताब लिखी. इसमें आरएसएस के उन 16 व्यक्तियों की जीवनियां हैं जिनसे मोदी प्रभावित हैं. उस किताब में मोदी ने गुरुजी गोलवलकर के बारे में सबसे ज्यादा लिखा है.

उस जीवनी में मोदी ने गुरुजी की तुलना बुद्ध, शिवाजी और बाल गंगाधर तिलक जैसों महापुरुषों से की है. लेख के अंत में मोदी ने अपवाद स्वरूप कृतज्ञता भी प्रकट की है, “हम लोग गुरुजी को समझने और उनका विश्लेषण करने में असक्षम हैं. ये पंक्तियां उनके जीवन के सुंदर क्षणों का स्मरण करने का एक विनम्र प्रयास मात्र हैं.”

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