चीनी राष्ट्रपति से 17वीं बार मिले पीएम मोदी, इतिहास में क्या हुआ था कि बदल गए रिश्ते

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में उन परिस्तिथियों का जिक्र किया है जिस वजह से नेहरू और तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाइ की दोस्ती फीकी पड़ने लगी थी.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिन के भारत दौरे पर हैं. पीएम मोदी ने महाबलीपुरम में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का तमिल लिबास में स्वागत किया. बताया जा रहा है कि चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री मोदी के बीच यह 17वीं मुलाक़ात है.

दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच लगातार हो रही मुलाक़ात के बाद मन में एक सवाल उठा रहा है कि क्या भारत और चीन के संबंध भविष्य में बेहतर हो सकते हैं?

यह सवाल इसलिए क्योंकि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दौर में उनके और चीन के प्रीमियर चाऊ एन लाई की दोस्ती की ख़ूब बातें होती थी. लेकिन वक़्त के साथ-साथ दोस्ती फीकी पड़ने लगी.

साल 1954 में चीन के पास नहीं था एयरक्राफ्ट

चाऊ एन लाई 1954 में पहली बार भारत दौरे पर आए थे. उस दौर में चीन के पास अपना एयरक्राफ्ट तक नहीं था, उन्हें दिल्ली लाने के लिए भारत ने एयर इंडिया की फ्लाइट भेजी थी. तब कहीं वो भारत यात्रा पर आ पाए थे.

दिल्ली में नेहरू-चाऊ एन लाई समिट आयोजित किया गया था. इसी मुलाक़ात में चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई और जवाहर लाल नेहरू के बीच पंचशील समझौते हुए जिसमें शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को लेकर 5 सिद्धांत दिए गए.

यह यात्रा काफी सफल मानी गई थी. इसी यात्रा के दौरान 1956 में‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ जैसे नारे दिए गए.

1950 में चीन को संयुक्त राष्ट्र में शामिल कराने में नेहरू की भूमिका

नेहरू जानते थे कि चीन विध्वंसकारी देश है और उसपर लगाम लगाना बेहद ज़रूरी है. इसी वजह से 1950 के दशक में भारत ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र में शामिल करने की वकालत की थी. नेहरू का मानना था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार की वजह से वह एक असंतुष्ट देश बन गया.

उन्हें डर था कि अगर चीन के साथ भी भेदभाव हुआ तो खतरनाक देश बनकर उभर सकता है. इसी वजहसे नेहरू चीन को संयुक्त राष्ट्र से जोड़ना चाहते थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने कहा भी था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित नहीं करना सिर्फ गलती नहीं, बल्कि खतरनाक होगा. 1950 में उन्होंने संसद में कहा था कि आज के दौर में ताकत को लेकर चीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

शशि थरूर ने भी अपनी किताब में लिखा है कि भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ही थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्य बनाए जाने को लेकर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की वकालत की.

हालांकि इसको लेकर काफी मतभेद भी है.

भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य का नहीं था प्रस्ताव: नेहरू

बीबीसी ने इस प्रसंग का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि 1955 में नेहरू ने संसद में इस बात को ख़ारिज किया था कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का कोई अनौपचारिक प्रस्ताव मिला था.

27 सितंबर, 1955 को डॉ जेएन पारेख के सवालों के जवाब में नेहरू ने संसद में कहा, ”यूएन में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कोई प्रस्ताव नहीं मिला था. कुछ संदिग्ध संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है. संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था और इसमें कुछ ख़ास देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी. चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है. ऐसे में कोई सवाल ही नहीं उठता है कि भारत को सीट दी गई और भारत ने लेने से इनकार कर दिया. हमारी घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र में सदस्य बनने के लिए जो भी देश योग्य हैं उन सबको शामिल किया जाए.”

इतिहासकार मानते हैं कि नेहरू को उम्मीद थी कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता दिलाने के बाद दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ेगा. जो कि बेहद ज़रूरी भी था. द डिप्लोमैट ने लिखा है, ”नेहरू ने तत्कालीन समय में यह माना था कि बड़ी शक्तियों को अपने मित्रों से दूर नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय संगठनों में शामिल किया जाना चाहिए.”

शायद नेहरू को इस बात का अंदाज़ा रहा होगा कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना में शक्तिशाली देश बनने की भरपूर संभावना है.

भारत-चीन के बीच रिश्ते में आई खटास

शुरुआती समय में चीन और भारत के बीच संबंध बेहतर भी हो रहे थे. लेकिन फिर हालात बदलने लगे. जुलाई, 1958 में चीन की सरकारी पत्रिका ‘चाइना पिक्टोरिअल’में कुछ विवादास्पद नक़्शे छापे गए. इस नक्शों में नेफा (नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी आज का अरुणाचल प्रदेश) और लद्दाख के बड़े इलाके को चीन का हिस्सा बताया गया.

भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की. जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1958 में चीनी प्रधानमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा. नेहरू ने अपना विरोध दर्ज करते हुए लिखा, ‘1956 में मुलाकात के दौरान चीन ने मैकमोहन लाइन को मान्यता दी थी और इस बात पर भी सहमत हुए कि भारत और चीन के बीच कोई सीमा विवाद नहीं है.’

एक महीने बाद भारत को जवाबी पत्र मिला. जवाब में चाऊ इन लाइ ने लिखा कि मैकमोहन लाइन ब्रितानी हुकूमत की देन है जिसे चीन मान्यता नहीं देता. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कभी नहीं सुलझा. यहां से भारत और चीन के रिश्ते और भी बिगड़ने लगे.

1959 में भी भारत-चीन सीमा पर दोनों सेनाओं के बीच झड़प की कई घटनाए हुईं. 1960 में दोनों देशों के बीच एक बार फिर से दिल्ली में समिट हुई, लेकिन तब तक दोनों देशों के बीच की राजनीति बदल चुकी थी.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में उन परिस्तिथियों का जिक्र किया है जिस वजह से नेहरू और तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाइ की दोस्ती फीकी पड़ने लगी थी.

चाऊ एन लाई की इस यात्रा के बाद भी भारत-चीन सीमा विवाद जस का तस ही बना रहा. दोनों देश इस यात्रा और बातचीत के बाद भी किसी सहमति तक नहीं पहुंच पाए. युद्ध की शुरुआत और अंत 1962 के मई-जून में अचानक सीमा पर गोलीबारी की घटनाएं बढ़ गईं. चीनी सेना की कई टुकड़ियां भारतीय सीमा के भीतर घुस आईं.

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