जब शीला दीक्षित की आंखों के सामने उड़ गए उनकी कार के परखच्चे, पढ़ें मौत को मात देने वाला किस्सा

चुनाव प्रचार का आखिरी दिन आ गया. आखिरी रैली खत्म हो गई. शीला दीक्षित बिहार के एक सांसद की कार में बैठकर अमृतसर के लिए रवाना हुईं.

दिल्ली में लगातार 15 साल मुख्यमंत्री रहीं दिल्ली कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष शीला दीक्षित का निधन हो गया है. वे 81 साल की थीं और बीमारी की वजह से एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती थीं. कुछ ही देर में उनका पार्थिव शरीर घर आएगा. इस मौके पर 34 साल पुराने एक किस्से का जिक्र करना जरूरी हो जाता है, जब शीला दीक्षित ने मौत को मात दे दी थी.

इस घटना का जिक्र शीला दीक्षित ने अपनी किताब ‘सिटिजन डेल्ही, माई टाइम्स माई लाइफ’ में किया है. 24 जुलाई 1985 की बात है. प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत हरचरण सिंह लोंगोवाल के बीच पंजाब पीस अकॉर्ड हुआ था. उम्मीद की जा रही थी कि पंजाब में स्थिति अब सुधर जाएगी. लेकिन तभी सब उल्टा पुल्टा हो गया. अगस्त में लोंगोवाल की हत्या हो गई.

हरचंद सिंह लोंगोवाल और राजीव गांधी

इसी बिगड़े हुए माहौल में सितंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले थे. वहां इलेक्शन कैंपेन की जिम्मेदारी शीला दीक्षित को सौंपी गई. शीला का जन्म ही पंजाब के कपूरथला में हुआ था और वे पहले भी कैंपेन करने वहां जा चुकी थीं.

चुनाव प्रचार का आखिरी दिन आ गया. आखिरी रैली खत्म हो गई. शीला दीक्षित बिहार के एक सांसद की कार में बैठकर अमृतसर के लिए रवाना हुईं. कार में शीला के साथ वो सांसद, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक ड्राइवर था.

ये करीब दिन के एक बजे की बात है. ड्राइवर ने लंच करने के लिए रास्ते में एक रेस्टोरेंट पर कार रोकी. कहा- अभी खाना खा लेते हैं. अमृतसर पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो जाएगी. शीला दीक्षित रेस्टोरेंट के अंदर सॉफ्ट ड्रिंक पी रही थीं. तभी जोर का धमाका हुआ. आस पास मौजूद लोगों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. धमाका उसी कार में हुआ था जिसमें थोड़ी देर पहले शीला दीक्षित सबके साथ बैठी हुई थीं. कार के परखच्चे उड़ गए थे. कार के पास मौजूद दो बच्चों की मौत हो गई थी. अगर ड्राइवर ने कार रोकने का फैसला न किया होता तो इन लोगों का बचना नामुमकिन था.

पुलिस ने बयान में बताया कि कार के अंदर टाइम बम फिट था. शीला को उस धमाके की आवाज, गाड़ी के परखच्चे उड़ने का सीन जीवन भर याद रहा. इसके बावजूद शीला दीक्षित हिम्मत नहीं हारीं, कैंपेन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. इस घटना के 13 साल, तीन महीने बाद शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं.

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