जब मिजोरम में मानेकशॉ ने बटालियन को पार्सल की थीं चूड़ियां, जानिए क्यों किया था ऐसा

सैम (Sam Manekshaw) हालांकि शक्ल से काफी सख़्त दिखाई देते थे, लेकिन असल ज़िदगी में वह काफी सहज़ थे. इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के साथ भी उनके रिश्ते काफी बेहतर थे.
Remembering Sam Manekshaw, जब मिजोरम में मानेकशॉ ने बटालियन को पार्सल की थीं चूड़ियां, जानिए क्यों किया था ऐसा

भारतीय सेना के जांबाज और जिंदादिल इंसान थे सैम मानेकशॉ (Sam Manekshaw). उनकी बहादुरी के किस्सों से हर कोई वाकिफ है. सैम होरमूज़जी फ़्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ, ये नाम आपने शायद ही सुना हो. बहुत कम ही लोग होंगे जिन्हें यह नाम पता है. पत्नी, दोस्तों या क़रीबी उन्हें सैम कह कर पुकारते थे या “सैम बहादुर”.  आज ही के दिन यानी 27 जून, 2008 को सैन मानेकशॉ ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर आज हम आपको उनसे जुड़े कुछ किस्से-कहानियां बताते हैं. जो शायद आपने पहले न सुने हों.

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7 जून 1969 को सैम मानेकशॉ ने भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया, और उसके बाद दिसंबर, 1971 में उन्हीं के नेतृत्व में भारत-पाक युद्ध हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ. देश के प्रति निस्वार्थ सेवा के चलते सैम मानेकशॉ को साल 1972 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से नवाज़ा गया. वहीं जनवरी, 1973 में उन्हें फील्ड मार्शल का पद दिया गया. इसी माह वह सेवानिवृत्त भी हो गए थे.

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सेवानिवृत्ति से पहले ही पांच सितारा रैंक तक पहुंचने वाले सैम मानेकशॉ देश के एकमात्र सेनाधिकारी थे. वृद्धावस्था में उन्हें फेफड़े संबंधी रोग हो गया और आख़िरकार 27 जून, 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य अस्पताल में उनका निधन हो गया था.

जब मिजोरम में बटालियन को भेजी चूड़ियां

मिजोरम में एक बटालियन उग्रवादियों से लड़ाई में हिचक रही थी. इस बारे में जब मानेकशॉ को पता चला तो उन्होंने चूड़ियों का एक पार्सल बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर को एक नोट के साथ भेजा. नोट में लिखा था, ‘अगर आप दुश्मन से लड़ना नहीं चाहते हैं तो अपने जवानों को ये चूड़ियां पहनने को दे दें.’ जिसके बाद बटालियन ने इस ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया.

इंदिरा गांधी को कहा- स्वीटी

सैम हालांकि शक्ल से काफी सख़्त दिखाई देते थे लेकिन असल ज़िदगी में वह काफी सहज़ थे. इंदिरा गांधी के साथ भी उनके रिश्ते काफी बेहतर थे. इसका प्रमाण इस वाकये से भी मिलता है. 1971 के युद्ध के दौरान जब इंदिरा गांधी ने उनसे भारतीय सेना की तैयारी के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया, मैं हमेशा तैयार हूं-स्वीटी.

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बीबीसी से बात करते हुए मेजर जनरल वीके सिंह कहते हैं, “एक बार इंदिरा गांधी जब विदेश यात्रा से लौटीं तो मानेकशॉ उन्हें रिसीव करने पालम हवाई अड्डे गए. इंदिरा गांधी को देखते ही उन्होंने कहा कि आपका हेयर स्टाइल ज़बरदस्त लग रहा है. इस पर इंदिरा गांधी मुस्कराईं और बोलीं, और किसी ने तो इसे नोटिस ही नहीं किया.”

जब इंदिरा गांधी से सैम बोले- आपके मुंह खोलने से पहले ही इस्तीफा सौंप दूं

इंदिरा गांधी 1971 में मार्च महीने में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई करना चाहती थी लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी. दरअसल, जब इंदिरा गांधी ने असमय पूर्वी पाकिस्तान पर हमले के लिए कहा तो उन्होंने जवाब दिया कि इस स्थिति में हार तय है. इससे इंदिरा गांधी को गुस्सा आ गया. उनके गुस्से की परवाह किए बगैर मानेकशॉ ने कहा, ‘प्रधानमंत्री, क्या आप चाहती हैं कि आपके मुंह खोलने से पहले मैं कोई बहाना बनाकर अपना इस्तीफा सौंप दूं.’ मानेकशॉ ने कहा, मुझे छह महीने का समय दीजिए. मैं गारंटी देता हूं कि जीत आपकी होगी.

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आप अपने काम पर ध्यान दो, मैं अपने काम पर

जब सेना द्वारा तख्तापलट की अफवाह फैली तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. उन्होंने सैम मानेकशॉ से पूछा. उन्होंने बोल्ड अंदाज में जवाब दिया, ‘आप अपने काम पर ध्यान दो और मैं अपने काम पर ध्यान देता हूं. राजनीति में मैं उस समय तक कोई हस्तक्षेप नहीं करूंगा, जब तक कोई मेरे मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा.’

बच्चे क्यों कहते थे डैड स्टॉप इट?

उनकी बेटी माया दारूवाला ने बीबीसी को बताया, “लोग सोचते हैं कि सैम बहुत बड़े जनरल हैं, उन्होंने कई लड़ाइयां लड़ी हैं, उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें हैं तो घर में भी उतना ही रौब जमाते होंगे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था. वह बहुत खिलंदड़ थे, बच्चे की तरह. हमारे साथ शरारत करते थे. हमें बहुत परेशान करते थे. कई बार तो हमें कहना पड़ता था कि डैड स्टॉप इट. जब वो कमरे में घुसते थे तो हमें यह सोचना पड़ता था कि अब यह क्या करने जा रहे हैं.”

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जब इंदिरा को मानेकशॉ की एक बात लगी थी बुरी

1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद सैम को बिजी कौल के स्थान पर चौथी कोर की कमान दी गई. पद संभालते ही सैम ने सीमा पर तैनात सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था, “आज के बाद आप में से कोई भी तब तक पीछे नहीं हटेगा, जब तक इसके लिए लिखित आदेश नहीं मिलता. ध्यान रखिए यह आदेश आपको कभी भी नहीं दिया जाएगा.”

उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने सीमा क्षेत्रों का दौरा किया था. नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी भी उनके साथ थीं.

सैम के रिश्ते इंदिरा गांधी के साथ हमेशा से अच्छे रहे थे. वो बेबाकी से इंदिरा गांधी को जवाब दिया करते थे. सैम के एडीसी ब्रिगेडियर बहराम पंताखी अपनी किताब सैम मानेकशॉ- द मैन एंड हिज़ टाइम्स में लिखते हैं, “सैम ने इंदिरा गांधी से कहा था कि आप ऑपरेशन रूम में नहीं घुस सकतीं क्योंकि आपने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है. इंदिरा को तब यह बात बुरी भी लगी थी लेकिन सौभाग्य से इंदिरा गांधी और मानेकशॉ के रिश्ते इसकी वजह से ख़राब नहीं हुए थे.”

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आंतों, जिगर और गुर्दों में खाईं सात गोलियां

सैम बहादुर की जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वीके सिंह ने बीबीसी को बताया था, “उनके कमांडर मेजर जनरल कोवान ने उसी समय अपना मिलिट्री क्रॉस उतार कर कर उनके सीने पर इसलिए लगा दिया क्योंकि मृत फ़ौजी को मिलिट्री क्रॉस नहीं दिया जाता था.”

जब मानेकशॉ घायल हुए थे तो आदेश दिया गया था कि सभी घायलों को उसी अवस्था में छोड़ दिया जाए क्योंकि अगर उन्हें वापस लाया लाया जाता तो पीछे हटती बटालियन की गति धीमी पड़ जाती. लेकिन उनका अर्दली सूबेदार शेर सिंह उन्हें अपने कंधे पर उठा कर पीछे लाया.

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सैम की हालत इतनी ख़राब थी कि डॉक्टरों ने उन पर अपना समय बरबाद करना उचित नहीं समझा. तब सूबेदार शेर सिंह ने भरी हुई राइफ़ल तानते हुए डॉक्टरों से कहा, “हम अपने अफ़सर को जापानियों से लड़ते हुए अपने कंधे पर उठा कर लाए हैं. हम नहीं चाहेंगे कि वह हमारे सामने इसलिए मर जाएं क्योंकि आपने उनका इलाज नहीं किया. आप उनका इलाज करिए नहीं तो मैं आप पर गोली चला दूंगा.”

डॉक्टर ने अनमने मन से उनके शरीर में घुसी गोलियां निकालीं और उनकी आंत का क्षतिग्रस्त हिस्सा काट दिया. आश्चर्यजनक रूप से सैम बच गए. पहले उन्हें मांडले ले जाया गया, फिर रंगून और फिर वापस भारत. साल 1946 में लेफ़्टिनेंट कर्नल सैम मानेकशॉ को सेना मुख्यालय दिल्ली में तैनात किया गया.

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