‘आज भी लगता है IAF का हिस्सा हूं’, पढ़ें-देश के सबसे पुराने और 100 साल के फाइटर पायलट की कहानी

दलीप सिंह (Dalip Singh Majithia) को इंडियन एयरफोर्स (Indian Air Force) छोड़ने के लिए राजी किया गया था, लेकिन स्पष्ट रूप से उड़ान के लिए उनका प्यार कभी भी कम नहीं हुआ.
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दलीप सिंह मजीठिया (Dalip Singh Majithia), भारत के सबसे पुराने फाइटर पायलट (India’s Oldest Fighter Pilot) हैं. स्क्वाड्रन लीडर दलीप सिंह का कल यानी 27 जुलाई को जन्मदिन है. इस साल उनका जन्मदिन इसलिए खास है, क्योंकि वो 100 साल के हो जाएंगे. 5 अगस्त, 1940 को युवा सिख पायलट दलीप सिंह ने अपने दो ब्रिटिश इंस्ट्रक्टर्स के साथ लाहौर के वॉल्टन एयरफील्ड से टाइगर मोथ एयरक्राफ्ट में अपनी पहली ट्रेनिंग की उड़ान भरी थी.

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महज 20 साल की उम्र में भरी सोलो उड़ान

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, 17 दिन बाद दलीप सिंह मजीठिया, जो उस समय सिर्फ 20 साल के थे, उन्होंने अपनी सोलो उड़ान भरी थी. एक ऐसी उड़ान जिसने एविएशन में लाइफटाइम के लिए मार्ग प्रशस्त किया. पहले एयरफोर्स फाइटर पायलट के तौर पर और फिर एक प्राइवेट पायलट के रूप में. दलीप सिंह मजीठिया द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के मोर्चे पर महान हॉकर हर्रिकेन उड़ाने वाले फाइटर पायलट के रूप में हिस्सा रहे.

इतना ही नहीं एयरफोर्स से रिटायरमेंट के बाद प्राइवेट पायलट के तौर पर दलीप सिंह काठमांडू घाटी में प्लेन लैंड करने वाले पहले व्यक्ति भी थे. जिस साल देश आजाद हुआ यानी अगस्त 1947 में दलीप सिंह स्क्वाड्रन लीडर के तौर पर इंडियन एयरफोर्स से रिटायर हो गए. वो भारत के सबसे पुराने जीवित फायटर पायलट हैं.

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आज भी लगता है इंडियन एयरफोर्स का हिस्सा हूं

रिपोर्ट्स के अनुसार, स्क्वाड्रन लीडर दलीप सिंह कहते हैं कि जब मैं इंडियन एयरफोर्स के अधिकारियों से मिलता हूं, तो मुझे आज भी लगता है कि मैं इसका हिस्सा हूं. मेरे बैच के लोग अब वहां नहीं हैं, हम हर साल अगस्त के पहले कुछ समय के लिए अपनी मीटिंग करते थे. दलीप सिंह की कहानी को भारत के मशहूर एयरोस्पेस हिस्टोरियन पुष्पिंदर सिंह चोपड़ा द्वारा ‘विश्वास, साहस और रोमांच की कहानी’ के रूप में वर्णित किया गया है.

जब तक उन्होंने एक पायलट के रूप में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, तब तक वह अपने कोर्स के सर्वश्रेष्ठ पायलट के रूप में प्रतिष्ठित होने के लिए पर्याप्त थे. रिटायर्ड स्क्वाड्रन लीडर ने पूर्व-स्वतंत्रता अवधि के दौरान इंडियन एयरफोर्स के लिए कई उड़ान भरीं. कई विमान उड़ाए, जिसमें वेस्टलैंड वैपिटी आईआईए, हॉकर ऑडैक्स और हार्ट शामिल थे, जो उस समय इंडियन एयरफोर्स का एकमात्र स्क्वाड्रन लैस था.

उड़ाया दुनिया का सबसे एडवांस एयरक्राफ्ट हर्रिकेन

शुरुआत में कोस्ट डिफेंस फ्लाइट्स को उड़ाने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी, जो बंगाल की खाड़ी के ऊपर समुद्री गश्त करती थी. इसके बाद उन्हें एयरफोर्स का नंबर 6 स्क्वाड्रन फिर से सौंपा गया, जिसे दुनिया के सबसे एडवांस्ड एयरक्राफ्ट में से एक महान हॉकर हर्रिकेन को संचालित करने के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था.

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दलीप सिंह कहते हैं कि वह बहुत ही शानदार एयरक्राफ्ट था. हर्रिकेन बहुत जाना जाता था, क्योंकि इसने ब्रिटेन की लड़ाई जीती थी और उसके प्रति हमारे लिए बहुत सम्मान है, क्योंकि इसमें एक महान इंजन था. मैं इस विमान से प्यार करता था. यह बहुत कठिन था. वो (ब्रिटिश सैनिक) कहते थे कि तुम एक पेड़ को हिट कर सकते हो, लेकिन हम फिर भी वापस आ गए.

दलीप सिंह मजीठिया ने ईस्ट इंडिया कंपनी में अपनी सेवा देते हुए महान बाबा मेहर सिंह की कमान के अंडर बर्मा के मोर्चे पर उड़ान भरी थी. बाबा मेहर सिंह को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक विशिष्ट सेवा आदेश से सम्मानित किया गया था. साथ ही उन्हें पाकिस्तान के साथ 1947-48 युद्ध में अपनी शानदार भूमिका के लिए महावीर चक्र से भी नवाजा गया था.

जोन सैंडर्स से की शादी

जापानियों के आत्मसमर्पण और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, दलीप सिंह मजीठिया को ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑक्यूपेशन फोर्सेज का हिस्सा बनने के लिए चुना गया और मेलबर्न के BCOF मुख्यालय में ट्रांसफर कर दिया. यहां वे जोन सैंडर्स से मिले (जिनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना के साथ थे). 18 फरवरी, 1947 को, दलीप सिंह मजीठिया ने जोन से अपने गोरखपुर स्थित घर में शादी की.

IAF से रिटायर हो बने प्राइवेट पायलट

दलीप सिंह को इंडियन एयरफोर्स छोड़ने के लिए राजी किया गया था, लेकिन स्पष्ट रूप से उड़ान के लिए उनका प्यार कभी भी कम नहीं हुआ. दलीप सिंह बताते हैं कि युद्ध के खत्म होने से ठीक पहले अमेरिकियों ने भारत में अपने सभी विमान बेच दिए और मेरे चाचा ने इन दो एल 5 हल्के विमानों को खरीदा. लेकिन इन विमानों को उड़ान योग्य बनाना आसान काम नहीं था. हमारे पास कोई मैकेनिक भी नहीं था. मेरा एक ऑटो मैकेनिक था जो गैराज की देखभाल करता था. मेरे चाचा और वह इन-चार्ज थे और वह विमान के मैग्नेटो की जांच करने के लिए आते थे.

काठमांडू में प्लेन लैंड कराने वाले पहले व्यक्ति

उन्होंने बताया कि चमत्कारिक ढंग से विमान सफलतापूर्वक ठीक हो गया. इसके बाद मैंने इन दो हवाई जहाजों को हर जगह उड़ाया. सौभाग्य से मेरे पास पहले से एक पायलट का लाइसेंस था, तो कई समस्या भी सामने नहीं आई. 23 अप्रैल, 1949 को दलीप सिंह नेपाल के काठमांडू में उतरे. यह काठमांडू घाटी में किसी विमान की पहली लैंडिंग थी. इसके लिए प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा ने उनसे रिक्वेस्ट की थी.

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