गुरु रविदास जयंतीः जानिए क्यों पिता ने नाराज होकर घर से निकाल दिया था

संत रविदास अपनी कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं जो मुख्यतः दोहों और पदों के रूप में प्रचलित हैं. इन कविताओं के जरिए उन्होंने समाज में प्रचलित आडंबर और कुप्रथाओं पर गहरी चोट की है.
Story of Sant Ravidas Jayanti, गुरु रविदास जयंतीः जानिए क्यों पिता ने नाराज होकर घर से निकाल दिया था

हिंदी कैलेंडर के अनुसार संत रविदास की जयंती हर साल माघ महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है. वाराणसी के पास एक गांव में जन्मे रविदास के जन्म के साल के बारे में किसी को पुख्ता जानकारी नहीं है. कुछ लोग 1377 को तो कुछ लोग 1450 को रविदास जी के जन्म का साल मानते हैं.

रविदास अपनी कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं जो मुख्यतः दोहों और पदों के रूप में प्रचलित हैं. इन कविताओं के जरिए उन्होंने समाज में प्रचलित आडंबर और कुप्रथाओं पर गहरी चोट की है. छुआछूत पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है जो समाज को आंदोलित कर सकता है. ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ उनकी सबसे मशहूर कहावत है.

संत रविदास जूते बनाने का काम करते थे. इसी काम में उनके घर से निकलकर संत बनने की कहानी छिपी हुई है. दरअसल रविदास के पिता जूते बनाते थे और रविदास अपने पिता की मदद किया करते थे. रविदास का मन साधु संन्यासियों की बातों में ज्यादा लगता था.

रविदास की बैठकबाजी साधुओं से बढ़ती जा रही थी और वे किसी गरीब को बिना जूतों के नंगे पांव देखते तो मुफ्त में चप्पल बनाकर दे आते. पिता उनकी इस आदत से बहुत परेशान थे. बड़ी समझाइश के बाद भी जब रविदास पर कोई असर नहीं पड़ा तो एक दिन डांटकर घर से भगा दिया. रविदास घर से निकल गए और एक झोपड़ी बनाकर उसमें जूते चप्पलों की मरम्मत का काम करने लगे.

जूते चप्पल बनाते हुए रविदास कविताएं सुनाने लगे तो उनके पास बहुत से लोग आने लगे. उनके मिलनसार व्यवहार के कारण लोगों का जमावड़ा लगने लगा. आज संत रविदास की गिनती समाज को आइना दिखाने वाले संत के रूप में होती है जिन्होंने अपने छंदों के जरिए समाज की मैल धोने का काम किया.

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