‘तानाजी’ में इतिहास से छेड़छाड़ से नाखुश सैफ, जानिए उनके किरदार उदयभान की असली कहानी

उदयभान राठौर का इतिहास में क्या स्थान है, उन्होंने औरंगजेब के साथ जाना क्यों स्वीकार किया, औरंगजेब ने कोंढाना जैसे महत्वपूर्ण किले की जिम्मेदारी उन्हें क्यों सौंपी, आइए जानते हैं.
Story of Udaybhan rathod villain of TanhaJi movie, ‘तानाजी’ में इतिहास से छेड़छाड़ से नाखुश सैफ, जानिए उनके किरदार उदयभान की असली कहानी

अजय देवगन और सैफ अली खान की मुख्य भूमिका से सजी फिल्म तानाजी बॉक्स ऑफिस पर बढ़िया परफॉर्म कर रही है. कमाई के साथ फिल्म को तारीफें भी मिल रही हैं. इसी बीच फिल्म में उदयभान सिंह का निगेटिव किरदार निभाने वाले सैफ अली खान के एक इंटरव्यू की वजह से विवाद बढ़ गया है.

फिल्म कंपैनियन को दिए गए इंटरव्यू में सैफ ने कहा कि इस फिल्म में इतिहास के साथ छेड़-छाड़ की गई है. उन्हें उदयभान का किरदार रोचक लगा इसलिए स्वीकार किया. सैफ ने कहा कि कुछ कारणों से मैं स्टैंड नहीं ले पाया लेकिन शायद अगली बार ले लूं. सैफ ने कहा कि ‘मेरा मानना है कि इंडिया का कॉन्सेप्ट अंग्रेजों ने दिया जो उससे पहले नहीं था. तानाजी फिल्म में कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं हैं.’

सैफ अली खान ने भारत के सेक्युलरिज्म को खतरा, देश के घटनाक्रम पर कलाकारों की चुप्पी की वजह आदि को लेकर बेबाक राय रखी है. कबीर खान का रेफरेंस देते हुए बताया कि वे खराब एक्टिंग और ढीली स्क्रिप्ट बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन कमर्शियल फायदे के लिए पॉलिटिकल नरेटिव में छूट बर्दाश्त नहीं करेंगे.

फिल्म में तथ्यों का गलत नरेटिव

तानाजी फिल्म में मुगलों को विदेशी दिखाया गया है. जो कि औरंगजेब का कालखंड है. 2008 में आई फिल्म जोधा अकबर में अकबर को भारतीय बादशाह के तौर पर दिखाया गया है. यानी पीढ़ियों से भारत में रहने के बावजूद उन्हें पूरी तरह से विदेशी दिखाया गया. उस कालखंड में भी मुगल और मुस्लिम किरदारों को हरे कपड़ों में दिखाना एक तरह से स्टीरियोटाइप है.

फिल्म में मराठाओं की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को जस्टिफाई किया गया है जबकि मुगलों और राजपूतों की महत्वाकांक्षा को नकारात्मक दिखाया गया है. यहां जो मुख्य एंटी हीरो किरदार उदयभान राठौर है जिसके बारे में दिखाया गया है कि वह हिंदू होकर हिंदुओं(मराठाओं) से गद्दारी करता है. उदयभान राठौर का इतिहास में क्या स्थान है, उन्होंने औरंगजेब के साथ जाना क्यों स्वीकार किया, औरंगजेब ने कोंढाना जैसे महत्वपूर्ण किले की जिम्मेदारी उन्हें क्यों सौंपी, आइए जानते हैं.

उदयभान का एकतरफा प्यार

उदयभान की कहानी मशहूर है कि वे तलवारबाजी में निपुण राजपूत सिपाही थे. जगत सिंह के राजमहल में राजकुमारी कमला देवी को तलवारबाजी सिखाने जाते थे. रोज की मुलाकातों में उदयभान राजकुमारी से प्रभावित हुए और उनसे प्यार हो गया. उन्होंने राजकुमारी कमला देवी के सामने प्रेम का प्रस्ताव रखा तो राजकुमारी ने उसे ठुकरा दिया.

राजकुमारी ने उदयभान से कहा कि मेरा तुम्हारा कोई मेल नहीं है. हमारा रक्त अलग है. तुम्हारे पिता तो महंत हैं लेकिन तुम्हारी माता का रक्त अलग है. प्यार के ठुकराए जाने से नाराज उदयभान राठौर को राजपूतों से नफरत हो जाती है और उसी दिन वे मुगलों के साथ जाने का निर्णय लेते हैं.

बदले की आग में जलते हुए उदयभान राठौर औरंगजेब के सेनापति राजा जयसिंह प्रथम के सामने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हैं. सेनापति उनको मुगल सेना में शामिल कर लेते हैं. राजा जयसिंह के माध्यम से उदयभान की मुलाकात औरंगजेब से होती है और उन्हें कोंढाना किले का सूबेदार बना दिया जाता है.

कोंढाना किले से शिवाजी का लगाव

इसी कोंढाना किले में तानाजी और उदयभान के बीच हुए युद्ध को तानाजी फिल्म में दिखाया गया है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री प्रोफेसर अनिरुद्ध देशपांडे बताते हैं कि 1665 में ये किला पुरंदर संधि के तहत शिवाजी से औरंगजेब को मिल गया था. संधि के बाद शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए तो उसने धोखे से उन्हें बंदी बना लिया. शिवाजी वहां से किसी तरह बचकर वापस महाराष्ट्र पहुंचे तो संधि तोड़ दी और कोंढाना के साथ हाथ से गए बाकी 23 किलों को भी वापस लेने की तैयारी शुरू कर दी.

कोंढाना किला औरंगजेब के पास जाने से सबसे ज्यादा आहत शिवाजी की मां जीजाबाई थीं. उन्हें ये मराठाओं की अस्मिता पर प्रहार जैसा लगा था. उन्होंने खुद तानाजी को कोंढाना वापस लेने के लिए नियुक्त किया था. शिवाजी जानते थे कि मराठाओं की सुरक्षा के लिए कोंढाना का किला कितना जरूरी है. कहा जाता था कि कोंढाना जिसके कब्जे में होता है, पूना में उसका राज होता है.

कोंढाना कैसे बना सिंहगढ़

तानाजी अपने साथ 300 मराठा योद्धाओं को लेकर 4 फरवरी 1670 की रात कोंढाना के किले पर चढ़ाई कर देते हैं. उदयभान और तानाजी के बीच में भीषण युद्ध होता है जिसमें दोनों मारे जाते हैं. तानाजी की सेना अपने पराक्रम से किले को जीत लेती है. जब ये समाचार शिवाजी को मिलता है तो वे कहते हैं- ‘गढ़ आला, पन सिंह गेला.’ यानी किला तो हाथ आ गया लेकिन अपना शेर खो दिया.

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