हॉवर्ड प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट, जो बाबा नीम करोली से मिलकर बन गए संत रामदास

रिचर्ड अल्पर्ट हॉवर्ड में प्रोफेसर रहने के दौरान साइकेडेलिक रिसर्च के लिए 1967 में भारत आए. यहां उनकी मुलाकात 'महाराज जी' के नाम से मशहूर आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा से हुई.
All you need to know about Richard Alpert aka Baba Ram Dass, हॉवर्ड प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट, जो बाबा नीम करोली से मिलकर बन गए संत रामदास

बाबा रामदास के नाम से दुनिया में मशहूर अमेरिकी आध्यात्मिक गुरु रिचर्ड अल्पर्ट की रविवार को 88 साल की उम्र में मृत्यु हो गई. रिसर्चर और हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रहे रिचर्ड अल्पर्ट ने 1960 और 70 के दशक में अध्यात्म की अलख जगाई थी. हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग में उनकी सहयोगी रही टिमोथी लेरी ने इस काम में उनका साथ दिया था. करिश्माई व्यक्तित्व के बाबा रामदास कौन थे, आइए जानते हैं उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें.

शुरुआती जीवन

रिचर्ड अल्पर्ट का जन्म 6 अप्रैल 1931 को बोस्टन, मसाचुसेट्स में हुआ था. पढ़ाई के बाद वे हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए. मनोविज्ञान विषय में उनका अध्ययन लगातार जारी था लेकिन वे बहुत परेशान और चिंतित रहते थे. डिप्रेशन से निपटने के लिए उन्होंने नशे का सहारा ले रखा था और भारी मात्रा में धूम्रपान करते थे. यूनिवर्सिटी में उनकी मुलाकात टिमोथी लेरी से हुई.

रिचर्ड अल्पर्ट की प्रोफेसर से संत बनने की कहानी 1961 में शुरू होती है. मनोवैज्ञानिक होने के चलते वे मानव चेतना की खोज में आए. वह psilocybin, LSD-25 और दूसरे साइकेडेलिक केमिकल्स पर शोध कर रहे थे जिसमें उनके साथ टिमोथी लेरी, एल्डस हक्सले, राल्फ मेट्जनर, एलेन गिन्सबर्ग थे.

इस शोध पर उनकी ‘द साइकेडेलिक एक्सपीरियंस’ और ‘एलएसडी’ नाम की दो किताबें उपलब्ध हैं. ये शोध इस हद तक विवादास्पद था कि रिचर्ड अल्पर्ट और टिमोथी लेरी अपना व्यक्तित्व खो चुके थे, जिसके चलते 1963 में उन्हें यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया. इसके बाद टिमोथी लेरी और रिचर्ड अल्पर्ट ने आध्यात्मिक यात्रा करने का फैसला किया और मेक्सिको पहुंच गए.

1967 में आए भारत

रिचर्ड अल्पर्ट हॉवर्ड में प्रोफेसर रहने के दौरान साइकेडेलिक रिसर्च के लिए 1967 में भारत आए. यहां उनकी मुलाकात ‘महाराज जी’ के नाम से मशहूर आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा से हुई. बाबा नीम करोली ने उन्हें दीक्षा दी और रामदास नाम दिया. संत रामदास की वेबसाइट पर दी गई बायोग्राफी के अनुसार अध्यात्म में आते ही उनका जीवन बदल गया.

हनुमान जी के भक्त

फिर आया साल 1968. अब बाबा रामदास हनुमान जी के भक्त हो गए थे. हनुमान की भक्ति को केंद्र में रखकर वे भक्ति योग सहित प्राचीन भारतीय परंपराओं, आध्यात्मिक विधियों आदि में समा गए. इसमें से पर्याप्त ज्ञान अर्जित करने के बाद वे थेरवादिन, महायान तिब्बती, जैन व बौद्ध स्कूलों में गए. उसके बाद सूफी और यहूदी दर्शन को भी समझने की दिशा में कदम बढ़ाए.

1974 में रामदास ने हनुमान फाउंडेशन की नींव रखी जिसका काम सेवा भावना को बढ़ाना था. ये पूरी तरह नॉन प्रॉफिट संस्था थी. हनुमान फाउंडेशन ने प्रिजन आश्रम प्रोजेक्ट शुरू किया जिसके जरिए जेल के कैदियों का परिवर्तन आध्यात्मिक रूप से किया गया. तब से लगातार वे सामाजिक आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में काम करते रहे.

ये भी पढ़ेंः

Related Posts